Spirit of a Fighter – Chapter 1246
भीड़ में चीखें उठीं। लोग पीछे हटने लगे। गंगा देवी खड़ी हो गईं और उन्होंने अपना हाथ बलवंत की तरफ़ बढ़ाया, जैसे उसे बचाना चाहती हों।
"ये मुकाबला नहीं है!" जगदीश चिल्लाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो रुका नहीं। "ये साज़िश है! ये लड़का…" उसने वीर की तरफ़ बंदूक का रुख किया, "…ये मेरी बहन को भड़का कर लाया है। ये सब नाटक है। ये मेरा अखाड़ा है, और मैं—"
"ये तेरा अखाड़ा नहीं है।"
आवाज़ पीछे से आई। मैं पलटा।
रणवीर सिंह खड़े थे। व्हीलचेयर पर नहीं। खड़े थे। उनके एक हाथ में मीरा का कंधा था और दूसरे हाथ में लाठी। उनके पैर काँप रहे थे, पर वो खड़े थे। उनकी आँखें जगदीश पर जमी थीं।
"ये मेरा अखाड़ा है," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो बीस साल सोई हुई थी। "और तू इसमें बंदूक लेकर नहीं घुस सकता।"
जगदीश ने बंदूक रणवीर की तरफ़ घुमाई।
"तू बैठ जा," उसने कहा। "तू तो बीस साल से बैठा ही है।"
मेरे पैरों तले की मिट्टी ठंडी हो गई। मैंने अपने कदम बढ़ाए और रणवीर सिंह के सामने खड़ा हो गया।
"बंदूक नीचे करो," मैंने कहा।
"वीर, हट जा," रणवीर ने कहा।
"नहीं।"
जगदीश हँसा। वो हँसी अखाड़े में गूँजी और फिर मर गई।
"तू क्या करेगा?" उसने कहा। "तू तो पहलवान है। तेरे हाथ में लाठी नहीं, मिट्टी है। मिट्टी से बंदूक नहीं रुकती।"
"पर मिट्टी से सच ज़रूर निकलता है," मैंने कहा।
जगदीश का चेहरा बिगड़ा। उसने बंदूक मेरी छाती पर तान दी। मैंने उसकी उँगली देखी — वो काँप रही थी। बंदूक का मुँह मेरी तरफ़ था, पर उसकी आँखें इधर-उधर भाग रही थीं। वो भीड़ को देख रहा था। वो जाली के बाहर खड़े हज़ारों लोगों को देख रहा था, जो अब चुप नहीं थे। वो गुर्रा रहे थे। धीरे-धीरे, एक आवाज़ में।
"नीचे करो बंदूक!"
"शर्म नहीं आती!"
"मारो साले को!"
जगदीश ने बंदूक की नाल ऊपर की और हवा में एक गोली चला दी। धमाका अखाड़े में फटा और मेरे कान बजने लगे। भीड़ पीछे हटी। कुछ लोग भागे। एक औरत चीखी।
"अब कोई नहीं बोलेगा!" जगदीश चिल्लाया। "ये मेरा फ़ैसला है! और मेरे खिलाफ़ जो बोलेगा—"
उसकी आवाज़ रुक गई।
क्योंकि बलवंत सामने आ गया था। वो जगदीश के और मेरे बीच खड़ा था। उसकी आँखें लाल थीं, उसकी नाक से खून की एक पतली लकीर बह रही थी, पर वो खड़ा था।
"बोल," बलवंत ने कहा। "अब जो बोलेगा, उसे मारेगा?"
"बलवंत, हट जा," जगदीश ने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी। "मैंने तुझे पाला है। मैंने तुझे बड़ा किया है। तू मेरे साथ खड़ा हो।"
"तूने मुझे चुराया था," बलवंत ने कहा। "तूने मुझे अपनी माँ से दूर रखा। तूने मेरे पिता का नाम भी मुझसे छुपाया। तूने मुझे ज़हर दिया।" उसकी आवाज़ काँपी, पर वो रुका नहीं। "तूने मुझे वो दिया जो मैंने कभी माँगा नहीं था — और तूने मुझसे वो लिया जो मैंने कभी दिया नहीं था।"
जगदीश ने बंदूक बलवंत की तरफ़ घुमाई।
मेरा दिल रुक गया।
"बलवंत!" मैंने चिल्लाया।
पर बलवंत नहीं हटा।
"मार," उसने कहा। "मार दे। अगर तेरे पास गोली है, तो मार दे। पर आज के बाद तू मेरा गुरुजी नहीं है। तू मेरा बाप नहीं है। तू सिर्फ़ एक चोर है।"
जगदीश की उँगली काँपी। मैंने देखा — उसकी आँखों में पानी था। पर उसका चेहरा कठोर था। वो बंदूक नीचे नहीं कर रहा था।
मैंने एक कदम बढ़ाया। फिर दूसरा।
"रुक जा," जगदीश ने कहा, पर उसकी आवाज़ में अब वो दम नहीं था।
मैं रुका नहीं।
"मैंने तुझे चेताया था," जगदीश ने कहा, और अब वो बड़बड़ा रहा था। "मैंने तुझे बीस साल पहले चेताया था। तेरे बाप को चेताया था। उसने नहीं सुना। तू भी नहीं सुना।"
मैं उसके पास पहुँच गया। मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी हड्डी पतली थी — बूढ़े की हड्डी। उसने बंदूक छोड़ने की कोशिश की, पर मेरी पकड़ मज़बूत थी।
"छोड़," उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
मैंने उसकी कलाई मरोड़ी। बंदूक उसके हाथ से छूटी और मिट्टी पर गिरी। मैंने उसे लात मारकर दूर किया, और टिंकू दौड़कर उसे उठा ले गया।
जगदीश मेरी पकड़ में था। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो सब था जो एक हारे हुए आदमी की आँखों में होता है — गुस्सा, डर, और कुछ ऐसा जो पहचान नहीं पा रहा था।
"तूने सब खो दिया," मैंने कहा। "अब बोल — सुहानी को कहाँ मारा था?"
