Spirit of a Fighter – Chapter 122
उसकी आँखें चमकीं, फिर अचानक बुझ गईं। "क्या है? कुछ बुरा?"
मैंने धोती की कमर से कड़ी निकाली और अपनी हथेली पर रख दी।
टिंकू ने उसे देखा। पहले तो उसने गर्दन झुकाई, जैसे ठीक से देखना चाहता हो। फिर उसका चेहरा उतर गया। वो एक कदम पीछे हटा।
"ये… ये कहाँ से?"
"मिट्टी में मिली। भर्ती वाले दिन।"
"भाई, इसे वापस दबा दे। यहीं। इसी मिट्टी में।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये सोने की है, भाई! देख, ये भैरव की चेन की कड़ी है। मैंने उसकी चेन सैकड़ों बार देखी है। ये वही है। अगर उसे पता चला कि तेरे पास…"
"तो क्या होगा?"
टिंकू का गला सूख गया। उसने अपनी जीभ से होंठ गीले किए।
"तो वो तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
मैंने कड़ी वापस अपनी मुट्ठी में ली। उसका वज़न मेरे हाथ में था। हल्का, सोने का, पर जैसे सीसा हो।
"टिंकू, इस पर खून लगा है। सूखा खून। पुराना। और इस पर साँप का निशान है।"
टिंकू ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
"मैं इसे वापस नहीं दबाऊँगा," मैंने कहा। "ये मेरा सबूत है।"
टिंकू ने कुछ देर मुझे देखा। उसकी आँखों में डर था, साफ़ दिख रहा था। फिर उसने अपना डिब्बा खोला — मिठाई का डिब्बा, जिसमें अभी भी आधी मिठाई थी — और बोला, "भाई, इसे मैं अपनी मिठाई की डिब्बी में छिपा दूँगा। कोई नहीं खोजेगा। भैरव के आदमी मिठाई के डिब्बे में हाथ नहीं डालते। सबको पता है कि मेरी मिठाई में कभी नमक आ जाता है, कभी शक्कर कम पड़ जाती है। कोई उसे छूता नहीं।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार कई दिनों में मेरी हँसी सच्ची थी, पेट से आ रही थी।
"तेरी डिब्बी में तो ज़हर भी मिला था, टिंकू। याद है? भैरव ने वही डिब्बी भेजी थी।"
टिंकू का चेहरा उतर गया। "अरे हाँ…"
फिर वो भी हँसा। पहले धीरे, फिर ज़ोर से। हम दोनों वहीं दीवार के पास खड़े हँस रहे थे, जैसे कोई बड़ी बात न हो। मेरी आँखों में पानी आ गया। टिंकू की टोपी गिर गई और वो उसे उठाने के लिए झुका और फिर भी हँसता रहा।
जब हँसी रुकी, तो टिंकू ने अपनी आँखें पोंछीं और मेरी तरफ़ देखा।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब हल्की नहीं थी। "मैं डरता हूँ।"
मैं चुप हो गया।
"मैं डरता हूँ," उसने दोहराया। "भैरव से। उसकी चेन से। उसके उन आदमियों से जो रात को नहर के पास घूमते हैं। मैं डरता हूँ कि कल तेरे साथ क्या होगा। पर…"
वो रुका। उसने अपना डिब्बा कसकर पकड़ा।
"पर भाई, तेरे साथ डरता हूँ तो डर भी आधा लगता है।"
मेरे अंदर कुछ हिला। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका कंधा पतला था, हड्डी साफ़ चुभ रही थी। पर वो काँप नहीं रहा था।
"टिंकू," मैंने कहा, "तेरी मिठाई में नमक आ जाता है, शक्कर कम पड़ जाती है। पर आज तक तूने कभी मुझे भूखा नहीं सोने दिया।"
टिंकू ने नज़रें चुराईं। "अरे, वो तो… वो तो दुकान का सामान बच जाता था…"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "माँ को भी पता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, चौंककर।
"माँ को कैसे…"
"माँ सब जानती है, टिंकू। वो बस बोलती नहीं।"
टिंकू कुछ देर खड़ा रहा। फिर उसने अपनी आँखें मलीं और अपनी टोपी ठीक की।
"अच्छा, अब बता — ये कड़ी किसे दिखाएँगे?"
"मीरा को।"
टिंकू ने गर्दन हिलाई। "हाँ। वो पढ़ी-लिखी है। वो समझेगी। पर भाई, एक बात — जब तुम दोनों मिलते हो, मैं साथ रहूँगा। मुझे पता है तुम दोनों की बातें मेरे सिर के ऊपर जाती हैं, पर मैं साथ रहूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू अकेला जाता है तो लौटने में देर करता है। और मैं तेरी माँ को जवाब नहीं देना चाहता।"
मैं हँसा। और हम चल पड़े।
रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। वो बाज़ार के मोड़ पर खड़ी थीं, हाथ में पान का बीड़ा, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो हमेशा किसी बड़ी खबर से पहले आता है।
"अरे वीर!" उन्होंने मेरा रास्ता रोक लिया। "अरे मैंने तो सुना है कि भैरव की भांजी लज्जो ने आज सुबह किसी को धतूरा पिला दिया!"
