Spirit of a Fighter – Chapter 1248
"नहीं भागूँगा, माँ," मैंने कहा। "अब कभी नहीं।"
पर जगदीश सिंह की बंदूक मेरी छाती पर थी और उसका हाथ काँप रहा था। काँपती बंदूक कभी-कभी सीधी चलने वाली बंदूक से ज़्यादा ख़तरनाक होती है।
"नीचे रख, जगदीश," रणवीर सिंह की आवाज़ आई। वो व्हीलचेयर से खड़े होने की कोशिश कर रहे थे, उनकी बाँहें काँप रही थीं। "मैदान में बंदूक? तेरे बाप की भी ये हिम्मत नहीं थी।"
जगदीश का चेहरा ऐंठ गया। पसीना उसके माथे से बहकर मूँछों में जा रहा था।
"मेरे बाप ने तुम सबको इतना बड़ा किया कि तुम उसका नाम भी नहीं लेते," वो चिल्लाया। "और आज ये मज़दूर का बेटा मेरे सामने पहलवान बनकर खड़ा है!"
मीरा मेरे पास आ चुकी थी। उसका हाथ मेरी कमर पर था, और वो धीरे से बोली, "वीर, वो सीधा नहीं मारेगा। वो डरा हुआ है। डरा हुआ आदमी निशाना नहीं लगाता।"
"तू कैसे जानती है?"
"क्योंकि पापा ने मुझे बताया था। जगदीश की नस्ल में डर आया है, हिम्मत नहीं।"
जगदीश ने सुना। उसकी आँखें मीरा पर आईं, और उसकी बंदूक एक इंच मीरा की तरफ़ घूम गई।
मेरा खून ठंडा हो गया।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "पीछे हट।"
"नहीं।"
"मीरा—"
"नहीं, वीर।" उसने मेरी बाँह कसकर पकड़ी। "अगर मैं पीछे हटी, तो वो समझेगा मैं डरी हूँ। और फिर वो तुझ पर सीधा निशाना लगाएगा।"
जगदीश हँसा। हँसी सूखी थी, जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूम रही हो।
"रणवीर की बेटी," उसने कहा। "तू ठीक अपने बाप पर गई है। ज़ुबान बड़ी, अक्ल कम। तेरे बाप ने भी बीस साल पहले मेरे सामने ऐसी ही बातें की थीं।"
"और तूने उसके पैर बेकार कर दिए," मैंने कहा।
"मैंने नहीं। भैरव ने किया। मैंने तो सिर्फ़ कहा था कि उसे अखाड़े से हटाना है।"
"फर्क क्या है?"
जगदीश का होंठ उठा। "फर्क ये है कि उस रात मैं वहाँ था, और मैं जानता था कि पानी में क्या डाला जा रहा है। और मैंने रोका नहीं।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। दूर खड़ी गंगा देवी ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
"मेरा भाई," वो फुसफुसाईं।
"हाँ, तेरा भाई," जगदीश ने उनकी तरफ़ बिना देखे कहा। "जो तेरी गोद में सोया, जिसे तूने खिलाया, और जिसने तेरे पति के पैरों में ज़हर भरवाया। तू आज भी मुझे भाई कहती है — यही तेरी कमज़ोरी है, बहन। तू ज़्यादा भावुक है।"
गंगा देवी की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर उनकी आवाज़ साफ़ थी।
"मैं भावुक हूँ, जगदीश," उन्होंने कहा। "पर आज मैं गवाही भी दूँगी। और गवाही में भावना नहीं होती।"
जगदीश के हाथ में बंदूक हिली। उसने चारों तरफ़ देखा — भीड़, पुलिस के सिपाही, रणवीर सिंह की व्हीलचेयर। सब उसकी तरफ़ देख रहे थे। सब ऐसे देख रहे थे जैसे वो अब कुछ नहीं है।
और यही उसका सबसे बड़ा डर था। कुछ न होना।
"तुम सब मुझे घेर लो," उसने गुर्गों से कहा। "मुझे निकलने दो।"
गुर्गे हिले नहीं। उनमें से एक ने अपना डंडा नीचे रख दिया।
"सर," वो बोला। "हमें और नहीं।"
"क्या?"
"हमें माफ़ी, सर। हमारी माँ-बहन भी इसी गाँव में हैं।"
जगदीश ने बंदूक उसकी तरफ़ घुमाई। पर इस बार कोई नहीं काँपा। शायद इसलिए कि सब जान गए थे कि जगदीश की गोली उसके डर से बड़ी नहीं है।
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए। उनका हाथ अपनी कमर पर था, पर उन्होंने बंदूक नहीं निकाली।
"जगदीश सिंह," उन्होंने कहा। "बंदूक मेरे हवाले कर दो। ये तुम्हारे फ़ायदे में है।"
जगदीश हँसा। पर इस बार हँसी में कुछ टूट रहा था।
"मेरे फ़ायदे में?" उसने कहा। "मैंने बीस साल एक अखाड़ा पाला है। मैंने इस गाँव को नाम दिया। मैंने तुम सबको—"
"तुमने ज़हर दिया," माँ ने कहा।
वो भीड़ में से आगे आ चुकी थीं। उनका टीका टूटा हुआ था, साड़ी का पल्लू कंधे से खिसका हुआ, और उनके हाथों में चक्की की गंध थी — जो पूरे मैदान में सबसे पुरानी और सबसे ईमानदार गंध थी।
"सरस्वती," जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था। डर नहीं — थकान। "तू भी?"
