Spirit of a Fighter123 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 123

7 min read November 5, 2026

मैं कॉलेज के अंदर गया। आँगन खाली था। कुछ दूर एक बरामदे में कुर्सियाँ पड़ी थीं, एक मेज़ पर किताबें खुली थीं। हवा में काग़ज़ उड़ रहे थे। मैंने अपनी नाक ऊँची की।

धतूरे की गंध। तेज़। दाईं तरफ़ से।

मैं उस तरफ़ बढ़ा। एक छोटा कमरा था, जिसका दरवाज़ा खुला था। दरवाज़े के पास एक कुर्सी गिरी पड़ी थी और फर्श पर पानी फैला था।

मैं अंदर गया।

कमरे के कोने में, दीवार के सहारे, मीरा बैठी थी। उसके बाल बिखरे थे, उसका कुर्ता कोहनी पर फटा था, और उसकी आँखें आधी बंद थीं। उसके होंठ सूखे थे और उसके हाथ में एक छोटी सी कटोरी थी, जिसमें थोड़ा-सा पानी बचा था।

वो ज़िंदा थी।

मेरे पैरों से जैसे बोझ उतर गया। मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

"मीरा।"

उसने धीरे से आँखें खोलीं। उसकी आँखों में पहचानने की कोशिश थी, फिर वो चमकीं।

"वीर…" उसकी आवाज़ फटी थी। "तुम… तुम आ गए।"

"क्या हुआ? किसने किया?"

उसने अपनी कटोरी की तरफ़ देखा।

"एक लड़की आई थी। लज्जो। कह रही थी भैरव ने भेजा है, पानी पिलाने को। मैंने मना किया। तो वो… उसने ज़बरदस्ती की। मैंने एक घूँट लिया और… और मुझे चक्कर आने लगा। मैंने बाकी पानी गिरा दिया।" उसने अपनी कटोरी दिखाई। "फिर मैं यहाँ बैठ गई और… और मैंने सोचा कि अगर मैं सो गई, तो शायद नहीं उठूँगी। इसलिए मैंने अपनी आँखें खुली रखीं।"

मेरे अंदर कुछ और टूटा। ये लड़की मरने से बचने के लिए अपनी आँखें खुली रख रही थी।

"तुमने सही किया," मैंने कहा। "तुमने बहुत सही किया।"

मैंने अपनी कमर से पानी की थैली निकाली — कालू काका ने दी थी, कहा था हमेशा साथ रखना। मैंने उसका ढक्कन खोला और उसके होंठों से लगाया।

"धीरे-धीरे," मैंने कहा। "एक-एक घूँट।"

उसने पिया। उसका गला हिला। फिर उसने अपनी आँखें बड़ी कीं और मेरी तरफ़ देखा।

"तुम्हारा हाथ," उसने कहा। "वो क्यों काँप रहा है?"

मैंने अपना हाथ देखा। वो काँप रहा था। मैंने उसे छिपाने की कोशिश की, पर मीरा ने उसे पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"वीर," उसने कहा। "तुम रो रहे हो।"

"नहीं रो रहा।"

"तुम्हारी आँखें गीली हैं।"

मैंने अपनी आँखें पोंछीं। मेरी हथेली पर सूखा खून था और अब उसमें पानी भी मिल गया था।

"मुझे डर लगा था," मैंने कहा। "बहुत डर लगा था।"

मीरा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।

"अब नहीं डरना," उसने कहा। "मैं यहाँ हूँ।"

हम दोनों वहीं बैठे रहे। बाहर हवा चल रही थी और काग़ज़ उड़ रहे थे। मेरे पीछे टिंकू की आवाज़ आई — वो दौड़ता हुआ आ रहा था।

"भाई! भाई, मिली?"

वो दरवाज़े पर रुका और मीरा को देखा। उसका चेहरा पहले सफ़ेद हुआ, फिर लाल। उसने अपना डिब्बा ज़मीन पर रख दिया और अपनी आँखें मलीं।

"मैडम," उसने कहा, "आप ठीक हैं?"

मीरा ने मुस्कुराने की कोशिश की। "अब ठीक हूँ।"

टिंकू ने अपना डिब्बा खोला और उसमें से एक मिठाई निकाली।

"ये खाइए," उसने कहा। "शक्कर कम है, पर अभी काम चलेगा।"

मीरा ने मिठाई ली और उसे देखकर हँसी। पहली बार उसकी हँसी में मेरी जान लौटी।

मैंने अपनी धोती की कमर से कड़ी निकाली और मीरा की तरफ़ बढ़ा दी।

"ये देखो," मैंने कहा। "ये मुझे अखाड़े की मिट्टी में मिली। भैरव की चेन की कड़ी है। और इस पर पुराना खून लगा है।"

मीरा ने कड़ी अपनी हथेली पर ली। उसने उसे उलटा-पलटा। उसकी आँखें तेज़ हो गईं — वो आँखें जो सबूत देखकर चमकती हैं।

"ये सोना है," उसने कहा। "असली। और ये खून…"

"पुराना है। बीस साल से ज़्यादा पुराना।"

मीरा ने अपनी आँखें सिकोड़ीं। "तुम कैसे जानते हो?"

