Spirit of a Fighter1247 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1247

6 min read November 5, 2026

मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर गंगा देवी की तरफ़। उनके होंठ हिले — मुस्कुरा रही थीं।

"मुझे मंज़ूर है," मैंने कहा।

और फिर मैंने अपना हाथ बढ़ाया। बलवंत ने देखा। उसने अपना हाथ बढ़ाया, पर वो काँप रहा था। उसकी हथेली पर खून की लकीर थी, चूड़ी की धार से।

मैंने उसका हाथ थामा।

"आज नहीं," मैंने कहा। "पहले तेरा इलाज।"

"पर मुकाबला—"

"मुकाबला होगा," मैंने कहा। "पर पहले वैद्य। तू चार साल से ज़हर पी रहा है। तेरा शरीर साफ़ होगा, तब लड़ेंगे।"

बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँपे।

"तू…" उसकी आवाज़ फूटी। "तू मुझे माफ़ कर देगा?"

"माफ़ी माँगने की बात नहीं है," मैंने कहा। "हम दोनों को एक ही आदमी ने गलत कहानी सुनाई। अब हम दोनों को नई कहानी लिखनी है।"

वो मेरे कंधे पर सिर रखकर फिर रोया। इस बार उसका रोना अलग था। हल्का। जैसे कोई बोझ उतर गया हो।

मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा — वो हाथ जिस पर कपड़ा बँधा था — और मेरी तरफ़ देखा।

"तुम बेवकूफ़ हो," उसने धीरे से कहा।

"क्यों?"

"बंदूक के सामने खड़े हो गए। बिना कुछ सोचे।"

"तो?"

"तो…" उसकी आँखें भीग गईं। "तो अगली बार सोच लेना। मेरे लिए।"

मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।

"मीरा," मैंने कहा। "आज के बाद कोई बंदूक नहीं। कोई शीशी नहीं। सिर्फ़ मिट्टी।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराई। वो मुस्कान थी जो पहली बार नहर के किनारे देखी थी — जब बारिश हो रही थी और मैंने उसे अपनी धोती से ढका था।

तभी टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में बंदूक थी, पर वो उसे ऐसे पकड़े हुए था जैसे कोई ज़हरीला साँप हो।

"भाई," उसने कहा, साँस फूलती हुई, "ये बंदूक मैं कहाँ रखूँ?"

"इंस्पेक्टर को दे दे," मैंने कहा।

"हाँ, पर…" टिंकू ने बंदूक को दूर से देखा, "…इसमें गोली है क्या?"

"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। वो अब भी खड़े थे, पर उनका चेहरा पीला पड़ रहा था। "एक ही गोली थी। उसने हवा में चला दी।"

मीरा ने अपने पिता को देखा और तुरंत दौड़ी।

"बाबा, आप बैठिए—"

"मैं अभी नहीं बैठूँगा," रणवीर सिंह ने कहा, पर उनकी आवाज़ में वो ज़ोर नहीं था। "बीस साल बाद मैं अपने अखाड़े में खड़ा हूँ। मुझे कुछ पल और दे।"

मीरा ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें सहारा दिया, और वो धीरे-धीरे चौकी की तरफ़ बढ़े।

मैंने अखाड़े की मिट्टी की तरफ़ देखा। चूने से दबी काली मिट्टी अब मेरे पैरों के नीचे थी। मैंने एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और उसे सूंघा। उसमें सिर्फ़ चूना था। कोई ताकत नहीं थी।

मैंने मुट्ठी खोली और मिट्टी को वापस गिरा दिया।

"ये मिट्टी मरी हुई है," मैंने कहा।

कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और फिर मिट्टी की तरफ़।

"नहीं मरी," उन्होंने अपनी धीमी आवाज़ में कहा। "इसे सिर्फ़ पानी चाहिए। और पसीना।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"कल सुबह से," मैंने कहा। "हम इस मिट्टी को फिर से ज़िंदा करेंगे।"

कालू काका मुस्कुराए। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में वो मुस्कान ऐसे बैठी जैसे पुरानी किताब में कोई अच्छी लाइन।

तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई — सुक्खी बुआ की।

"अरे वीर!" वो अपनी चमकीली साड़ी खींचती हुई आई। "सुन, मैंने तो सुना है कि तू अब राजा बन गया!"

"बुआ," मैंने कहा, "मैं वही हूँ। बस अब कोई मुझे बाहर का दरवाज़ा नहीं दिखाएगा।"

वो हँसी। उनकी हँसी में वो चीज़ थी जो पूरे गाँव की थी।

"तेरी माँ को पता है?" उसने पूछा।

मेरा दिल धक्क से रह गया।

"माँ!"

