Spirit of a Fighter125 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 125

6 min read November 5, 2026

"तो हम पहले पहुँचेंगे," मैंने कहा। "उठ, मीरा।"

मीरा उठ खड़ी हुई। बड़ी मुश्किल से, पर उठी। टिंकू ने अपना डिब्बा खोला और उसमें से एक छोटी सी डिब्बी निकाली — सोंठ और काली मिर्च की। यही तो माँ की बताई हुई चीज़ थी, जो उसने मीरा के हाथों में सूँघी थी।

"ये तुम्हारी ही है," टिंकू ने कहा। "अखाड़े के बाहर बैग के पास पड़ी थी। मैंने उठा ली थी।"

मीरा ने डिब्बी हाथ में ली और एक चुटकी मुँह में डाली। उसका चेहरा थोड़ा साफ़ हुआ।

"धतूरे का असर कम होगा। पर मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए।"

"वक़्त नहीं है," मैंने कहा।

उसी पल बाहर आवाज़ आई।

"अंदर कोई है?"

लज्जो। उसकी आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर से आ रही थी।

मेरी साँस रुक गई। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। टिंकू ने अपना डिब्बा सीने से लगाया।

"अंदर कोई है?" लज्जो ने फिर कहा। "मुझे पता है कोई है। खिड़की के पास तुम्हारी परछाई दिख रही है।"

मैंने चारों तरफ़ देखा। कोठरी की एकमात्र खिड़की पीछे की दीवार पर थी। छोटी, ऊँची। मैंने मीरा को इशारा किया। वो समझ गई।

"टिंकू, खिड़की।"

टिंकू भागा। खिड़की की मोरी ऊँची थी, पर वो लंबा था। उसने उँगलियाँ फँसाईं और खींचा। पुरानी लकड़ी चरमराई।

लज्जो फिर बोली, "खोलो दरवाज़ा। भैरव मामा ने कहा है — अगर तुम हो, तो बहुत देर नहीं हुई अभी तक।"

मैंने मीरा को उठाया। उसने कहा, "मैं खुद चल सकती हूँ," पर कहते-कहते मेरे सहारे पर झुक गई।

दरवाज़े पर धक्का लगा। लज्जो पूरा दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रही थी। मैंने देखा — मैंने कोठरी में रखी एक भारी लोहे की गोली उठाई और दरवाज़े पर टेक दी।

"ये ज़्यादा देर नहीं रोकेगी," मीरा ने धीरे से कहा।

"उतनी देर काफ़ी है।"

टिंकू ने खिड़की खोल दी। बाहर अंधेरा था, पर नीचे उतरने के लिए कोई रास्ता नहीं था — खिड़की मिट्टी की दीवार पर खुलती थी और नीचे मिट्टी लुढ़कती थी।

"भाई, ये ऊँची है। नीचे उतरने में हड्डी टूट सकती है।"

"रस्सी," मैंने कहा। मैंने कोठरी में रखी पुरानी रस्सियाँ देखीं। एक मोटी रस्सी उठाई। एक सिरा पुराने खंभे से बाँधा। दूसरा सिरा खिड़की से नीचे लटका दिया।

"टिंकू पहले, फिर मीरा, फिर मैं।"

"नहीं," टिंकू ने कहा। "मीरा पहले। वो हल्की है।"

"मैं ठीक हूँ," मीरा ने कहा, पर उसकी आवाज़ में ज़ोर नहीं था।

इसी बीच दरवाज़े पर ज़ोरदार धक्का लगा। लोहे की गोली सरक गई। दरवाज़ा थोड़ा खुल गया। लज्जो की आँखें दरार में दिखीं।

"मिल गए," उसने कहा। "तीनों।"

मैंने मीरा को उठाकर खिड़की पर बैठाया। उसने रस्सी पकड़ी। उसके हाथ फिसल रहे थे। मैंने उसकी कलाई अपनी हथेली से जकड़ी।

"देख मेरी तरफ़," मैंने कहा। "मेरी आँखों में देख। तू गिरेगी नहीं। मैं हूँ नीचे।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में वो ज़िद लौट आई थी। उसने रस्सी कसी और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "भाई, तुम?"

"तू भी जा। मैं आख़िर में।"

टिंकू ने कोई सवाल नहीं पूछा। वो खिड़की पर चढ़ा और रस्सी पकड़कर उतरने लगा। वो भी फिसला, पर नीचे मीरा ने उसे सँभाला।

दरवाज़ा अब खुल रहा था। लज्जो भीतर आ रही थी। मैं खिड़की पर चढ़ा। एक पैर बाहर रखा।

और फिर मैंने पीछे देखा।

कोठरी में, टीन की मेज़ के नीचे, कुछ चमक रहा था। मैं रुक गया। मेरी नाक में एक नई गंध आई। ताज़ी। जैसे किसी ने अभी-अभी छुआ हो।

मैं नीचे उतरा। दो कदम बढ़कर मेज़ के नीचे हाथ डाला। वो एक चीज़ थी — छोटी, चमकीली। मैंने उठाई।

एक अँगूठी। भारी, सोने की। जिस पर एक साँप का निशान बना था। वही निशान जो भैरव की चेन की टूटी कड़ी पर था।

मैंने अँगूठी मुट्ठी में कस ली और खिड़की पर चढ़ गया।

दरवाज़ा खुला। लज्जो भीतर आई। उसने मुझे खिड़की पर देखा।

"रुक जा, वीर सिंह," उसने कहा। "तू भाग नहीं सकता।"

"देखते हैं," मैंने कहा।

मैंने रस्सी पकड़ी और उतरने लगा। मेरे हाथ फिसल रहे थे, पर मैं नीचे पहुँच गया। मीरा और टिंकू पहले से मिट्टी में खड़े थे।

हम भागे। नीम के पेड़ के पीछे से, नहर के किनारे की तरफ़।

कुछ दूर जाकर हम रुके। मैंने पीछे देखा। कोठरी की खिड़की पर लज्जो खड़ी थी, हमें देख रही थी। पर वो हमारा पीछा नहीं कर रही थी। क्यों?

मीरा हाँफ रही थी। "वो हमें जाने दे रही है।"

"हाँ," मैंने कहा। "क्यों?"

"क्योंकि उसे पता है हम कहाँ जा रहे हैं," मीरा ने कहा। "वो हमें पापा के घर ही भेजना चाहती है।"

मैंने अँगूठी अपनी हथेली में देखी। साँप का निशान। और अँगूठी के अंदर कुछ खुदा हुआ था।

मैंने मीरा की तरफ़ अँगूठी बढ़ाई।

"ये पढ़।"

मीरा ने अँगूठी ली और चाँद की रोशनी में देखी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी परछाई आई।

"रघुवीर," उसने धीरे से पढ़ा।

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"क्या?"

"अंदर लिखा है — रघुवीर।"

मैंने अँगूठी उससे ली। मेरे हाथ काँप रहे थे। ये अँगूठी मेरे पापा की थी। रघुवीर की। जो बीस साल पहले मर गए थे।

"ये… ये भैरव के पास कैसे?"

"शायद यही वो चीज़ है जो उसने उस रात पापा से ली थी," मीरा ने कहा। "जब वो उन्हें कुएँ में गिरा रहा था।"

मैंने अँगूठी अपनी मुट्ठी में कस ली। गुस्सा मेरे सीने से उठकर गले तक आ गया। माँ ने कहा था — गुस्सा हाथ की तरह इस्तेमाल कर, दिल की तरह नहीं। पर आज ये गुस्सा किसी और तरह का था। ठंडा। साफ़।

"टिंकू," मैंने कहा। "तेरे पास कितना वक़्त है?"

"भाई, मैं तो तेरे साथ हूँ।"

"नहीं। मुझे तुझे कहीं और भेजना है।"

टिंकू ने गला साफ़ किया। "कहाँ?"

"मेरे घर। माँ के पास। उन्हें बता दे कि मैं और मीरा रणवीर सिंह के घर जा रहे हैं। और… और गुड़िया को कह देना कि दाल में नमक ठीक डाले।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर वो मुस्कुराया।

"नमक ठीक डाले," उसने दोहराया। "भाई, तूने आज तक मुझे कुछ ऐसा नहीं कहा जो मैं समझ सकूँ।"

"बस कर," मैंने कहा। "जा।"

टिंकू भागा। उसकी सलवार की आवाज़ रात में दूर तक गई।

मैं मीरा की तरफ़ मुड़ा।

"चल सकती है?"

"हाँ।"

"तो चल।"

हम नहर के किनारे-किनारे चले। मीरा कभी मेरे सहारे पर झुक जाती, कभी खुद चलने की कोशिश करती। उसकी आवाज़ में अब भी थकान थी।

"वीर," उसने कुछ दूर चलकर कहा, "अँगूठी देख।"

"देखी है।"

"नहीं। ध्यान से देख। उस पर साँप का निशान है। और भैरव की चेन पर भी साँप का निशान था।"

"हाँ।"

"तो इसका मतलब दोनों एक ही जगह से आए हैं।"

मैं रुका। मैंने अँगूठी फिर निकाली। चाँदनी में उसे देखा। साँप का निशान। और अंदर — रघुवीर।

"मीरा," मैंने कहा, "मेरे पापा को ये अँगूठी कहाँ से मिली? किसने दी?"

"पता नहीं। पर अगर हमें ये पता चले, तो हमें ये भी पता चलेगा कि भैरव के पास ये कैसे पहुँची।"

मैंने अँगूठी फिर मुट्ठी में कस ली।

"मेरे पास एक नाम है," मैंने कहा। "कालू काका। वो सब जानते हैं।"

"तो हम उनसे पूछेंगे।"

"वो इस वक़्त अखाड़े में होंगे।"

"तो हम उन्हें बाहर बुलाएँगे।"

हम रुके। सामने रणवीर सिंह का घर था — बड़ा, पुराना, दीवारों पर चढ़ी बेलें। घर की सारी खिड़कियाँ बंद थीं। पर एक कमरे की खिड़की से पीली रोशनी आ रही थी।

"लज्जो यहाँ आ चुकी है," मीरा ने धीरे से कहा। "देखो, खिड़की पर परछाई है।"

मैंने देखा। एक लंबी परछाई खिड़की पर आ-जा रही थी। मर्द की। भैरव।

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