Spirit of a Fighter – Chapter 1244
"भाई," उसने धीरे से कहा, "मैंने सुबह से लड्डू बनाए हैं। यहाँ के बाज़ार से घी लिया, शहर का घी है, मैंने चखा — अच्छा है।"
मैंने कपड़ा हटाया। थाली में गोल-गोल लड्डू रखे थे, बड़े-बड़े, और उनके ऊपर तिल पड़े थे।
"तूने कितने बनाए?"
"अड़तालीस," टिंकू ने कहा, और उसकी आँखें चमक रही थीं। "गाँव से कोई-कोई बचा है जो यहाँ नहीं आया। जीत के बाद मैं पूरे रामपुर में बाँट आऊँगा।"
"और अगर—"
"भाई," टिंकू ने मेरी बात काटी, "मैंने आज तक तुझे एक बात नहीं बोली।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं डरता था। हमेशा डरता था — चूल्हे से, आग से, किसी की आवाज़ से। पर आज मैंने सुबह से लड्डू बनाए और मेरे हाथ नहीं काँपे। एक बार भी नहीं।"
वो एक पल रुका।
"तो अब तेरी बारी है। तू हार मत।"
मैं हँसा। मेरी हँसी में डर था, पर उसमें कुछ और भी था।
सूरज ढलने लगा। अखाड़े में मशालें जलाई जाने लगीं, और चूने की गंध में तेल और धुएँ की गंध मिल गई।
मैं उठा। मेरे पैर काँप रहे थे — घंटों का अभ्यास, एक ही जगह झुकना, मेरी जाँघें जवाब दे रही थीं। मैंने खुद को सीधा किया और अखाड़े की मिट्टी की तरफ़ चला।
वहाँ मैंने घुटने टेके। मैंने अपना माथा उस काली मिट्टी पर रखा, और मेरी नाक में चूना गया, और उसके नीचे — मिट्टी। असली मिट्टी। जो मरी नहीं थी।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, बिना आवाज़ के, बस होंठ हिलाकर। "आज तेरे बेटे को आशीर्वाद दे। आज उसे अकेले मत छोड़।"
और मैं उठा।
तभी मुझे पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई। मैं पलटा।
रणवीर सिंह खड़े थे — अकेले, किसी का सहारा नहीं। उनके पैर काँप रहे थे, उनकी साँस फूल रही थी, पर वो खड़े थे। और वो मेरी तरफ़ आ रहे थे।
टिंकू ने आगे बढ़ना चाहा, पर मीरा ने उसकी बाँह पकड़ ली।
"रुक," उसने फुसफुसाया। "उन्हें खुद आने दो।"
रणवीर सिंह मेरे पास आए। उन्होंने अपना हाथ उठाया और मेरे माथे पर रखा। उनका हाथ ठंडा था, और उसमें भी कंपन था।
और फिर उन्होंने मेरा माथा चूमा।
आधी भीड़ ने साँस रोक ली। मैं भी।
"आज तू मेरा बेटा नहीं है," उन्होंने धीरे से कहा, इतनी धीरे कि बस मैं सुन सकूँ। "आज तू मेरा गुरु है।"
"गुरुजी—"
"बीस साल मैंने इस अखाड़े में किसी को ये दाँव नहीं सिखाया," उन्होंने कहा, और उनकी आँखों में पानी था, और उन्होंने उसे पोंछा नहीं। "क्योंकि मुझे लगता था मेरे पैर नहीं हैं, तो मेरा दाँव भी नहीं है। पर तूने आज मुझे सिखाया कि दाँव पैरों में नहीं होता। साँस में होता है। और साँस आज भी मेरे अंदर है।"
उन्होंने मेरा कंधा थामा।
"जा। और उसे गिरा। पर याद रख — बिना तोड़े। आज तू जीतेगा, पर किसी की हड्डी तोड़कर नहीं। और जब वो गिरे, तो उसका हाथ थाम लेना। क्योंकि एक दिन उसे भी सच जानना है।"
मेरी आँखों से पानी बह रहा था और मैं उसे पोंछ नहीं रहा था।
"गुरुजी," मैंने कहा, "मैं—"
"चुप," उन्होंने कहा, और हँसे। "गुरु को जवाब नहीं देते। गुरु को मिट्टी में जवाब देते हैं।"
वो पलटे, और मीरा और टिंकू उन्हें सहारा देने के लिए दौड़े, पर उन्होंने हाथ उठाकर मना किया। वो अपने आप चले — धीरे, एक-एक कदम, काँपते हुए — और चौकी पर बैठ गए।
मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में एक पतला कपड़ा था।
"अपना हाथ दो," उसने कहा।
"मीरा, अभी—"
"अपना हाथ दो," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो पहले दिन थी, जब उसने मुझे अखाड़े से बाहर धकेला था।
मैंने हाथ दिया। उसने मेरी कलाई पर वो कपड़ा कसकर बाँधा — कसकर, इतना कसकर कि खून रुक जाए।
"तुम्हारी कलाई सूज गई है," उसने कहा। "अगर ये कपड़ा नहीं बाँधा होता, तो दूसरे दाँव में ही तुम्हारा हाथ जवाब दे देता।"
"तुमने देखा?"