मैं भीड़ में उन्हें ढूँढने लगा। वो कहाँ थीं? जब मैं अखाड़े में आया, वो साथ थीं। पर जगदीश के आने के बाद…

"माँ कहाँ हैं?" मैंने टिंकू से पूछा।

"वो…" टिंकू ने इधर-उधर देखा। "वो गंगा देवी के साथ थीं।"

मैंने गंगा देवी की तरफ़ देखा। वो अभी भी बलवंत का हाथ पकड़े खड़ी थीं, पर उनकी आँखें भीड़ में कुछ ढूँढ रही थीं।

"वो वहाँ हैं," गंगा देवी ने कहा, और उन्होंने अखाड़े के कोने की तरफ़ इशारा किया।

मैं वहाँ दौड़ा।

माँ अखाड़े की दीवार के सहारे बैठी थीं। गुड़िया उनके पास थी, और उनका हाथ पकड़े हुए थी। माँ का चेहरा पीला था, और उनके होंठ सूखे थे। पर उनकी आँखें खुली थीं। और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं।

"माँ," मैंने कहा, और घुटनों के बल बैठ गया।

"मैं ठीक हूँ," उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ फुसफुसाहट थी।

"आप ठीक नहीं हैं। आपको—"

"मैं ठीक हूँ," उन्होंने दोहराया, और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा और उसका होंठ काँपा।

"भैया, माँ को पानी—"

"ला रहा हूँ।" मैं उठा ही था कि माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें एक बात थी जो मुझे रोक रही थी।

"बैठ," उन्होंने कहा। "पानी बाद में। पहले ये बता — तेरे होंठ क्यों फटे हैं?"

मैं हँसा। हँसी में दर्द भी था और कुछ और भी।

"गिर गया था, माँ।"

"किसने गिराया?"

मैं चुप रहा। माँ ने मेरा चेहरा देखा, फिर दूर खड़े बलवंत की तरफ़। उनके चेहरे पर कुछ बदला।

"वो लड़का…" उन्होंने धीरे से कहा, "…वो रो रहा है?"

"हाँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि उसे आज पता चला कि उसकी माँ ज़िंदा है।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी आ गया, पर वो रोई नहीं। बस मेरा माथा चूमा। उनके होंठ ठंडे थे, और उनमें नमक था — पसीने का।

"तेरे पिता भी ऐसे ही थे," उन्होंने कहा। "जब भी कोई रोता, वो पहले अपना होंठ फोड़ लेता था।"

"माँ—"

"सुन," उन्होंने मेरा हाथ कसा। "मैं जानती हूँ तू सोच रहा है कि मैंने तुझे क्यों अकेला भेजा। क्यों तेरे पीछे नहीं आई।"

"मैंने कुछ नहीं सोचा—"

"सोचा है।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "और सोचना भी चाहिए। पर आज सुन ले — मैं डरी थी। बीस साल से डरी थी। तेरे पिता को खोकर मैंने सोच लिया था कि अगर मैं तुझे अखाड़े से दूर रखूँगी, तो तू बच जाएगा।"

उनकी आवाज़ टूटी।

"मैंने तुझे बचाने के लिए तुझे छोटा रखा। और तू बड़ा होकर मेरे सामने खड़ा है — बिना मेरी मदद के। ये मेरी हार है, बेटा।"

मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो बहुत दिनों से जमा हुआ था।

"ये हार नहीं है," मैंने कहा। "ये मिट्टी है। मिट्टी हारती नहीं। बस कुछ समय के लिए सूख जाती है।"

माँ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया। उनकी हथेलियों में चक्की की गंध थी — आटा और पसीना।

"मेरा बेटा पहलवान है," उन्होंने कहा, जैसे किसी को बतला रही हों। "और मैं उसकी माँ हूँ।"

गुड़िया ने मेरी जेब में हाथ डाला और लाल मिट्टी निकालकर मेरी हथेली पर रख दी।

"रख ले, भैया," उसने कहा। "ये अच्छी वाली है। मैंने चुनकर रखी थी।"

मैंने उसे हथेली में बंद कर लिया। मिट्टी गर्म थी। उसके छोटे हाथों की गर्मी।

तभी मैदान के बाहर से आवाज़ आई। एक आवाज़ जो पूरे मैदान को काटकर आई।

"रुको! ये मुकाबला नहीं, ये साज़िश है!"

मैं पलटा।

भीड़ हट रही थी, लोग इधर-उधर बिखर रहे थे। और उस खुली जगह से जगदीश सिंह आ रहा था — अपने सात-आठ गुर्गों के साथ। उसके हाथ में बंदूक थी। चमकती हुई, सीधी मेरी तरफ़ उठी हुई।

माँ की उँगलियाँ मेरी कलाई पर और कस गईं।

"वीर," वो फुसफुसाईं। "भाग नहीं।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा और धीरे से हटाया।

"नहीं भागूँगा, माँ," मैंने कहा। "अब कभी नहीं।"

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