Spirit of a Fighter – Chapter 120
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो शर्म थी जो उसने कल अखाड़े में सबके सामने पहलवानों के ज़हर पीने की बात कबूल करते वक़्त छुपाई थी। लुट्टन बुरा आदमी नहीं था। वो बस डरा हुआ था, और डरे हुए आदमी को सबसे ज़्यादा गुस्सा उस पर आता है जो उसका डर तोड़ दे।
"चाल वो होती है जो छुपे," मैंने कहा। "मैं तो सीधा खड़ा हूँ। सबके सामने। तेरी तरह नहीं।"
लुट्टन का मुँह कस गया। उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर कलम रखकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। वो कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से आवाज़ आई — "लुट्टन!"
वो हाथ खींचकर चला गया।
अखाड़े के अंदर की हवा बाहर से अलग थी। बाहर धूल और धूप थी, यहाँ हवा में नमी थी, मिट्टी की सोंधी गंध थी, और पसीने का वो पुराना तेज़ाब जो हर अखाड़े में सालों से जमा रहता है।
मैंने पहली बार अंदर से अखाड़ा देखा। चारों तरफ़ ऊँची मिट्टी की दीवार, बीच में गोल मैदान, लाल मिट्टी जो सुबह की धूप में तांबे जैसी चमक रही थी। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें — मिट्टी में लिपटे पहलवान, कमरबंद बाँधे, आँखों में वो आग जो पीढ़ियों से चली आ रही है। और एक कोने में पीतल की बड़ी घंटी, जो चुपचाप लटकी थी।
मैंने मैदान में पहला क़दम रखा।
और मेरे पैर के नीचे जो मिट्टी थी, वो मुझे जानती थी।
मुझे रुकना पड़ा। मेरी आँखें अपने आप भर आईं। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मिट्टी भी कोई गंध रख सकती है जो सीधे दिल तक जाए। यहाँ की मिट्टी में वो गंध थी जो मैंने बचपन में अपने पापा की धोती में सूँघी थी — जब वो कभी-कभी कमरे में आते और अलमारी खोलते, तो उनके कपड़ों से यही गंध आती। लाल मिट्टी, पुराना पसीना, और कुछ हल्का सा — जैसे नीम की छाया में सूखा कपड़ा।
मेरी नाक भर गई। आँखों में पानी रुक नहीं रहा था।
कालू काका पास आए। वो कुछ नहीं बोले। बस मेरे पास खड़े हो गए। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ नहीं रखा — उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सख़्त थीं, जैसे सूखी जड़ें। और मेरी हथेली पर उन्होंने धीरे से कुछ लिखा — मुझे समझ नहीं आया क्या, पर लगा जैसे "सब्र" लिखा हो।
"आज तो पानी बचा लिया," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "कल मिट्टी बचानी पड़ेगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो शब्दों से बड़ी है। वो जानते थे कि मैंने पानी नहीं पिया। उन्होंने कैसे जाना, ये मैंने नहीं पूछा। कुछ चीज़ें पूछने की नहीं होतीं।
मैं झुका और मिट्टी में हाथ डाला।
पहले तो सिर्फ़ गरमी लगी — सुबह की धूप से तपी हुई। फिर जब मैंने उँगलियाँ थोड़ी गहरी कीं, तो मुझे नीचे कुछ और मिला। एक परत। ऊपर की मिट्टी ढीली थी, नई थी — किसी ने अभी हाल में डाली थी। और उसके नीचे, तीन-चार उँगली नीचे, एक पुरानी परत थी जो ठोस थी, कसी हुई थी, सैकड़ों पैरों से दबी हुई। उस पुरानी परत में वो गंध थी जो मैंने अपने पापा के कपड़ों में सूँघी थी। यही वो मिट्टी थी जिसमें रघुवीर ने दस साल पसीना बहाया था। यही वो मिट्टी थी जिसमें जगदीश ने पहली बार कुश्ती लड़ी थी।
दोनों मेरे पापा।
मैं मिट्टी में हाथ डाले बैठा रहा। मेरी उँगलियाँ उस परत को सहला रही थीं, जैसे कोई बच्चा सोते हुए बाप के बाल सहलाता है। और फिर मुझसे रोना निकल गया।
नहीं, रोना नहीं। सुबकी। वो सुबकी जो आदमी को शर्म से भरी सभा में आती है और वो मुँह छुपा लेता है। मैंने अपना सिर झुकाया और मेरी पीठ हिलने लगी।
सत्तर लड़के वहाँ थे। उनके बाप, ताऊ, गुरु। लुट्टन। भैरव के आदमी। पर मैं रुक नहीं सका।
