Spirit of a Fighter1239 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1239

7 min read November 5, 2026

"अरे वीर!" वो उठकर मेरी तरफ़ आईं। "मैं तेरी ही राह देख रही थी। रात को इतनी देर तक कहाँ घूमता है तू? माँ जानती है?"

"बुआ, अभी वक़्त नहीं है। मुझे हवेली जाना है।"

"हवेली?" उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। "अभी? इस वक़्त? वीर, तू पागल हो गया है। अरे मैंने तो सुना है कि बलवंत ने तेरे खिलाफ़ शहर के सारे पहलवानों को बुला लिया है। सारे! और वो सब मुकाबले में तेरे खिलाफ़ एक साथ लड़ेंगे। एक साथ, वीर! जैसे पंद्रह-बीस आदमी एक चींटी पर…"

मैं हँस पड़ा। बिना सोचे। और मेरी हँसी इतनी ज़ोर की थी कि सुक्खी बुआ चौंककर एक कदम पीछे हट गईं।

"तू हँस रहा है?"

"बुआ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में जो था, वो मुझे खुद अजीब लगा। "जितने ज़्यादा आएँगे, उतनी ज़्यादा मिट्टी को ताकत दिखाने का मौका मिलेगा।"

वो मेरी तरफ़ देखती रह गईं। फिर उन्होंने पान का बीड़ा मुँह में डाला और कहा, "तेरे पिता भी ऐसा ही बोलते थे।"

मैं रुक गया। "कौन से पिता?"

वो एक पल के लिए चुप हुईं। फिर बोलीं, "भवानी सिंह।" और वो तेज़ी से पलटकर अपने घर की तरफ़ चल दीं, जैसे कुछ ऐसा बोल दिया हो जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था।

मैं उनके पीछे नहीं गया। मैं हवेली की तरफ़ चल दिया।

हवेली का मुख्य दरवाज़ा खुला था। मुझे अंदर आते देख किसी ने रोका नहीं। आँगन में चुप्पी थी और दीवार पर लगी मशालें बुझ रही थीं — पीली लौ, धुआँ, तेल की गंध। मैं सीधे उस कमरे में गया जहाँ गंगा देवी को रखा गया था।

कमरा खाली था।

चारपाई पर चादर बिखरी थी। एक कोने में पानी का घड़ा उलटा पड़ा था। और चारपाई के पास, छोटी सी मेज़ पर, एक काग़ज़ रखा था — ईंट के टुकड़े से दबाया हुआ, ताकि हवा उड़ा न ले।

मैंने उसे उठाया। काग़ज़ पुराना था, पर लिखाई ताज़ी — वही टेढ़ी 'क', वही मुड़ी हुई 'म'।

"बेटा,

अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं तेरे पास नहीं हूँ। और ये अच्छा है। क्योंकि जहाँ मैं जा रही हूँ, वहाँ से मैं तुझे बचा नहीं पाऊँगी। पर वो मुझे जाने देगा — उसे लगता है कि मैं उसके हाथ में हूँ।

एक बात याद रखना। बलवंत को बचाना। वो मेरा बेटा है।

हाँ, बेटा। तेरा भाई है वो — सुहानी का बेटा, जो मेरी बहन थी और जिसे मैं बचा नहीं पाई। मैंने तुझसे ये बात पहले नहीं कही, क्योंकि मुझे डर था कि तू उसे दुश्मन समझेगा और लड़ पड़ेगा। पर अब वक़्त आ गया है।

बलवंत को बताना कि उसकी माँ ने उसे कभी छोड़ा नहीं। उसे भैरव ने चुराया था। जिस रात सुहानी मरी, वो रात मेरी ज़िंदगी की सबसे लंबी रात थी। मैंने उसके हाथ पकड़े थे और वो मुझसे कुछ कह रही थी, पर मैं सुन नहीं पाई। मैं सिर्फ़ इतना समझ पाई कि वो मुझे अपने बेटे की क़सम दे रही थी।

मैंने वो क़सम निभाई है, बेटा। बीस साल। हर दिन।

मुकाबले के दिन मैं आऊँगी। मुझे उस दिन की ज़रूरत है। क्योंकि उस दिन सब इकट्ठे होंगे — पहलवान, पंचायत, और वो। और उस दिन मेरी गवाही सबसे ज़्यादा सुनी जाएगी।

तू बस लड़ता रह। मिट्टी तेरे साथ है।

तेरी माँ"

मैं उस काग़ज़ को सीने से लगाकर बैठ गया। फ़र्श ठंडा था। मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं रो नहीं रहा था — मैं हँस रहा था। बिना आवाज़ के। होंठ काँप रहे थे और आँखों से पानी बह रहा था और मुझे पता भी नहीं चल रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ।

बलवंत मेरा भाई है। मौसेरा भाई — नहीं, इससे भी बड़ा। हमारी माँएँ बहनें थीं। उसकी माँ ने अपनी जान दी और मेरी माँ ने बीस साल उसका बोझ उठाया। और मैं उससे लड़ने जा रहा था।

"माँ," मैंने फुसफुसाया। "तूने मुझे एक और भाई दिया। और मैं उसे बचाऊँगा।"

काग़ज़ को मैंने अपनी धोती की जेब में रखा, पास ही जहाँ भवानी का ख़त रखा था। दोनों काग़ज़ अब साथ थे।

पीछे से आवाज़ आई। "मिल गई चिट्ठी?"

