Spirit of a Fighter1245 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1245

7 min read November 5, 2026

भीड़ में सनसनी फैली। किसी ने कुछ कहा, पर सुक्खी बुआ की चमकीली आवाज़ सबसे ऊपर उठी — "अरे मैंने तो सुना ही था!"

गंगा देवी ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।

"और मैं बलवंत की माँ हूँ," उन्होंने कहा।

बलवंत ने एक कदम पीछे लिया। उसके गुर्गे — वो चालीस आदमी जो उसके पीछे खड़े थे — एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे।

"तू झूठ बोल रही है," बलवंत ने कहा। उसकी आवाज़ कर्कश थी, जैसे किसी चीज़ को ज़बरदस्ती बाहर निकाल रहा हो। "मेरी माँ मर चुकी है। मेरे गुरुजी ने बताया था। भैरव ने—"

"भैरव ने तुझे चुराया था," गंगा देवी ने कहा। उनकी आवाज़ नरम थी, पर उसमें वो दम था जो पहाड़ को भी रोक दे। "जब तू दो साल का था। तेरे पिता भवानी सिंह ने मुझे तेरे साथ अखाड़े से भेज दिया था कि मैं तुझे भैरव की नज़र से बचा लूँ। पर भैरव ने रास्ते में घेर लिया। उसने मुझे बेहोश किया, तुझे मेरी गोद से निकाला, और मुझे मरे हुए की तरह एक गाड़ी में डाल दिया।"

वो रुकीं। उनकी आँखों से एक आँसू निकला और ठुड्डी पर रुक गया।

"मैं ज़िंदा थी। पर जब होश आया, तो मेरे हाथ में सिर्फ़ तेरी एक झुनझुनी थी — वो पीतल की झुनझुनी जो मैंने तुझे अपने हाथ से पहनाई थी। बीस साल मैंने वो झुनझुनी अपने सीने से लगाकर रखी। बीस साल मुझे यही बताया गया कि तू मर गया।"

बलवंत का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने अपना हाथ अपनी छाती पर रखा, जैसे कुछ ढूँढ रहा हो।

"वो…" उसका गला रुंध गया। "वो झुनझुनी… मेरे पास है।"

"क्या?"

"मेरे गुरुजी…" बलवंत की आवाज़ टूट रही थी। "गुरुजी ने मुझे एक झुनझुनी दी थी जब मैं छोटा था। कहा था — ये तेरी माँ की याद है। माँ मर गई, पर ये तेरी है। मैंने उसे कभी नहीं छोड़ा।"

गंगा देवी की आँखें बंद हो गईं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और बलवंत की तरफ़ बढ़ीं।

"देख," उन्होंने कहा, और अपनी कलाई से एक पुरानी पीली चूड़ी खोली और उसे बलवंत की तरफ़ बढ़ाया। "ये चूड़ी भवानी ने मेरी शादी के दिन पहनाई थी। इसके अंदर उसने अपना नाम खोदा था — भवानी सिंह। देख, अंदर।"

बलवंत ने काँपते हाथ से चूड़ी ली। उसने उसे उलटा किया। मशाल की रोशनी में उसकी आँखें सिकुड़ीं, और फिर फैल गईं।

"भव…" उसकी आवाज़ फूटी। "भवानी सिंह।"

"तेरे पिता का नाम," गंगा देवी ने कहा।

बलवंत ने चूड़ी अपनी मुट्ठी में भींच ली। उसके कंधे काँपने लगे। वो अखाड़े की मिट्टी में घुटनों के बल बैठ गया, और उसकी मुट्ठी से चूड़ी की धार उसकी हथेली में चुभने लगी। खून की एक पतली लकीर उसकी कलाई पर उतरी।

"और भैरव," गंगा देवी ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो प्यार नहीं था जो अभी था। "भैरव ने तुझे ज़हर दिया। वो पीली शीशी — जो वो तुझे हर मुकाबले से पहले देता था — वो ताकत नहीं थी। वो ज़हर था। उसने तुझे बड़ा बनाया, पर तेरे शरीर की उम्र खा ली। तू अट्ठाईस साल का है, बलवंत, और तेरा शरीर पचास साल का हो चुका है।"

बलवंत ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा। उसकी नसें नीली और उभरी हुई थीं। उसने अपनी बाँह खुजलाई, और मैंने देखा — उसकी बाँह पर छोटे-छोटे काले धब्बे थे, जैसे जले हुए हों।

"जिन्ना को भी…" उसने धीरे से कहा, "जिन्ना को भी भैरव यही देता था। और वो…" वो रुका। उसकी आवाज़ गई। "वो मर गया।"

"हाँ," गंगा देवी ने कहा। "और वो मरे हुए कोई चार महीने भी नहीं हुए। तू भी उसी रास्ते पर था।"

बलवंत ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में वो आँसू थे जो बच्चों के होते हैं — जो किसी के कहे से नहीं थमते।

