Spirit of a Fighter121 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 121

7 min read November 5, 2026

फिर बैठक शुरू हुई। हमें घुटनों के बल बैठाया गया। एक लड़का मेरे सामने बैठा — मोटा, चौड़ा, शहर से आया हुआ लग रहा था। उसने मुझे देखकर होंठ सिकोड़े। मैंने कुछ नहीं कहा।

ढोल फिर बजा।

और तभी मैंने देखा — भैरव दीवार के पास खड़ा था, और उसके हाथ में एक काग़ज़ था। वो उस काग़ज़ को बार-बार देख रहा था और फिर मेरी तरफ़। और हर बार जब वो मेरी तरफ़ देखता, उसकी मूँछें थोड़ी और खिंच जाती थीं।

काग़ज़ पर क्या था? मेरी भर्ती का फ़ॉर्म? या कुछ और?

मैंने अपनी नाक को साधा। काग़ज़ की गंध आ रही थी — हल्की, स्याही वाली, पर उसके ऊपर कुछ और था। हरी शीशी वाली गंध। वो ज़हर जो मैंने चूल्हे में जलाया था। वो गंध उस काग़ज़ से आ रही थी।

मतलब वो काग़ज़ भैरव की अलमारी से निकला था। या फिर… उस काग़ज़ पर ज़हर लगा था।

मेरी साँस रुक गई।

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। और उस मुस्कान में वो बात थी जो कह रही थी — "मैं जानता हूँ, तू क्या है। और मैं तुझे यहीं, इसी मिट्टी में, इसी भर्ती में रोक लूँगा।"

मैंने अपनी मुट्ठी और कस ली। कड़ी मेरी हथेली में चुभी। और मैंने सोचा — ये कड़ी उसकी चेन की है। और ये खून उसकी है। मतलब इस अखाड़े में, इस मिट्टी में, कोई और था जिसका खून भैरव की चेन पर लगा था। कोई और जो यहाँ मरा था। मेरे पापा से पहले। या मेरे पापा के साथ।

मैंने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं।

माँ ने कहा था — "जो लड़ाई मिट्टी में लड़ी जाती है, वो अकेले लड़ी जाती है।" पर आज मिट्टी ने मुझे कुछ दिया था। एक सुराग़। एक टूटी कड़ी। एक पुराना खून।

और मैंने ठान लिया — इस कड़ी का हिसाब मैं माँगूँगा। चाहे वो भैरव का हो, या उससे भी बड़े किसी का।

ढोल फिर बजा। बैठक का वक़्त खत्म हुआ। अब कुश्ती।

मैं उठा। मेरे घुटनों में दर्द था। मेरी हथेली में कड़ी चुभ रही थी। मैंने उसे अपनी धोती की कमर में बाँध लिया, कसकर, ताकि कोई देख न सके।

और जैसे ही मैं मैदान के बीच पहुँचा, लुट्टन ने मेरे सामने वाले लड़के की तरफ़ इशारा किया — वही मोटा, चौड़ा, शहर वाला लड़का, जिसने मुझे देखकर होंठ सिकोड़े थे।

वो मेरे सामने आया। मुझसे आधा सिर ऊँचा, मुझसे दुगना चौड़ा। उसने मेरी तरफ़ देखा और बोला, "तेरे जैसे गाँव वाले यहाँ क्यों आते हैं? ईंट ढोने की जगह यहाँ क्या ढोऊँगा, ये देखने?"

मैंने उसके पास जाकर धीरे से कहा, "आज ईंट नहीं। आज मिट्टी ढोऊँगा। तेरी।"

उसका चेहरा बदला। वो आगे बढ़ा।

और तभी मेरी नज़र दीवार के उस कोने पर पड़ी जहाँ भैरव खड़ा था। उसने काग़ज़ जेब में रख लिया था और अब वो अपनी चेन को हाथ में लेकर खेल रहा था — वही चेन, जिसकी एक कड़ी मेरी धोती में बँधी थी। उसकी उँगलियाँ चेन पर फिर रही थीं, और उसकी आँखें मुझ पर।

और मुझे लगा — जैसे उसे भी पता है कि उसकी चेन से एक कड़ी कहीं खोई हुई है। जैसे वो भी उसे ढूँढ रहा है। जैसे वो भी जानता है कि उस कड़ी पर एक पुराना खून लगा है। और वो खून उसके हाथों का है।

मेरे पेट में एक ठंडी लहर उठी।

मैंने अपनी धोती की कमर पर हाथ रखा। कड़ी वहीं थी। छुपी हुई। मेरे पास।

और भैरव मुस्कुराया — वो मीठी मुस्कान। फिर उसने अपनी चेन उँगली पर लपेटी और धीरे से खींची, जैसे कह रहा हो — "खेल शुरू।"

॥

खींची हुई चेन की आवाज़ मेरे कानों में रह गई थी। जैसे कोई घास खींच रहा हो, धीरे-धीरे, बिना जल्दी किए। मैं मैदान के बीच खड़ा था और सामने वो शहर वाला लड़का अपनी मुट्ठियाँ भींच रहा था, पर मेरा ध्यान कहीं और था। मेरी धोती की कमर में वो कड़ी पत्थर की तरह चुभ रही थी।

लुट्टन ने बीच में आकर हाथ उठाया।

"दोनों तैयार?"