मेरे पैर रुक गए।
"किसको?" मैंने पूछा।
"अरे वो तो पता नहीं, बस इतना सुना है कि एक लड़की थी, जो अखाड़े की तरफ़ से आ रही थी। कुर्ता-सलवार, कंधे पर बैग। लज्जो ने उसे पानी पिलाया, कहकर कि गर्मी लग रही है। और वो लड़की…"
मैंने उनकी बात पूरी नहीं सुनी। मेरे पैर अपने आप चलने लगे।
"भाई!" टिंकू मेरे पीछे भागा। "भाई, रुक! कहाँ जा रहा है?"
"कॉलेज," मैंने कहा। "मीरा के कॉलेज।"
मेरे अंदर एक ठंडी लहर दौड़ गई। धतूरा। वही धतूरा जो लज्जो ने मुझे परखने के लिए दिया था। वही ज़हर। और लज्जो खुद भैरव की भांजी है। भैरव ने कहा था — "तू पहले अपनी माँ को बचाता है या अपनी लड़की को?"
तो ये था उसका जवाब। उसने माँ को नहीं छुआ। उसने मीरा को चुना।
मैं दौड़ रहा था। मेरी धोती की कमर में कड़ी उछल रही थी और मेरी हथेली में उसका खून सूख रहा था। सड़क के किनारे नीम के पेड़ पीछे छूट रहे थे। मेरी साँस फूल रही थी, पर मैं रुका नहीं।
टिंकू मेरे पीछे था, उसकी चप्पलें सड़क पर चटक रही थीं।
"भाई… भाई, सुन तो…"
"नहीं सुनूँगा।"
"भाई, अगर वो सच में धतूरा पी चुकी है, तो हमें डॉक्टर के पास ले जाना होगा, कॉलेज नहीं!"
मैं रुका।
टिंकू सही कह रहा था।
"कहाँ है सबसे नज़दीकी डॉक्टर?" मैंने पूछा।
"गाँव के बाहर, सड़क के किनारे, वो नया वाला। पर भाई, पहले हमें देखना होगा कि वो कहाँ है।"
हाँ। पहले देखना।
हम कॉलेज की तरफ़ मुड़े। रास्ता सूनसान था, दोपहर ढल रही थी। दूर से कॉलेज की लाल ईंट की दीवार दिख रही थी। और फिर गेट।
मैं गेट के पास पहुँचा और मेरे पैर अपने आप रुक गए।
गेट के पास ज़मीन पर एक बैग पड़ा था। कुर्ते वाला रंगीन बैग — जिसे मैंने कई बार मीरा के कंधे पर देखा था। उसका एक पट्टा टूटा हुआ था और बैग खुला पड़ा था, जैसे किसी ने उसे फेंका हो।
और बैग के पास, ज़मीन पर, एक हरी पत्ती पड़ी थी। छोटी। काँटेदार। धतूरे की पत्ती।
मैंने अपनी नाक को साधा। हवा में धतूरे की गंध थी — कड़वी, भारी, और उसके नीचे… मीरा की गंध। तुलसी, अदरक, काली मिर्च।
पर वो गंध कमज़ोर थी। जैसे किसी ने उसे पोंछ दिया हो।
मैं घुटनों के बल बैग के पास गिरा। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने बैग उठाया। अंदर किताबें थीं, कुछ काग़ज़, एक छोटी शीशी। और उस शीशी के ढक्कन पर एक हल्की-सी उँगली की छाप थी।
टिंकू मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया।
"भाई," उसने धीरे से कहा। "वो यहीं है। दूर नहीं गई होगी।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। मेरे अंदर वो ठंडी लहर फिर उठी, पर इस बार वो गुस्से में बदल रही थी।
भैरव ने कहा था — तीन दिन। और उसने पहले दिन ही अपना दाँव चल दिया।
मैंने कड़ी अपनी मुट्ठी में कस ली। सोने की कड़ी, सूखे खून वाली, साँप के निशान वाली। और मैंने ठान लिया — अगर मीरा को कुछ हुआ, तो ये कड़ी भैरव की गर्दन पर जाएगी। चेन से नहीं, हाथ से।
मैं उठा और मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू, तू यहीं रुक। गेट पर। अगर वो लौटे, तो उसे पकड़कर रखना। मैं अंदर देखकर आता हूँ।"
"भाई, मैं अकेला…"
"तू अकेला नहीं है," मैंने कहा। "तू मेरा आदमी है। और मेरा आदमी कभी अकेला नहीं होता।"
टिंकू ने गर्दन हिलाई। उसका डर उसके चेहरे पर था, पर उसने अपनी टोपी ठीक की और गेट के पास खड़ा हो गया।
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