"गुरुजी ने कहा था…" उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी निकली, "गुरुजी ने कहा था कि मेरी माँ मर गई क्योंकि भवानी सिंह ने उसे छोड़ दिया। कि भवानी सिंह का बेटा — वो मेरा दुश्मन है। कि अगर मैं उसे नहीं हराया, तो मेरी माँ की आत्मा…" उसका गला रुंध गया।

गंगा देवी ने उसके सामने घुटने टेके। अखाड़े की मिट्टी में। भीड़ में किसी ने लंबी साँस छोड़ी।

"मैं ज़िंदा हूँ," उन्होंने कहा, और उन्होंने बलवंत का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया। "मैं यहाँ हूँ। मरने वाली कोई नहीं थी। तेरी माँ कहीं नहीं गई।"

बलवंत ने उनकी तरफ़ देखा। और फिर वो रोया। ऐसा रोया जैसे बीस साल का रोना एक साथ बाहर निकल रहा हो। वो गंगा देवी के कंधे पर सिर रखकर रोया, और गंगा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे सहलाया।

मैं वहीं खड़ा था। मेरे हाथ जुड़े हुए थे। मुझे नहीं पता था कि क्या करूँ।

तभी बलवंत ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, और उनमें कुछ ऐसा था जो अभी-अभी जागा हो।

"वो बोतल," उसने कहा। "मेरी बोतल। जो मैंने आज सुबह पी है।"

वो अपने पैरों के पास पड़ी बोतल की तरफ़ देखने लगा। एक गुर्गे ने उसे उठाकर अपनी जेब में डाल लिया था। बलवंत ने हाथ बढ़ाया।

"दे मुझे," उसने कहा।

गुर्गा पीछे हटा।

"दे!" बलवंत की आवाज़ में वो गरज लौटी जो मुकाबले में थी। गुर्गे ने बोतल दी। बलवंत ने उसे अपनी आँखों के सामने उठाया, देखा, और फिर अखाड़े की मिट्टी पर पटक दिया।

शीशी टूटी नहीं। पीली बोतल मिट्टी पर लुढ़की, और उसमें से पानी की एक बूँद मिट्टी पर गिरी। और मैंने सूंघा — वो कड़वाहट। वो बदबू जो मैंने पहलवानों के पसीने में सूंघी थी। वो गंध जो लुट्टन के शरीर से आई थी जब वो बीमार पड़ा था।

वो ज़हर था। पक्का।

बलवंत ने बोतल को अपनी एड़ी से कुचल दिया। शीशी चटकी, और उसके हाथ से खून और पानी एक साथ बहने लगा। पर उसने परवाह नहीं की।

"मैंने ये पी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी। "चार साल से। रोज़।"

वो गंगा देवी की तरफ़ देखने लगा।

"माँ," उसने कहा, और वो शब्द उसके मुँह से ऐसे निकला जैसे पहली बार निकला हो। "मैंने ये सब किया। मैंने… मैंने उन पहलवानों को हराया जो कमज़ोर थे। मैंने उन्हें नीचा दिखाया। मैंने उन्हें…"

"तूने वो किया जो तुझे सिखाया गया," गंगा देवी ने कहा। "अब तू वो कर जो तेरा दिल कहे।"

बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो नफ़रत नहीं थी जो सुबह थी। कुछ और था। शर्म।

"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फूटी। "मैंने तुझे…मैंने तुझे मारने की क़सम खाई थी। मैंने तेरी माँ को उठवाया। मैंने…"

वो रुका। उसने अपना सिर नीचा कर लिया।

"मुझे माफ़ कर दे," उसने कहा। "मुझे नहीं पता था। मुझे नहीं पता था कि मेरी माँ ज़िंदा है। मुझे नहीं पता था कि मैं किसके लिए लड़ रहा हूँ।"

मैं उसके पास गया। मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसका कंधा पकड़ा। वो मेरी तरफ़ देखने लगा, और फिर वो उठा, और मेरे कंधे पर सिर रखकर रोया।

मैं कोई बड़ी बात नहीं बोला। मैंने बस उसका कंधा पकड़ा रखा। मेरी आँखें भी भर आई थीं। मुझे नहीं पता क्यों — शायद इसलिए कि मैंने उसके चेहरे पर वो देखा जो मैंने अपने चेहरे पर देखा था — एक ऐसा बच्चा जिसे किसी ने गलत कहानी सुनाई थी।

भीड़ में कोई रो रहा था। सुक्खी बुआ अपनी साड़ी के कोने से आँखें पोंछ रही थीं। जाली के बाहर खड़े लोग एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे।

तभी अखाड़े के फाटक पर हलचल हुई।

"रुको!"

आवाज़ पुरानी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो दीवारों से टकराकर लौटती है। मैं पलटा।

जगदीश सिंह फाटक से अंदर आ रहा था। उसके पीछे आठ-दस गुर्गे थे, हाथों में लाठियाँ। पर जगदीश के हाथ में लाठी नहीं थी। उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी — वो लंबी, जिसमें एक बार में एक ही गोली जाती है।

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