"मैंने देखा," उसने कहा। "मैं पूरे घंटे वहीं खड़ी थी। तुम दोनों को देख रही थी। तुमने ग्यारह बार झुकना सीखा, और दस बार गलत झुके। ग्यारहवीं बार सही थे।" वो रुकी। "तुम्हारे गुरुजी ने नहीं बताया, पर तुम्हारी ग्यारहवीं बार में मैंने देखा — उनकी आँखें भर आई थीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर आज मैं—"
"मत बोलो," उसने कहा। उसकी आवाज़ नरम पड़ गई। "आज कुछ भी मत बोलो जो तुम कल नहीं कह सको।"
उसने मेरा हाथ छोड़ा और दूर जाकर अपने पिता के पास बैठ गई।
तभी अखाड़े के बाहर ढोल बजा, और बलवंत अखाड़े में उतरा। उसके चेहरे पर वो चंदन का तिलक अब और गहरा था, और उसकी आँखें — मैंने देखा — उसकी आँखें कहीं और थीं। वो भीड़ में किसी को ढूँढ रहा था।
वो जगदीश सिंह को ढूँढ रहा था। पर जगदीश नहीं आया था।
मैं अखाड़े में उतरा। चूने वाली काली मिट्टी मेरे पैरों के नीचे दबी, और मुझे लगा वो मेरी तरफ़ से बोल रही है — धीरे से, बस मेरे लिए।
ढोल बजा। भीड़ चुप हुई।
और ठीक उसी पल, जब बलवंत ने अपने दोनों हाथ उठाकर मेरी तरफ़ झपटने की तैयारी की, अखाड़े के बाहर से एक औरत की आवाज़ आई। एक आवाज़ जो दबी हुई थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पूरे अखाड़े को सुनाई दे गई।
"वीर!"
सब पलटे। मैं पलटा।
गंगा देवी अखाड़े के फाटक पर खड़ी थीं। सिर पर सफ़ेद चुनरी, हाथ में भवानी सिंह की पीली शीशी, और चेहरे पर वो झुर्रियाँ जो अब किसी डर से नहीं, किसी इंतज़ार से थीं।
वो भीड़ को चीरती हुई अंदर आईं। उनके कदम धीरे थे, पर रुके नहीं।
वो अखाड़े के किनारे पर आकर रुकीं। उन्होंने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर बलवंत की तरफ़। बलवंत का हाथ हवा में ही रुक गया।
और गंगा देवी ने अखाड़े की मिट्टी की तरफ़ देखकर कहा, इतनी ऊँची आवाज़ में कि जाली के बाहर तक सब सुनें —
"आज मैं अपने दोनों बेटों को एक साथ देखना चाहती हूँ।"
बलवंत का हाथ नीचे गिरा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"दोनों… बेटों?" उसने धीरे से कहा।
गंगा देवी ने पीली शीशी ऊपर उठाई, और मशाल की रोशनी में शीशी के अंदर का पानी सुनहरा दिखा।
"हाँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ नहीं काँपी। "दोनों।"
॥
"दोनों।"
वो शब्द अखाड़े की मिट्टी पर गिरा और फैल गया। भीड़ में एक आवाज़ भी नहीं आई। लोहे की जाली के बाहर खड़े सैकड़ों लोगों ने साँस रोक ली थी। मैंने बलवंत की तरफ़ देखा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे की मिट्टी खींच ली हो।
गंगा देवी ने शीशी अपनी छाती से लगाई, और फिर वो मेरी तरफ़ बढ़ीं। भीड़ ने रास्ता दिया। उनके कदम धीरे थे, पर एक भी कदम नहीं डगमगाया।
वो मेरे सामने आकर रुकीं। मैंने उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें देखीं। होंठ सूखे थे। पर आँखें — आँखों में वो चीज़ थी जो बीस साल के डर से ज़्यादा भारी थी। सच।
उन्होंने अपना हाथ उठाया और मेरा माथा छुआ। हाथ ठंडा था, पर उसमें कंपकंपी नहीं थी।
फिर उन्होंने मेरा माथा चूमा।
मेरी आँखें भर आईं। मुझे कुछ समझ नहीं आया। मेरे अपने पिता की मौत के बाद किसी बड़े ने मेरा माथा इस तरह नहीं चूमा था। माँ चूमती थी, पर वो माँ थी। ये कुछ और था।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, सिर्फ़ मेरे लिए, "मैंने तुझे बहुत देर से देखा। माफ़ कर दे।"
"आप—"
वो पलटीं। भीड़ की तरफ़, जाली की तरफ़, बाहर खड़े उन लोगों की तरफ़ जो मुँह बाए खड़े थे।
"मैं गंगा देवी हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अखाड़े के कोने-कोने तक पहुँची। "जगदीश सिंह की बहन। भवानी सिंह की…" वो रुकीं। एक गहरी साँस ली। "…भवानी सिंह की बीवी।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno