Spirit of a Fighter1238 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1238

7 min read November 5, 2026

मैं चुप रहा। उसकी उँगलियाँ मेरे हाथ पर थीं — हल्की, पर पक्की। उसने पट्टी बाँधी तो मैंने उसके हाथ काँपते देखे। जैसे पिछले कई बार देखे थे।

"तेरे हाथ काँप रहे हैं," मैंने कहा।

"तेरे भी काँप रहे थे," उसने जवाब दिया, और पट्टी खींचकर गाँठ लगा दी। "अब चल। मुझे भूख लगी है। और तेरी माँ ने कहा था कि आज रात खिचड़ी बनाई है।"

"माँ ने कब कहा?"

वो मुस्कुराई। पहली बार सीधे मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराई।

"जब तू अखाड़े में पसीना बहा रहा था, तब मैं उनके पास बैठी थी। और उन्होंने मुझे अपने हाथ से पहला निवाला खिलाया।" उसकी आवाज़ नरम हो गई। "उन्होंने कहा — बेटी, तू तो मेरे घर की हो गई।"

मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा। हम दोनों चुपचाप घर की तरफ़ चले। रास्ते में नीम की पत्तियाँ पैरों के नीचे चरमराती रहीं।

घर पहुँचे तो सरस्वती चूल्हे पर थीं। गुड़िया पास में बैठी थी और कुछ बड़बड़ा रही थी। मैंने देखा — खिचड़ी की भाप में वो गंध थी जो मुझे बचपन से पता थी। घी, जीरा, हल्दी।

खाते वक़्त किसी ने कुछ नहीं कहा। पर टिंकू ने जब दूसरी थाली माँगी, तो सरस्वती ने कहा, "तेरे हिस्से की खीर अलमारी में रखी है। जा, खा ले।"

टिंकू का मुँह खुला रह गया। "माँ को कैसे पता?"

"माँ को सब पता है," सरस्वती ने कहा, और उसके सिर पर हाथ फेरा। "बस माँ चुप रहती है।"

खाने के बाद मैं अखाड़े लौटा। तहखाने का रास्ता अब मुझे पता था — कुएँ की सीढ़ियाँ, फिर वो लोहे का दरवाज़ा जो कालू काका ने एक बार खोला था। मैं नीचे उतरा। लालटेन की रोशनी में मिट्टी चमक रही थी — वही मिट्टी जिसके बारे में कालू काका कहते थे कि वो झूठ नहीं बोलती।

मैंने अपनी धोती उतारी और मिट्टी पर लेट गया। ठंडक शरीर में उतर गई। तहखाने की गंध नम थी — पुरानी मिट्टी, बंद हवा, और कहीं दूर से आती पानी की बूँद की आवाज़।

मेरी आँखें अपने आप बंद हो गईं।

और मैंने सपना देखा।

सपने में मैं अखाड़े में खड़ा था, पर अखाड़ा और था — बड़ा, खुला, आसमान के नीचे। मिट्टी लाल नहीं, सुनहरी थी। और सामने एक आदमी बैठा था — बड़ा शरीर, चौड़े कंधे, सफ़ेद धोती। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

मैंने उसे पहचाना। भवानी सिंह।

वो उठा। मेरी तरफ़ आया। उसके पैर मिट्टी में गड़े थे — कोई आवाज़ नहीं। उसने मेरा कंधा पकड़ा। उसके हाथ में वो गर्मी थी जो माँ के हाथ में होती है — जब वो बुखार में माथा सहलाती है।

"बेटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ दूर से आ रही थी, जैसे कुएँ के पार से। "कल मैदान में उतरना। पर पहले अपनी माँ का हाथ पकड़ना।"

"कौन सी माँ?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ बच्चे जैसी थी।

वो मुस्कुराया। "जो तेरे सामने रो रही है। सब को पकड़ना। एक भी मत छोड़ना।"

फिर वो पीछे हटा और मिट्टी में घुलने लगा — जैसे कोई पुरानी तस्वीर पानी में। आख़िरी पल उसने अपना हाथ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने हाथ बढ़ाया। पर पकड़ नहीं पाया।

जागा तो तहखाने में अंधेरा था। लालटेन बुझ चुकी थी। पर मेरे शरीर में वो जमावट थी जो पहले नहीं थी — जैसे मिट्टी ने मेरे अंदर कुछ भर दिया हो।

मैं उठा। कमर में दर्द था। हाथ में अभी भी मीरा की पट्टी बँधी थी। मैंने लालटेन जलाई — और रोशनी में मिट्टी पर कुछ दिखा।

किसी ने उँगली से लिखा था।

मैं झुका। अक्षर साफ़ थे, पर लिखने वाले का हाथ काँपा था — कुछ अक्षर टेढ़े, कुछ अधूरे।

"बलवंत की माँ हवेली के कुएँ में नहीं है। वो मर चुकी है। और उसे भैरव ने मारा था।"

मेरी साँस रुक गई।

मैंने चारों तरफ़ देखा। तहखाने का दरवाज़ा बंद था। मिट्टी पर मेरे पैरों के निशान थे और किसी और के नहीं।