"क्योंकि ये मिट्टी में इतने नीचे था कि इसकी गंध भी पुरानी है। और इस पर साँप का निशान है। भैरव की अँगूठी पर भी वही निशान है। मैंने देखा है।"

मीरा ने कड़ी को अपनी हथेली में कस लिया।

"तो ये सबूत है," उसने कहा। "ये साबित करता है कि भैरव ने किसी को मारा है। किसी को जिसका खून उसकी चेन पर लगा।"

"हाँ।"

"और ये कड़ी टूटी हुई है। मतलब किसी ने उसे तोड़ा। ज़बरदस्ती। किसी झगड़े में।"

मैंने गर्दन हिलाई। मीरा की आवाज़ में वो बात लौट आई थी जो मुझे उसकी आँखों में सबसे अच्छी लगती थी — ज़िद।

"वीर," उसने कहा, "ये कड़ी हमें उस रात ले जाएगी जब भैरव ने किसी को मारा था। और अगर हमें उस आदमी का नाम मिल गया, तो…"

"तो भैरव का पूरा जाल खुलेगा।"

उसने कड़ी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "इसे तुम रखो। तुम्हारे पास ज़्यादा सुरक्षित रहेगी। और वीर…"

"हाँ?"

"अब मुझे घर नहीं जाना। भैरव मेरे पापा के पास भी आदमी भेजेगा। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।"

मैं चुप हो गया।

"मीरा, तुम्हारे पापा…"

"मेरे पापा को मेरी चिंता होगी, पर वो मुझे भैरव के पास नहीं छोड़ेंगे। और मैं अब अकेली नहीं लड़ूँगी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुमने कहा था न — जो लड़ाई सच की होगी, वो सब मिलकर लड़ेंगे।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे उठाया। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, पर वो खड़ी रही।

हम बाहर आए। टिंकू मेरे पीछे था, अपना डिब्बा लिए। गेट पर पहुँचे तो सूरज ढल रहा था और सड़क पर परछाइयाँ लंबी हो रही थीं।

मैंने मीरा के टूटे बैग की तरफ़ देखा। फिर मैंने अपनी मुट्ठी खोली। कड़ी मेरी हथेली पर थी, सूखे खून के साथ।

"ये किसका खून है?" मैंने धीरे से कहा, जैसे अपने आप से पूछ रहा हूँ।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"पता चल जाएगा," उसने कहा। "पर पहले हमें उस आदमी को ढूँढना होगा जो उस रात वहाँ था। और मुझे लगता है…"

वो रुकी।

"क्या?"

"मुझे लगता है कि कालू काका कुछ जानते हैं। वो बीस साल से इस अखाड़े में हैं। वो सब देखते हैं, पर कुछ बोलते नहीं।"

मैंने गर्दन हिलाई। कालू काका। जिन्होंने मुझे मिट्टी दी थी, जिन्होंने कहा था — "तेरी आँखें वैसी हैं।"

मैंने कड़ी वापस अपनी धोती की कमर में बाँधी और मीरा का हाथ पकड़कर सड़क पर चल पड़ा।

पर हम दस कदम भी नहीं चले थे कि मेरी नाक में कुछ आया। तेज़। जैसे कोई मेरे सामने से गुज़रा हो। धतूरे की गंध, और उसके ऊपर मिट्टी का तेल।

मैं रुका और मैंने पीछे देखा।

सड़क के मोड़ पर एक लड़की खड़ी थी। लंबी, मज़बूत, हाथ में एक छोटी बोतल। लज्जो। उसने हमें देखा और मुस्कुराई। फिर उसने बोतल हवा में उठाई, जैसे कोई सलाम कर रहा हो।

और वो बोली — इतनी दूर से भी उसकी आवाज़ साफ़ आई, "तीन दिन में मैदान में मिलेंगे। तब तक अपनी लड़की को संभालकर रखना, वीर सिंह। भैरव मामा ने कहा है — अगली बार पानी नहीं, सीधा गला होगा।"

वो पलटी और अंधेरे में चली गई।

मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। टिंकू ने अपना डिब्बा सीने से लगा लिया।

और मैंने अपनी धोती की कमर पर हाथ रखा, जहाँ वो कड़ी थी। मेरे पास सबूत था। और अब मेरे पास एक नाम भी था जिसे मैं पूछने वाला था — कालू काका से। आज रात।

॥

धतूरे की वो गंध मेरे सिर में चढ़ गई थी। लज्जो की आवाज़ अंधेरे में घुल गई, पर उसकी बोतल की गंध हवा में रह गई — धतूरा, मिट्टी का तेल, और कुछ और। कुछ मीठा। इत्र। लज्जो का इत्र।

मैंने मीरा का हाथ नहीं छोड़ा। टिंकू के कंधे पर हाथ रखा और तीनों बिना बोले उल्टी तरफ़ मुड़ गए। घर की तरफ़ नहीं। अखाड़े के पिछवाड़े की तरफ़।

"वीर," टिंकू ने धीरे से कहा, "हम जा कहाँ रहे हैं? वो बोली अगली बार सीधा गला।"

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