Spirit of a Fighter1240 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1240

7 min read November 5, 2026

मेरे हाथ से लालटेन फिसल गई। शीशा टूटा और तेल ज़मीन पर फैल गया। आग एक पल में भड़की और मैंने अपनी धोती से उसे पीटकर बुझाया।

जब उठा तो जगदीश सिंह जा चुका था। दरवाज़े के बाहर उसकी लाठी की आवाज़ दूर हो रही थी — टिक, टिक, टिक — जैसे कोई पुरानी घड़ी धीरे-धीरे मर रही हो।

मैंने चिट्ठी निकाली और दोबारा पढ़ी। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे।

हवेली की नींव में।

मैं उसी रात अखाड़े लौटा और तहखाने में गया। मिट्टी पर लिखी गंगा देवी की बात अब भी वहाँ थी, पर मैंने उसके नीचे अपनी उँगली से एक लाइन जोड़ी।

"माँ, मैं सुन रहा हूँ।"

फिर मैंने अपने दोनों हाथ उस मिट्टी में डाले और आँखें बंद कर लीं। मिट्टी ठंडी थी, पर मेरे हाथों में जो कंपन आ रहा था वो ठंडक नहीं था।

मुझे पता था कि अगले पंद्रह दिन क्या करना है। बलवंत को उसकी माँ का सच बताना है। हवेली की नींव खोदनी है। और उस मुकाबले के लिए तैयार होना है जिसमें शहर भर के पहलवान मेरे खिलाफ़ होंगे।

टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था। उसने मेरा चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। बस एक थाली आगे बढ़ाई, जिसमें गरम खीर थी।

"माँ ने भेजी है," उसने कहा। "कह रही थीं — अकेले नहीं खाना।"

मैंने थाली ली। पहला चम्मच मुँह में डाला, तो सरस्वती की चक्की की आवाज़ याद आई — सुबह चार बजे की वो घरघराहट, जिसमें मेरा पूरा बचपन बीता था।

"टिंकू," मैंने कहा। "कल से हम दोनों साथ लड़ेंगे।"

टिंकू ने टोपी सीधी की और बोला, "मैं तो कल से कसरत भी शुरू करने वाला था।" फिर वो हँसा। "पर अब सोच रहा हूँ — खीर खिलाने से ही मेरा पूरा काम हो जाएगा।"

और मैं हँसा। पहली बार उस दिन में सच में हँसा।

पर हँसी के बीच मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी।

हवेली की नींव। बीस साल से ज़मीन के नीचे, किसी को पता नहीं। और जिस दिन वो नींव खुलेगी, उस दिन जगदीश सिंह का सबसे बड़ा झूठ हवा में उड़ जाएगा।

मैंने थाली खत्म की। मिट्टी पर माथा टेका। और फिर उठकर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।

सुबह होने में अभी देर थी। पर मेरे लिए सुबह अभी शुरू हो चुकी थी।

॥

मैं सीढ़ियों से ऊपर आया तो आँगन में सन्नाटा था। पर वो सन्नाटा झूठा था। मुझे दूर से ही सुना — जगदीश सिंह की लाठी टिक-टिक कर रही थी, और साथ में चार जोड़ी चप्पलों की आवाज़। मैंने कदम बढ़ाए। आँगन के बाहर नीम के पेड़ के नीचे जगदीश सिंह खड़ा था, उसके चारों तरफ़ चार गुर्गे — लंबे, काले कुर्ते पहने, हाथों में सोंटे।

जगदीश ने मुझे देखा और लाठी रोक दी।

"लौट आया?" उसने कहा। "मुझे लगा तू सीढ़ियों पर ही मर जाएगा। बूढ़े आदमी की बात सुनकर।"

मैं उसके पास गया। मेरी धोती पर अब भी तेल का दाग़ था। मेरे हाथ में कुछ नहीं था। पर मैं उसके सामने खड़ा हो गया, इतने पास कि उसकी मूँछों में लगा तेल मुझे सूंघाई दे — नारियल और कपूर मिला हुआ।

"तुमने कहा था," मैंने धीरे से कहा। "बलवंत की माँ को मारने का हुक्म तुमने दिया।"

"हाँ।" उसने ठुड्डी ऊपर की। "मैंने कहा।"

"अपने बेटे की माँ को।"

"वो मेरा बेटा नहीं है।" जगदीश की आवाज़ में पहली बार कुछ चटका। "वो भवानी का बच्चा है। भवानी जिसने मुझे हर बार हराया। जिसने मेरे भाई को मेरे हाथ से छीना। तू सोचता है मैं उसके बच्चे को पालूँगा? मैंने उसे इसलिए पाला कि वो बड़ा होकर भवानी के नाम पर कलंक बने। कि जब वो हारे, तो लोग कहें — 'ये भवानी का बेटा है और ये हार गया।'"

मेरे पेट में एक झटका लगा। पर मैं हिला नहीं।

"तुम्हारी उस चाल में एक कमी रह गई," मैंने कहा। "तुमने बलवंत को भवानी से नफ़रत सिखाई। पर तुमने उसे उसका बाप कभी नहीं दिखाया। और जिस दिन उसे सच पता चलेगा — कि तुमने उसकी माँ की जान ली — उस दिन तुम्हारा सब कुछ खत्म हो जाएगा।"

जगदीश का चेहरा बदला। मैंने उसे पहली बार देखा — डर। बहुत छोटा, एक पल का। पर था।

"तू मुझे धमकाता है?" उसने लाठी उठाई। "तेरे पास क्या है? सबूत? कोई काग़ज़? कोई गवाह? तेरी माँ? मेरी ही बहन? जिसने बीस साल भैरव के साथ गुज़ारे? तेरी गंगा देवी? जो पागल है?"

