Spirit of a Fighter1242 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1242

7 min read November 5, 2026

"मैं साथ चलूँगा," उसने कहा। "मैं डरता हूँ, भाई — ये मैं झूठ नहीं बोलूँगा। रातों को मैं सोचता हूँ कि कल क्या होगा। पर डरने के लिए मैं घर में नहीं छिपूँगा। मैं तेरे साथ खड़ा रहूँगा, और अगर मेरे हाथ काँपेंगे, तो काँपने देंगे।"

मीरा ने उसका कंधा थपथपाया।

"तू बहाना बना," उसने कहा, "कि खीर जल गई, और देर हो गई।"

टिंकू हँसा — थोड़ा, कमज़ोर, पर हँसा।

"खीर जल गई," उसने कहा। "ये तो होना ही था।"

हम तीनों अखाड़े की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने कुछ नहीं बोला। मेरे अंदर एक ही बात चल रही थी — कल सुबह। पंद्रह दिन की तैयारी नहीं मिली। सिर्फ़ एक रात मिली।

पर जब मैंने अखाड़े का फाटक खोला और उस लाल मिट्टी को देखा — चाँद की रोशनी में, ओस से गीली, सुबह की तैयारी में बैठी — तो मुझे लगा कि एक रात भी काफ़ी है। मिट्टी ने मेरा इंतज़ार किया है। मैंने उसे नहीं छोड़ा।

कालू काका अंदर थे। वो अभी भी मिट्टी सींच रहे थे, हालाँकि रात बहुत हो चुकी थी। उन्होंने मुझे देखा और कुछ नहीं पूछा — बस एक हाथ से मिट्टी उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"लगा ले," उन्होंने कहा। "माथे पर। ये मिट्टी आज रात जाग रही है।"

मैंने मिट्टी माथे पर लगाई। वो ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी जो मेरे बचपन से है — गीली मिट्टी, पसीना, और नीम के पत्तों की कड़वाहट।

"कालू काका," मैंने कहा, "कल सुबह मुकाबला है।"

"पता है," उन्होंने कहा। "सुक्खी बुआ ने सब बता दिया। वो कभी गलत खबर नहीं लातीं — बस बढ़ा-चढ़ाकर लाती हैं।"

"मुझे आपसे कुछ पूछना है।"

"पूछ।"

"अगर मैं मैदान में गिरूँ, तो क्या ये मिट्टी मुझे उठाएगी?"

कालू काका ने सींचना बंद किया। वो मेरे पास आए। उनकी सफ़ेद दाढ़ी चाँद की रोशनी में और सफ़ेद लग रही थी, और उनकी आँखें — जो बीस साल से डरी हुई थीं — अब उसमें कुछ और था।

"मिट्टी उसी को उठाती है," उन्होंने धीरे से कहा, "जो उस पर गिरने से नहीं डरता। जो गिरकर भी उसी को थामता है। बेटा, मिट्टी का काम है — तेरे पसीने को सोखना। और तेरा काम है — उसे वापस देना। जब तू गिरे, तो उस पर मत चिल्लाना। उससे बात करना। कहना — 'मैं आ गया। उठा ले।'"

मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरा सिर सहलाया, और उनके हाथ से मिट्टी मेरे बालों में गिरी।

फिर मैं अखाड़े के बीच में गया और मिट्टी पर घुटने टेक दिए। मैंने दोनों हाथ मिट्टी में गाड़े और आँखें बंद कर लीं।

"मैं आ गया," मैंने धीरे से कहा, जैसे कोई अपनी माँ से बोल रहा हो। "उठा ले।"

और मुझे लगा — मुझे सच में लगा — कि मिट्टी मेरे हाथों के नीचे गरम हो रही है। नहीं, गरम नहीं। ज़िंदा। जैसे वो साँस ले रही हो, और मेरी साँस उसकी साँस से मिल रही हो।

रात बीती। कैसे बीती, पता नहीं चला। मुझे बस इतना याद है कि मैंने पूरी रात उस मिट्टी में घुटनों के बल रहते हुए अपने हाथों को महसूस किया। टिंकू पास में बैठा रहा, और कभी-कभी मुझे पानी पिलाता रहा। मीरा आई, उसने मेरे हाथों पर बँधी पट्टी बदली, और फिर दूर बैठ गई।

सुबह की पहली किरण अखाड़े की दीवार पर पड़ी, तो मैंने अपना सिर उठाया।

और मैंने देखा कि अखाड़े के बाहर सैकड़ों लोग खड़े थे। पूरा रामपुर आया था। मशालें बुझ चुकी थीं, और उनकी जगह सुबह की धूप थी।

सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं, हाथ में एक छोटी थैली लिए।

"अरे वीर," उन्होंने कहा, "ये थैली गुड़िया ने भेजी है। कह रही थी — भैया को दे देना, ये अखाड़े की मिट्टी है।"

मैंने थैली खोली। उसमें लाल मिट्टी थी — वही मिट्टी जो गुड़िया चुपके से लाती थी, हर रोज़, थोड़ी-थोड़ी, मेरी जेब में भरने के लिए। और थैली के नीचे एक काग़ज़ था, उसकी कॉपी का पन्ना, जिस पर उसकी बड़ी-बड़ी लिखाई थी —