जगदीश हँसा। वो हँसी सूखी थी।
"मारा नहीं," उसने कहा। "मैंने तो बस भैरव को इशारा किया था। भैरव ने किया। मैंने तो…" उसकी आँखें भीग गईं। "…मैंने तो बस अपना हक़ माँगा था। ये अखाड़ा मेरे बाप का था। भवानी ने मुझे निकाल दिया। मैंने बस वो वापस माँगा जो मेरा था।"
"तूने बीस साल में सत्रह पहलवानों की जान ली," रणवीर सिंह ने कहा। वो अब भी खड़े थे। मीरा उनका हाथ पकड़े हुए थी, और उनका पूरा शरीर काँप रहा था, पर वो खड़े थे। "सत्रह जवान। और तू कहता है तूने अपना हक़ माँगा था?"
जगदीश ने उनकी तरफ़ देखा। और फिर उसने वो कहा जो उसने शायद कभी नहीं कहा था।
"तूने मेरा भाई मारा था," उसने कहा। "तूने भवानी को अखाड़े का मालिक बनाया, और मुझे बाहर का दरवाज़ा दिखाया। मैं बड़ा था। मैं पहले आया था। पर सबने भवानी को चुना।"
"क्योंकि भवानी ने कभी किसी को ज़हर नहीं दिया," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ तेज़ थी, और उसमें वो ज़िद थी जो पहले दिन थी। "क्योंकि भवानी ने कभी किसी का हक़ नहीं छीना।"
जगदीश ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ निकली नहीं। वो मिट्टी में बैठ गया। उसकी पीठ झुक गई।
तभी जाली के बाहर से सीटी की आवाज़ आई। मैंने देखा — इंस्पेक्टर शर्मा अपने सिपाहियों के साथ भीड़ को चीरते हुए आ रहे थे। उनके हाथ में लाठी थी, और चेहरे पर वो थकान थी जो लंबे पीछा करने के बाद होती है।
"जगदीश सिंह," इंस्पेक्टर ने कहा। "तुम गिरफ़्तार हो।"
जगदीश ने अपना सिर उठाया। उसने एक बार गंगा देवी की तरफ़ देखा, फिर बलवंत की तरफ़, और फिर मेरी तरफ़।
"तू जीत गया," उसने धीरे से कहा। "पर तू नहीं जानता कि जीतने के बाद क्या करना होता है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं मिट्टी में लौट जाऊँगा।"
सिपाही उसे ले गए। वो जाते वक़्त एक बार भी पलटकर नहीं देखा।
अखाड़े में सन्नाटा था। पर वो सन्नाटा वैसा नहीं था जैसा पहले था। इसमें राहत थी।
गंगा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे, पर उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ कहने की कोशिश में।
"आज का मुकाबला…" उन्होंने धीरे से कहा।
मैंने बलवंत की तरफ़ देखा। वो अभी भी मिट्टी में घुटनों के बल था, चूड़ी उसकी मुट्ठी में थी।
"आज का मुकाबला रहता है," बलवंत ने कहा। उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो सुबह नहीं थी। साफ़। "पर वो मुकाबला नहीं होगा जो गुरुजी ने चाहा था।"
वो खड़ा हो गया। उसने अपनी बोतल की तरफ़ देखा, जो मिट्टी में टूटी पड़ी थी।
"मैं आज से कोई शीशी नहीं पीऊँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पूरे अखाड़े में गूँजी। "मैं आज से सिर्फ़ मिट्टी और मेहनत से लड़ूँगा।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
"वीर," उसने कहा। "मैं तुझसे आज नहीं लड़ूँगा। नहीं, मतलब…" उसने एक गहरी साँस ली। "…मैं तुझसे आज लड़ूँगा, पर वो कुश्ती नहीं होगी जिसमें एक-दूसरे को ज़मीन पर पटकना है। मैं तुझसे वो कुश्ती लड़ूँगा जिसमें हम दोनों मिट्टी में खड़े होंगे, बिना किसी शीशी के, बिना किसी साज़िश के। और जो जीते, वो हारे हुए को उठाए।"
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