Spirit of a Fighter – Chapter 124
"तेरा गला तो मैं छुड़ा लूँगा," मैंने कहा। "अभी मीरा के पैर नहीं उठ रहे। उसे जगह चाहिए जहाँ शांति हो।"
मीरा की साँस मेरे कंधे पर चल रही थी — छोटी, तेज़। उसकी कलाई मेरी मुट्ठी में थी और मुझे लग रहा था जैसे कोई पकड़े हुए तितली को दबा रहा हो।
हम पीछे के रास्ते से गए — वो रास्ता जो नहर के किनारे से नीम के पेड़ के पीछे मुड़ता है। यहाँ दिन में भी कोई नहीं आता, रात तो और भी नहीं। मैं आगे था, मीरा बीच में, टिंकू पीछे। मैं रुक-रुककर सूंघता जा रहा था। हवा में कुछ नहीं था — बस नीम की कड़वाहट और मिट्टी की भीगी गंध, जैसे अभी-अभी बारिश हुई हो, जबकि आसमान साफ़ था।
फिर मैंने रुककर पीछे मुड़कर देखा।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"तुम्हारा बैग?"
"क्या?"
"तुम्हारा बैग कहाँ है?"
मीरा ने अपने कंधे की तरफ़ देखा। बैग नहीं था। उसका चेहरा एक पल में सफ़ेद पड़ गया।
"वो… वो अखाड़े के बाहर गिर गया था। जब वो लोग मुझे पकड़ रहे थे। रिपोर्ट उसी में थी।"
मैंने वापस देखा। सड़क का मोड़ अँधेरा में डूब रहा था। लज्जो वहाँ से जा चुकी थी। पर मेरी नाक में अब भी वो गंध थी। मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। फिर मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सिर के अंदर एक तार खींच दिया हो।
धतूरा। मिट्टी का तेल। इत्र। और… मीरा के बैग की गंध — तुलसी, अदरक, काली मिर्च।
"बैग उठा लिया गया है," मैंने कहा। "लज्जो ने। और वो… वो कुछ और भी है।"
"क्या?"
"मुझे नहीं पता। पर जो भी है, वो मेरे साथ चल रहा है।"
टिंकू ने अपना डिब्बा सीने से चिपका लिया।
"भाई, ये बातें मेरी समझ से बाहर हैं। पहले मैं सोचता था मिठाई में शक्कर कम पड़ जाना बड़ी बात है।"
मैं हँसा नहीं। पर मेरे अंदर कहीं एक हल्की सी गरमाहट आई। टिंकू ऐसे ही होता है — सबसे बुरे वक़्त में भी कुछ ऐसा बोल जाता है कि लगता है ज़िंदगी अभी खत्म नहीं हुई।
हम पीछे के रास्ते से अखाड़े की मिट्टी की दीवार तक पहुँचे। दीवार ऊँची थी, पर पिछवाड़े में एक जगह ऐसी थी जहाँ से मिट्टी खिसकी हुई थी। बचपन में यहीं से मैं छिपकर कुश्ती देखता था।
मैंने ईंट का सहारा लिया और दीवार पर चढ़ गया। पीछे मुड़कर हाथ बढ़ाया। मीरा ने पकड़ा। उसके पैर अब भी काँप रहे थे, पर वो चढ़ी। टिंकू आख़िर में आया — और एक बार फिसलकर गिरा भी, जिस पर उसने खुद कहा, "मैं कसरत कल से शुरू करूँगा, भाई।"
दीवार के उस पार अखाड़ा सुनसान पड़ा था। मिट्टी का बड़ा गड्ढा बीचोबीच खोदा हुआ था — जैसे किसी ने रात में कुछ खोजा हो। कालू काका की लालटेन कहीं दिख नहीं रही थी। अखाड़े के पीछे एक पुरानी कोठरी थी — जिसमें मैंने कभी अंदर जाने की हिम्मत नहीं की थी। वहाँ भैरव अपने पुराने औज़ार रखता था। रस्सियाँ, लोहे की गोलियाँ, गदा।
मैंने रुककर सूंघा।
हवा में अब सिर्फ़ नीम और मिट्टी नहीं थी। कुछ और था। कड़वा। पसीने जैसा। डर जैसा।
"यहाँ कोई है," मैंने फुसफुसाया।
"कहाँ?" टिंकू ने पूछा।
"कोठरी की तरफ़।"
हम दबे पाँव बढ़े। मीरा मेरे पीछे थी और उसका हाथ मेरी कमीज़ में उलझा हुआ था। कोठरी का दरवाज़ा थोड़ा खुला था और भीतर से एक पीली रोशनी आ रही थी — किसी चिमनी या लालटेन की।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया।
भीतर एक टीन की मेज़ पड़ी थी, एक टूटी कुर्सी, और कोने में एक चटाई। चटाई पर वो पड़ी थी।
मेरी साँस रुक गई।
मीरा। या उसका जैसा कोई? नहीं। यह मीरा थी। असली। उसके हाथ पीछे बँधे थे और पैर एक रस्सी से बँधे थे। चेहरे पर धतूरे की तरह पीली परछाई पड़ी थी। मुँह पर कपड़ा बँधा था। आँखें बंद।
मैं भागा। घुटनों के बल उसके पास बैठा। पहले मुँह का कपड़ा खोला, फिर हाथों की रस्सी।
"मीरा! मीरा!"