मैं पलटा।

दरवाज़े पर जगदीश सिंह खड़ा था। हाथ में लाठी, सफ़ेद धोती, कंधों पर शॉल। उसकी आँखें अंधेरे में भी चमक रही थीं — वैसे चमकती हैं जब किसी बूढ़े को लगता हो कि उसने आख़िरकार कुछ जीत लिया है।

"कैसे पता आपको?" मैंने पूछा।

"क्योंकि ये चिट्ठी मेरी इजाज़त से रखी गई है।" वो मुस्कुराया। "मैं चाहता था कि तू उसे पढ़े। तू वैसे भी नहीं मानता। तुझे खुद पढ़ना था, खुद रोना था। यही तो तेरे बाप की आदत थी — सच को दिल से लगाना।"

"आप मेरे बाप की बात नहीं करें।"

"क्यों नहीं?" वो अंदर आया। लाठी ज़मीन पर टिकाता हुआ, एक-एक कदम। "मैंने उसे बड़ा किया, वीर। मैंने उसे पहलवानी सिखाई, जब वो गाँव का एक मामूली लड़का था। मैंने उसकी शादी करवाई। और उसने मुझे क्या दिया? वो मुझसे बड़ा बन गया। उसका अखाड़ा मेरे अखाड़े से बड़ा हो गया। गाँव के लोग उसके नाम पर सिर झुकाने लगे।"

"और इसलिए आपने उसे मरवा दिया?"

"मैंने उसे मरवाया नहीं।" उसकी आवाज़ सपाट थी। "मैंने उसे चुना दिया। उसके सामने दो रास्ते रखे — मेरे साथ रह या मेरे आगे आ। उसने आगे आना चुना।"

"और भैरव?"

"भैरव मेरा हाथ था।" वो मेरी तरफ़ और करीब आया। "अब भी है। भले वो जेल में बैठा हो। भले बलवंत उससे भाग गया हो। हाथ कट जाए तो इंसान मरता नहीं।"

मैंने अपनी मुट्ठी भींची। "बलवंत को तुमने उसकी माँ के बारे में झूठ बोला।"

"मैंने उसे वो बताया जो उसके लिए अच्छा था।" जगदीश ने कहा। "उसे बताता कि उसकी माँ मर गई, तो वो रोता रहता। मैंने उसे बताया कि उसकी माँ को भवानी ने मरवाया। इससे उसमें आग पैदा हुई। और आग वाले लड़के बड़े पहलवान बनते हैं।"

"और बलवंत को ये कब पता चलेगा कि उसकी माँ को भैरव ने मारा था?"

जगदीश सिंह का चेहरा एक पल के लिए बदला। बहुत हल्का। पर मैंने देखा।

"बलवंत को ये जानने की ज़रूरत नहीं है।"

"क्योंकि अगर उसे पता चलेगा, तो वो तुम्हारे खिलाफ़ लड़ेगा।"

वो हँसा। पर ये हँसी पहले जैसी नहीं थी। इसमें एक झुँझलाहट थी। "बलवंत मेरे खिलाफ़ नहीं लड़ेगा। उसने मेरी मिट्टी में हाथ डाला है। वो मेरा है।"

"वो किसी का नहीं है," मैंने कहा। "वो भवानी का बेटा है। और भवानी ने उसे कभी नहीं छोड़ा। भवानी ने उसे ज़िंदा रखने के लिए अपनी जान दे दी। तुमने उसे चुराया, जगदीश। तुमने उसे उसकी माँ से चुराया।"

जगदीश सिंह की आँखें सिकुड़ीं। "तेरे बाप ने भी तो तुझे मेरे सामने खड़ा कर दिया। तेरे होने की खबर मुझे बीस साल बाद मिली। और मैंने क्या किया? मैंने तुझे मारा नहीं। मैंने तुझे देखा। तू उसी तरह का है — वही ज़िद, वही मिट्टी से प्यार, वही सीधी बात। तू भवानी की परछाई है।"

"तो फिर मुझे मार क्यों नहीं देते?"

"क्योंकि मैं देखना चाहता हूँ।" वो मेरे पास आकर रुका। "मैं देखना चाहता हूँ कि भवानी का बेटा मुकाबले में कैसा लड़ता है। और मैं देखना चाहता हूँ कि जब वो हारे, तो उसका चेहरा कैसा होता है। मैं बीस साल पहले वो चेहरा नहीं देख पाया। भवानी जब मरा, तो वो होश में नहीं था। उसकी आँखें बंद थीं। मुझे उसकी हार देखनी थी, पर मिली सिर्फ़ लाश।"

मेरा गुस्सा ठंडा हो गया। और उस ठंडक में एक चीज़ साफ़ दिखी — ये आदमी मुझसे नहीं, अपने आप से लड़ रहा था। बीस साल से।

"अब बलवंत का क्या?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ शांत थी। "वो मेरे साथ लड़ेगा। तुम्हें क्या लगता है?"

जगदीश सिंह मुस्कुराया। और वो मुस्कान अब सच्ची थी — यानी ज़्यादा खतरनाक।

"बलवंत को बचाना है?" उसने धीरे से कहा। "तो पहले ये जान ले — बलवंत की माँ को मरने का हुक्म मैंने दिया था। और उसकी लाश आज भी हवेली की नींव में है।"

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