और फिर मुझे पीठ पर एक हाथ लगा। हल्का, सूखा, काँपता हुआ। कालू काका का हाथ।
"रो ले, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुनूँ। "मिट्टी आँसू पी लेती है, किसी को नहीं बताती।"
मैंने सिर और झुकाया। और मैं उन बीस सालों को रोया जो मेरे पापा ने इस मिट्टी में गुज़ारे और फिर उस ज़हर को रोया जो उन्हें पीना पड़ा। मैंने उस दिन को रोया जब माँ ने पहली बार चक्की चलाई थी, अकेले, बिना किसी के कंधे के। और मैंने खुद को रोया — इस डर को कि कहीं मैं भी वही न कर बैठूँ जो सबने किया — कहीं मैं भी हार मान लूँ।
कालू काका ने मेरी पीठ पर हाथ नहीं हटाया। वो वहीं खड़े रहे, चुप, जैसे कोई पुराना पेड़ जो साया देता है और कुछ नहीं पूछता।
कुछ पल बाद मैंने आँखें पोंछीं। मेरी हथेली मिट्टी से भरी थी। मैंने उसे झाड़ने के लिए हाथ हिलाया।
और तभी मेरी नज़र अपनी हथेली पर पड़ी।
मिट्टी के बीच कुछ चमक रहा था। सोना। एक छोटी सी कड़ी — सोने की चेन की टूटी हुई कड़ी। मेरी हथेली पर चिपकी हुई, मिट्टी में दबी हुई, बरसों से पड़ी हुई।
मैंने उसे उँगलियों से खुरचा। कड़ी मुट्ठी में आई। छोटी थी, आधी उँगली जितनी, पर भारी। और उस पर कुछ लगा था — गाढ़ा, भूरा, सूखा हुआ। खून। पुराना खून, जो मिट्टी में मिलकर स्याह हो गया था।
मैंने कड़ी को करीब लाकर देखा। उसका जोड़ टूटा हुआ था — ज़ोर से खींचने पर टूटा, कटा नहीं। और जोड़ के पास एक निशान खुदा था। छोटा सा, घिसा हुआ, पर पहचाना जा सकता था।
एक साँप का निशान।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
ये निशान मैंने पहले कहीं देखा था। कहाँ? सोचो, वीर, सोचो। भैरव की चेन। उसकी चाँदी की चेन। जो उसने मुझे गले लगाते वक़्त मेरी गर्दन से चिपकाई थी। उस चेन के लॉकेट पर यही साँप बना था। मुझे याद आया — भैरव की चेन के लॉकेट पर साँप का वो ही निशान था, जो मैंने अब इस टूटी कड़ी पर देखा।
पर ये सोने की थी। भैरव की चाँदी की।
नहीं। रुको। लॉकेट चाँदी का था, पर चेन सोने की थी। मैंने गले लगते वक़्त महसूस किया था — चेन ठंडी थी, भारी थी। सोना।
ये कड़ी उसी चेन की थी। और ये मिट्टी में दबी थी, पुराने खून से सनी हुई। बरसों से।
मेरे कान में कालू काका की आवाज़ आई — "क्या मिला?"
मैंने कड़ी अपनी मुट्ठी में छुपाई।
क्यों छुपाई, मुझे खुद नहीं पता। शायद इसलिए कि उस पर खून था। शायद इसलिए कि मैं जानना चाहता था कि ये खून किसका है। और शायद इसलिए कि अगर ये बात कालू काका से कह दूँ, तो वो डर जाएँगे, और मुझे अभी उनकी हिम्मत चाहिए थी, उनका डर नहीं।
"कुछ नहीं, काका," मैंने कहा, और उठ खड़ा हुआ। "बस मिट्टी।"
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखें बहुत देर तक मुझ पर टिकी रहीं। फिर उन्होंने धीमे से सिर हिलाया, जैसे कह रहे हों — ठीक है, तेरा राज़ तेरा।
पर जब वो पलटे, तो उन्होंने इतना ज़रूर कहा, "जो मिट्टी में मिला, वो मिट्टी का नहीं होता, बेटा। वो किसी का होता है। और उसका हिसाब एक दिन माँगा जाता है।"
मैंने मुट्ठी कस ली। कड़ी मेरी हथेली में चुभ रही थी।
अंदर की तरफ़ से ढोल बजा। भर्ती का ढोल। सत्तर लड़के मैदान में खड़े हो गए। मैं भी उनके साथ खड़ा हो गया। मेरी मुट्ठी में वो टूटी कड़ी थी।
लुट्टन ने सबको निर्देश देने शुरू किए — "पहले दौड़। फिर बैठक। फिर कुश्ती। जो हार गया, बाहर। जो जीता, वो अंदर।"
मैं दौड़ में उतरा। मेरे पैर मिट्टी में धँस रहे थे, पर मेरे पैर ऊपर की नई मिट्टी को पहचान रहे थे और नीचे की पुरानी परत को भी। कहीं पैर नरम पड़ता तो मैं दाँव बदल लेता, जैसे कालू काका ने सिखाया था। मैं तीसरे नंबर पर आया। सत्तर में से तीसरा।
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