उसने आँखें नहीं खोलीं। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रखा। उसके होठ सूखे थे। माथे पर हल्का पसीना था।
"टिंकू, पानी।"
टिंकू ने अपनी थैली से पानी की बोतल निकाली। मैंने अपनी हथेली में पानी लिया और उसके मुँह पर छींटे मारे।
टिंकू मेरे कंधे के ऊपर से झाँक रहा था।
"भाई, वो ज़िंदा है न?"
"हाँ।"
"तो रो मत।"
मुझे पता ही नहीं चला कि मेरी आँखें भर आई थीं। आवाज़ फटी हुई थी।
मीरा ने धीरे से आँखें खोलीं। पहले उसने छत को देखा, फिर मेरे चेहरे को। और उसके होठों से पहला शब्द निकला, बहुत धीमे से।
"तुम्हें कैसे पता?"
मेरा गला सूख गया। मैंने उसके माथे पर हाथ रखा।
"तेरे बैग की गंध आई। तुलसी, अदरक, काली मिर्च। मैंने सड़क पर वो गंध पकड़ी, पर बैग वहाँ नहीं था। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसके होठों पर एक कमज़ोर सी मुस्कान आई।
"बैग की गंध?" उसने कहा। "तुम्हें बैग की गंध आई, वीर सिंह?"
मैं चुप हो गया।
"मैंने तो सोचा था तुम सिर्फ़ मिट्टी और पसीना सूंघते हो।"
"तेरे हाथों में दवा की गंध है," मैंने धीरे से कहा। "वो मुझे अच्छी लगती है। इसलिए याद रह गई।"
मीरा की आँखें भर आईं। पर वो रोई नहीं। उसने मेरी कलाई पकड़कर खुद को उठाया।
"उसने मेरे पास जो कागज़ थे, सब ले लिए। रिपोर्ट। पापा की पर्चियाँ।"
"पता है," मैंने कहा। "पर तू ज़िंदा है। बाकी सब बाद में।"
टिंकू ने उसकी कलाई की रस्सी खोली। उस पर लाल निशान बन गए थे — कसकर बाँधा गया था। मेरी मुट्ठी भींच गई।
"कितनी देर से हो यहाँ?" मैंने पूछा।
"पता नहीं। मुझे तो… मुझे सड़क से उठाकर लाते वक़्त ही कुछ समझ नहीं आया। कुछ सूंघा था। मीठा।"
"धतूरा," मैंने कहा। "इसलिए तू इतनी कमज़ोर है।"
वो उठने की कोशिश करने लगी, पर उसके पैर लड़खड़ा गए और वो फिर मेरे सहारे गिर पड़ी। उसका सिर मेरे सीने से टकराया। वो कुछ देर वहीं टिकी रही।
और फिर, आधी बेहोशी में, वो कुछ बड़बड़ाने लगी। आवाज़ ऐसी जैसे बुखार में कोई बोल रहा हो।
"पापा… पापा, मत जाओ। वो पानी मत पियो।"
मेरा गला भर आया।
"पापा, मैंने देखा है। वो गिलास… वो गिलास मैंने देखा है।"
उसकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ की तरफ़ उठीं और मेरा हाथ पकड़ लिया। कसकर। जैसे कोई डूबता हुआ सहारा पकड़ता है।
"मत जाओ," वो फुसफुसाई। "मैं अकेली रह जाऊँगी।"
मैंने उसका सिर अपने सीने से लगा लिया। मेरी आँखों से पानी बह रहा था और मैं कुछ नहीं कर पा रहा था।
टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस रखा। और उसका हाथ भी काँप रहा था।
कुछ पल बाद मीरा की साँस थोड़ी ठीक हुई। उसने धीरे से मेरा हाथ छोड़ा और आँखें खोलीं। इस बार उनमें होश था।
"वीर," उसने कहा, "मैं ठीक हूँ। सच में। थोड़ा पानी।"
मैंने पानी दिया। उसने दो घूँट पिए और अपना मुँह पोंछा।
"अब सुन।" उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर उसमें वो ज़िद लौट आई थी। "जब मैं जागी, तो एक पल के लिए मैंने खुद को अकेला पाया। और बाहर… कोई बोल रहा था। किसी से। पर… वो कोई और नहीं था। भैरव था।"
मैं सख़्त हो गया।
"भैरव? यहाँ?"
"हाँ। और वो किसी से बोल रहा था — 'इसका बैग देख लिया? रिपोर्ट मिली?'"
"और?"
"और फिर वो बोला — 'कोई बात नहीं। जो कागज़ मिले हैं, वो काफ़ी नहीं। मुझे वो असली कागज़ चाहिए। जो उसके पास नहीं… उसके पिता के पास है।'"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने गला साफ़ किया।
"भाई, अगर वो रणवीर सिंह के पास जाएगा…"
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