शहर वाले ने हल्की गर्दन हिलाई, जैसे कोई बड़ा काम कर रहा हो।

मैंने अपनी नज़र उसकी छाती पर टिकाई। उसकी साँस में उबकाई जैसी बू थी। कल रात की शराब, सुबह का घी, और उसके ऊपर कुछ मीठा — जैसे गुड़ की चाशनी जल गई हो। भैरव का पानी। मैंने पहचान लिया। इस लड़के ने भी पीया था।

तो ये मुकाबला भी वही था। नया चेहरा, पुराना ज़हर।

मैंने अपनी कमर से कड़ी को उँगली से और अंदर सरका दिया।

लुट्टन ने ताली बजाई। शहर वाला मेरी तरफ़ झपटा। वो भारी था, पर तेज़ नहीं। उसका शरीर हवा में थोड़ा देर से चलता था, जैसे गाड़ी का पहिया जो ढीला हो गया हो। मैं एक कदम बाईं तरफ़ सरका।

वो मेरे कंधे पर हाथ डालने की कोशिश करने लगा। मैंने उसकी कलाई पकड़ी — और पकड़ते ही मेरे हाथ में वो आया। नब्ज़। उसकी नब्ज़ तेज़ थी, पर अंदर से काँप रही थी। जैसे नदी के ऊपर की लहरें चल रही हों और नीचे मिट्टी खिसक रही हो।

वो मुझे धक्का देकर गिराना चाहता था। मैंने उसका दाँव पलट दिया — कमर पकड़ी, घुटने पर ज़ोर डाला। पर वो गिरा नहीं। वो बैठ गया और मेरी टाँग पकड़ ली।

मैं गिरा। मुँह में मिट्टी गई। और मैंने आँखें बंद कर लीं।

क्योंकि मिट्टी ने मुझे कुछ कहा था।

उस परत में जो कालू काका ने बिछाई थी — एक जगह मिट्टी नरम थी। जैसे किसी ने पैर से उसे दबा दिया हो। मैंने अपनी हथेली उस जगह पर रखी और वहीं से धक्का देकर उठा।

शहर वाला ऊपर झुका, मुझे दबाने को। और उसका पैर उसी नरम जगह पर पड़ा। उसका पैर फिसला।

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे घुमाया। वो लुढ़ककर गिरा। मिट्टी उड़ी। भीड़ में से आवाज़ आई।

पर मैं रुका नहीं। मैंने उसका हाथ पकड़ा और अपने घुटने पर दबाया।

वो चीखा।

मैंने छोड़ दिया। उसकी कलाई मेरे हाथ में थी और मैं उसे देख रहा था। नब्ज़ अब और तेज़ हो गई थी, जैसे किसी ने उसके अंदर आग लगा दी हो।

मैंने उसके कान के पास धीरे से कहा, "तेरी नब्ज़ बता रही है कि तू खत्म हो रहा है। कब से पी रहा है ये पानी?"

उसकी आँखें फैल गईं।

"क्या?" उसने फुसफुसाया।

"भैरव का पानी। कब से?"

उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने उसका कोई बहुत गहरा राज़ खोल दिया हो। और फिर उसके होंठ काँपे।

"छह महीने," उसने इतना धीरे कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सका। "पर तू कैसे…"

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया। और उठकर खड़ा हो गया।

भीड़ चुप थी। लुट्टन मेरी तरफ़ देख रहा था। और दीवार के पास भैरव खड़ा था, उसकी चेन उसकी उँगली पर लिपटी थी, और उसकी आँखें मुझ पर।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने अपनी धोती की कमर पर हाथ रखा — वहीं जहाँ कड़ी थी। मैंने हल्का-सा उसे सहलाया। भैरव की आँखें मेरे हाथ पर गईं, फिर मेरे चेहरे पर।

और मैंने मुस्कुरा दिया।

उसकी मूँछें हिलीं।

लुट्टन ने हाथ उठाया। "वीर सिंह जीत गया।"

भीड़ में तालियाँ बजीं, पर वो आवाज़ मुझे दूर से आती लगी। मेरे कानों में तो अभी भी उस लड़के की फुसफुसाहट थी — "छह महीने।"

छह महीने में ये लड़का खत्म हो जाएगा। और भैरव उसकी जीत के पैसे गिनेगा। और फिर उसकी मौत को "कुदरत का सितम" लिखेगा।

मैं मैदान से बाहर आया। सुक्खी बुआ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"अरे वाह, वीर! तूने तो कमाल कर दिया! अरे मैंने तो सुना है तूने उस लड़के के कान में कुछ कहा और वो…"

"बुआ," मैंने कहा, "मुझे जाना है।"

"अरे अभी तो तेरा…"

मैंने अपना हाथ छुड़ाया और बाहर की तरफ़ चला। मेरे पीछे टिंकू की आवाज़ आई।

"भाई! भाई, रुक!"

वो दौड़कर आया, उसकी टोपी तिरछी हो गई थी और हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए था।

"भाई, तू जीत गया! मैंने कहा था न, तू…"

"टिंकू," मैंने उसका कंधा पकड़ा और उसे दीवार की तरफ़ खींच लिया। कोई और न सुने। "मेरे पास कुछ है। देखना चाहेगा?"

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