किसी और के नहीं।

मैंने उस लिखाई को दोबारा पढ़ा। और मेरी नाक में एक गंध आई — हल्की, बहुत हल्की। जैसे किसी ने मेरे पास खड़े होकर साँस छोड़ी हो और फिर चुप हो गया हो।

कपूर की गंध।

॥

कपूर की गंध मेरे नाक में रह गई, जैसे किसी ने साँस छोड़ी हो और भाप बनकर मेरे चेहरे पर बैठ गई हो। मैं उठकर खड़ा हुआ। घुटने काँप रहे थे। मिट्टी पर लिखे अक्षर अब भी वैसे ही थे — टेढ़े, काँपते, जल्दी में लिखे हुए। मैंने उँगली से उन्हें छुआ तो मिट्टी अभी भी नम थी।

लिखने वाला यहाँ से अभी-अभी गया था। या यहाँ अभी भी था।

मैंने लालटेन ऊपर उठाई और चारों तरफ़ घुमाई। दरवाज़ा बंद। दीवारें खाली। सिवाय मेरे पैरों के, कोई निशान नहीं। पर मेरी नाक कह रही थी कि इस कमरे में कोई और भी है — कहीं दीवार के अंदर, कहीं हवा में, कहीं उस मिट्टी के नीचे जिस पर मैं सोया था।

मैं सीढ़ियों की तरफ़ भागा। ऊपर कुएँ के मुँह पर कालू काका बैठे थे, लालटेन उनके पास रखी थी, और वो अपने घुटनों पर सिर रखे कुछ बुड़बुड़ा रहे थे। मेरी चप्पल की आवाज़ सुनकर उन्होंने सिर उठाया।

"काका, नीचे चलिए। जल्दी।"

"क्या हुआ?" उनकी आवाज़ में नींद थी। "तू तो सो गया था। मैं यहीं बैठा था।"

"कुछ है नीचे। कुछ लिखा है। आपको देखना होगा।"

वो उठे। उनकी कमर झुकी हुई थी और सीढ़ियाँ उतरते वक़्त उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। नीचे पहुँचकर मैंने लालटेन उस मिट्टी पर रखी जहाँ लिखाई थी।

कालू काका झुके। उनके हाथ जमीन के पास गए, पर छुए नहीं। बस उनकी उँगलियाँ हवा में काँपती रहीं। और फिर उन्होंने वो किया जो मैंने कभी नहीं देखा था — वो घुटनों के बल बैठ गए और अपना माथा मिट्टी पर रख दिया, जैसे किसी की कब्र पर रखा जाता है।

"काका?"

"ये लिखाई…" उनकी आवाज़ गले में फँस गई। "ये तो गंगा देवी की है।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या?"

"मैंने ये लिखाई बहुत देखी है, बेटा।" वो उठे, पर उनकी आँखों में पानी था। "गंगा देवी जब अखाड़े में आती थीं, तो बोर्ड पर चॉक से लिखती थीं — किस पहलवान का क्या हिसाब है। उनका 'क' ऐसा ही टेढ़ा होता था। और 'म' के पैर में जो मोड़ है, वो किसी और के हाथ का नहीं हो सकता।"

"पर वो तो हवेली में कैद है। मैंने खुद देखा —"

"तो इसका मतलब वो बाहर आ चुकी है।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "और वो चाहती है कि ये बात कोई पढ़े। कोई जो नीचे आए। जो मिट्टी पर सोए।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "वो जानती थी कि मैं यहाँ आऊँगा?"

"वो सब जानती है, बेटा।" कालू काका ने धीरे से कहा। "यही तो उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है।"

मैंने एक बार फिर लिखाई पढ़ी। "बलवंत की माँ हवेली के कुएँ में नहीं है। वो मर चुकी है। और उसे भैरव ने मारा था।"

मेरा दिल बैठ गया। अगर ये सच था, तो बलवंत को कितना बड़ा झूठ जीना पड़ा था — अपनी माँ के बारे में, अपने गुरु के बारे में, अपने आप के बारे में।

"काका, मुझे हवेली जाना है। अभी।"

"रात है, बेटा।"

"तो रात ही सही।"

कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने अपनी लाठी उठाई। "मैं चलूँ तेरे साथ?"

"नहीं। आप यहाँ रहिए। अगर गंगा देवी लौटकर आएँ, तो उन्हें रोकिए। उनसे कहिए कि मैं उन्हें ढूँढ रहा हूँ।"

वो सिर हिलाकर रुक गए। मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, कुएँ का ढक्कन हटाया और बाहर निकला। रात की हवा चेहरे पर लगी तो पता चला कि मेरा पूरा शरीर पसीने में डूबा था।

अखाड़े के बाहर निकला तो रास्ते पर कोई बैठा था। मैं चौंका, पर फिर पहचाना — सुक्खी बुआ। उनकी चमकीली साड़ी अंधेरे में भी चमक रही थी। हाथ में पान का बीड़ा था और वो किसी चीज़ से डरी हुई लग रही थीं।

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