गुर्गों ने एक कदम आगे बढ़ाया। मैंने उनके सोंटे देखे। एक ही हाथ में मेरी तरफ़ बढ़ा, पर मैंने अपने पैर जमाए रखे।

"सबूत मेरे पास है," मैंने कहा। "और वो काग़ज़ नहीं है। वो ज़िंदा है। बलवंत खुद सबूत है। जिस दिन उसकी आँखें खुलेंगी, उस दिन तुम्हारे बीस साल के झूठ की जड़ उखड़ जाएगी।"

जगदीश ने लाठी ऊपर उठाई। मैंने आँखें बंद नहीं कीं।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

"लाठी नीचे करो।"

मैंने पलटकर देखा। मीरा आ रही थी — दौड़ती हुई, कुर्ते के घुटने पर कीचड़, हाथ में उसका बैग। और उसके पीछे — टिंकू, और टिंकू के पीछे… पूरा रामपुर।

सुक्खी बुआ आगे थीं, चमकीली साड़ी में, हाथ में पान का बीड़ा, मुँह में कुछ बुदबुदाती हुई। उनके पीछे दर्जन भर आदमी थे, हाथों में मशालें और लाठियाँ। किसी के हाथ में डंडा था, किसी के हाथ में फावड़ा।

"अरे मैंने तो सुना है," सुक्खी बुआ ने आते ही कहा, "कि कोई हमारे वीर पर हाथ उठाने आया है। और मैंने सोचा, ज़रा देख तो आएँ।"

जगदीश ने मशालों के जलते सिर देखे। उसके गुर्गों के हाथ ढीले पड़ गए।

"ये तुम्हारा झगड़ा नहीं है," जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ में तेवर था, पर हल्का। "ये अखाड़े का मामला है।"

"अखाड़े का मामला?" टिंकू आगे आया। उसकी टोपी तिरछी थी और हाथ काँप रहे थे, पर वो आगे आया। "अखाड़े में जिसकी मिट्टी में मेरा भाई पसीना डालता है, वो अखाड़ा हमारा है। तो मामला हमारा भी है।"

मेरे पीछे भीड़ में से कोई बोला — "वीर को कोई छूएगा तो हम देखेंगे।"

जगदीश ने धीरे-धीरे सबको देखा। फिर उसने अपनी लाठी नीचे की।

"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फिर मीठी हो गई, जैसे कुछ नहीं हुआ। "अच्छा। तो ये गाँव अभी भी भवानी के नाम पर चलता है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पंद्रह दिन। मैदान में। और वहाँ कोई भीड़ नहीं बचाएगी। वहाँ मिट्टी बोलेगी।"

वो मुड़ा और मशालों की रोशनी में उसकी लाठी की टिक-टिक दूर होती गई। गुर्गे उसके पीछे-पीछे गए।

जब वो गए, तो मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे हिली। मैंने दीवार का सहारा लिया। मेरी साँस बाहर आ रही थी, और अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मैंने कितनी देर साँस रोकी थी।

टिंकू मेरे पास आया। वो सच में काँप रहा था — उसके होंठ, उसके हाथ, उसकी आवाज़।

"भाई," उसने धीरे से कहा, "मैं तो काँप रहा हूँ। तू इनसे ऐसे कैसे लड़ता है? बिना हथियार, बिना डर?"

मैं हँसा। मेरी हँसी कमज़ोर थी, थकी हुई। पर सच्ची।

"मैं नहीं लड़ता," मैंने कहा। "मिट्टी लड़ती है। मैं तो बस उसके नीचे खड़ा रह जाता हूँ।"

टिंकू ने मेरी बात समझी या नहीं, पता नहीं। पर उसने मेरा हाथ पकड़ा और ज़ोर से दबाया। उसकी हथेली में हल्दी की गंध थी।

मीरा ने भीड़ को समझाकर विदा किया। सुक्खी बुआ जाते-जाते मेरे कान में बोलीं, "बेटा, मैं तो जानती हूँ तू जीतेगा। पर सुन — मैंने एक बात सुनी है। बलवंत के गुर्गे तुझे डराने के लिए नहीं आए थे। वो तेरे हाथ की मिट्टी की गंध देखने आए थे। जगदीश जानना चाहता है कि तू किस मिट्टी से खेल रहा है।"

वो चली गईं। मैं उनकी बात सोचता रहा।

मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ उठाया — उसी हाथ से मैंने तेल बुझाया था। उँगलियों पर छाले थे, और एक जगह खाल उधड़ी थी।

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