"मैं सबसे पहले," माँ ने कहा। "मैं बीस साल से तेरे सामने झुकी रही। तेरे घर में झाड़ू लगाई। तेरे बेटे को दूध पिलाया। और तूने मेरे पति के मुँह में ज़हर डाला।"
"सरस्वती, वो मेरी गलती नहीं थी—"
"हर आदमी यही कहता है," माँ ने कहा। "जब उसके सामने उसका पाप खड़ा होता है, तो वो कहता है — वो मेरी गलती नहीं थी। फिर किसकी थी? भैरव की? भैरव को कौन चला रहा था?"
जगदीश चुप हो गया।
"तूने भैरव को अपना हाथ बनाया," माँ ने कहा। "और अब हाथ कट गया, तो तू कहता है — हाथ मेरा नहीं था।"
मैंने देखा — जगदीश की बंदूक का मुँह धीरे-धीरे नीचे झुक रहा था। उसकी उँगली ट्रिगर से हट रही थी। उसके गुर्गे पीछे हट रहे थे, एक-एक करके, ऐसे जैसे कोई नदी किनारा छोड़ रही हो।
और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था।
जगदीश ने बंदूक घुमाई — खुद की तरफ़।
"नहीं!" गंगा देवी चिल्लाईं।
मैंने अपनी पूरी ताकत से छलाँग लगाई। मैं उससे चार कदम दूर था, मैंने दो कदम में छलाँग लगाई और उसकी कलाई पकड़ी। बंदूक हवा में चली गई और दूर गिरी। जगदीश मेरे साथ नीचे गिरा, और उसका सिर मिट्टी से टकराया। उसने मेरी कलाई पकड़ी, और मैंने देखा — उसकी आँखों में आँसू थे। बूढ़े आदमी के आँसू, जो मिट्टी में गिर रहे थे और मिट्टी को गीला कर रहे थे।
"मुझे मरने दे," उसने फुसफुसाया। "मुझे मरने दे, वीर। मैंने सब खो दिया।"
"नहीं।"
"मैंने अपना भाई खो दिया, अपनी बहन खो दी, अपने बेटे को ज़हर दिया—"
"तो ज़िंदा रहकर भरपाई कर," मैंने कहा।
वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा, ऐसे जैसे पहली बार देख रहा हो।
"तू मुझे माफ़ नहीं करेगा," उसने कहा।
"नहीं करूँगा," मैंने कहा। "माफ़ी माँगने की चीज़ नहीं है, जगदीश। ये कर्ज़ है। और कर्ज़ ज़िंदा रहकर ही चुकाया जाता है।"
इंस्पेक्टर शर्मा आगे आए और उसकी कलाइयों में हथकड़ी लगाई। क्लिक की आवाज़ मैदान में गूँजी। किसी ने ताली नहीं बजाई। किसी ने कुछ नहीं कहा। बस एक बूढ़ी औरत ने, जो भीड़ में सबसे आगे खड़ी थी, अपना आँचल मुँह पर रख लिया।
गंगा देवी आगे आईं। वो अपने भाई के सामने खड़ी हुईं।
"जगदीश," उन्होंने कहा।
वो नीचे देख रहा था।
"जगदीश, मेरी तरफ़ देख।"
उसने सिर उठाया।
"मैं तुझे माफ़ नहीं कर रही," गंगा देवी ने कहा। "पर मैं तुझे याद दिला रही हूँ — हम दोनों एक ही माँ के पेट से आए थे। उस माँ ने हमें एक साथ नहलाया था। और तूने मेरे पति को मारा।"
जगदीश ने आँखें बंद कर लीं।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा।
"नहीं जानता। तू अभी भी नहीं जानता। तू अभी भी सोच रहा है कि तूने बदला लिया। पर बदला नहीं लिया — तूने बस अपना घर जलाया।"
सिपाही उसे ले गए। भीड़ चुपचाप हट रही थी, जैसे कोई पानी धीरे-धीरे रेत में समा रहा हो।
मैं मिट्टी पर बैठा रह गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मेरी साँस फूल रही थी, और मेरी नाक से खून की एक पतली लकीर बह रही थी — मैंने बहुत ज़ोर लगाया था, बहुत ज़्यादा सूंघा था, और अब मेरा सिर फट रहा था।
मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने अपनी जेब से एक कपड़ा निकाला और मेरी नाक पर रखा।
"सिर झुका," उसने कहा।
"मीरा—"
"झुका, वीर।"
मैंने सिर झुकाया। उसके हाथ ठंडे थे, और उनमें अदरक-तुलसी की वो पुरानी गंध थी जो मुझे अब घर जैसी लगती थी।
"तूने ठीक किया," उसने धीरे से कहा।
"मुझे नहीं पता।"
"मुझे पता है।"
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