"भैया, तुम उन सबको पछाड़ दोगे। मुझे पता है। — तुम्हारी गुड़िया।"

मैंने वो काग़ज़ अपनी धोती की जेब में रखा। वहीं, जहाँ वो हमेशा रखती थी। और मुझे लगा कि मेरी जेब अब भारी है।

टिंकू ने मेरा कंधा थपथपाया।

"चल," उसने कहा। "शहर का रास्ता लंबा है। और मैंने सुना है वहाँ की मिट्टी काली है — हमारी लाल जैसी नहीं।"

मैं हँसा।

"मिट्टी का रंग नहीं देखते, टिंकू। मिट्टी का पसीना देखते हैं।"

हम चले। मेरे पीछे पूरा रामपुर था, और सामने वो रास्ता जो नहर के पार शहर जाता था — वही रास्ता जिससे मीरा आई थी, बरसों पहले, किताबों का बैग लिए।

मैंने पलटकर मीरा को देखा। वो मेरे बराबर चल रही थी, कदम मिलाकर।

"डर लग रहा है?" उसने पूछा।

"लग रहा है," मैंने कहा। "पर डर के साथ एक और चीज़ है।"

"क्या?"

"ये एहसास कि आज जो भी होगा, वो मेरे हाथ में है। कोई मेरे लिए नहीं लड़ेगा। कोई मेरी जगह नहीं लड़ेगा।"

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गरम थी, और इस बार काँप नहीं रही थी।

"तुम अकेले नहीं लड़ोगे," उसने कहा। "तुम्हारी मिट्टी तुम्हारे साथ है। और मैं भी।"

दूर शहर के अखाड़े से ढोल की आवाज़ आ रही थी। और उसके साथ एक आवाज़ — बलवंत की, जो अपने गुर्गों को हुक्म दे रहा था, "आज भवानी का बेटा मिट्टी में मिलेगा।"

मैंने अपनी धोती कसी। मैंने गुड़िया की थैली से मिट्टी निकाली और माथे पर लगाई।

और मैं चला — उस आवाज़ की तरफ़, जो मुझे बुला रही थी।

॥

शहर का अखाड़ा मेरी आँखों के सामने खुला, और पहली चीज़ जो मैंने सूंघी, वो थी चूने की गंध — नया पुता हुआ चूना, ऊपर से भुरभुरा, सूख रहा था। मिट्टी नहीं। चूना। यहाँ की मिट्टी को चूने से दबा दिया गया था, जैसे किसी ने किसी की आवाज़ दबा दी हो।

अखाड़े के चारों तरफ़ लोहे की जाली थी, और जाली के बाहर सैकड़ों लोग — औरतें, बच्चे, पहलवान, बनिए, सब। शहर के लोग मुझे और मेरे पीछे चलते रामपुर को देख रहे थे, जैसे हम किसी तमाशे पर आए हों।

मीरा मेरे बराबर रुकी और मेरी कमर से बँधी रस्सी को ठीक किया।

"इनकी मिट्टी देखी?" मैंने धीरे से कहा।

"देखी," वो बोली। "ऊपर चूना, नीचे काली मिट्टी। पता नहीं कितने साल पुरानी है।"

"चूने के नीचे मिट्टी मरी नहीं है," मैंने कहा। "मरे हुए को चूना डालते हैं, बचाने के लिए नहीं।"

टिंकू मेरे पीछे से फुसफुसाया, "भाई, यहाँ तो पूरा शहर है। कोई हमें जानता नहीं, कोई हमारी तरफ़ देखकर हाथ नहीं उठा रहा।"

"तो तू हाथ उठा," मैंने कहा। "तेरी मिठाई की गंध सबसे पहले मेरी नाक तक पहुँचेगी।"

उसने मेरी पीठ पर हल्की हँसी छोड़ी, पर उसकी हँसी में वो धमक नहीं थी जो गाँव में थी।

तभी अखाड़े के फाटक खुले और दो गुर्गे बाहर आकर रास्ता बनाने लगे। उनके पीछे बलवंत आया — लाल लंगोट, चौड़े कंधे, माथे पर लाल चंदन का तिलक। उसने मुझे देखा और होंठ सिकोड़कर मुस्कुराया।

"भवानी का बेटा आ गया," उसने ऊँची आवाज़ में कहा, ताकि सब सुनें। "देखो, रामपुर से चलकर आया है — पैदल। मेरे गुर्गे तो गाड़ी में आए थे।"

भीड़ में कुछ लोग हँसे। पर एक बूढ़ा आदमी जाली के पास खड़ा था, उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कहे, "मत सुन इसे।"

मैंने बलवंत को जवाब नहीं दिया। मैं सीधा अखाड़े की तरफ़ बढ़ा।

"रुक," बलवंत ने रास्ता रोका। "मुकाबला सूरज ढलने पर है। तब तक तू इस अखाड़े की मिट्टी को हाथ नहीं लगा सकता। ये मेरा अखाड़ा है।"

"तेरा?" मैंने कहा।

"जिसने बनवाया, उसका।"

"भवानी सिंह ने बनवाया था," मैंने कहा। "या तेरे गुरुजी ने?"

बलवंत की आँखें सिकुड़ीं। उसके कान के नीचे की नस उभर आई। पर इससे पहले कि वो कुछ कहता, भीड़ में से कोई बोला —

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