Spirit of a Fighter – Chapter 119
हम दोनों चुप खड़े रहे। नीचे से माँ की आवाज़ आई। "वीर! उतर आ। बात करनी है।"
मैं उतरा। माँ आँगन में खड़ी थीं, हाथ में वो तह किया काग़ज़। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तू कल अकेला जाएगा। पर आज रात मुझे तेरी बात सुननी है। पूरी। जो तूने आज अखाड़े में देखा। जो तूने छुपाया।"
मैंने आँखें नीची कर लीं। माँ को कैसे बताता कि भैरव ने मुझे गले लगाया था और उस वक़्त मेरे पैर जमे हुए थे? कि मैं मुस्कुराता रह गया था?
"माँ," मैं बोला, "उसने मुझे गले लगाया। सबके सामने। और बोला कि मैं रघुवीर का बेटा हूँ।"
माँ का हाथ जो काग़ज़ पकड़े था, जकड़ गया।
"और तूने क्या किया?"
"मैं मुस्कुराया।"
माँ ने एक लंबी साँस ली। फिर बोलीं, "अच्छा किया। अगर तू उस वक़्त उसका हाथ झटक देता, तो आज रात तक पूरा अखाड़ा तेरा दुश्मन होता। तू जवाब नहीं देता, वीर — तू अपने हिसाब से जवाब देता है।" उन्होंने आँखें मिलाईं। "मगर याद रख — वो आदमी जिसे गले लगाकर मारता है, उसकी मौत दुगनी होती है। एक बार जिस्म की, एक बार भरोसे की।"
तभी भोला दरवाज़े पर आया। उसके हाथ में मेरी फटी धोती थी — जो मैंने उसे दे दी थी। "भाई," वो बोला, "तेरे लिए अखाड़े से एक आदमी आया था। ये देकर गया। बोला — भैरव सर का हुक्म है, कल से वीर अखाड़े में रोज़ आएगा। पर बाहर से नहीं। अंदर से। पहलवानों के साथ।"
मेरे हाथ से धोती फिसलने लगी। अंदर से? पहलवानों के साथ?
"ये अच्छी खबर है?" टिंकू ने उम्मीद से पूछा।
"ये शिकार को शेर के पिंजरे में सुलाने वाली खबर है," माँ ने कहा, और तवा चूल्हे से उतार दिया।
मैं बाहर निकला। शाम हो रही थी और अखाड़े का धुआँ अब मोटा हो गया था। मैंने देखा — दीवार के बाहर कुछ जल रहा था। जाकर देखा तो पता चला कि अखाड़े के बाहर पुराने पहलवानों की जूतियाँ और कमरबंद जलाए जा रहे थे। राख में से एक आदमी झुककर कुछ निकाल रहा था। मैंने पास जाकर देखा। लुट्टन था।
वो मुझे देखकर सीधा हो गया। उसके हाथ में एक आधा जला कमरबंद था — रघुवीर का, मैंने तुरंत पहचान लिया, क्योंकि उस पर मेरे पापा का निशान था।
"ये तेरे पापा का है," वो बोला, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। "मैं इसे जलाने नहीं दे रहा था। पर भैरव का हुक्म था — पुराने पहलवानों की कोई निशानी न रहे।" उसने मेरी आँखों में देखा। "क्यों, वीर? भैरव किस बात से डरता है कि वो पुरानी चीज़ें जलवा रहा है?"
हवा रुक गई। मैंने कमरबंद पकड़ा। उसकी राख हथेली पर लगी। और मैं सोचने लगा — भैरव ने मुझे गले लगाया, तारीफ़ की, अंदर बुलाया। और उसी दिन पुरानी निशानियाँ जलाईं। क्यों?
पर सोचने का वक़्त नहीं था। अगली सुबह भर्ती थी।
सुबह अखाड़े के बाहर लड़कों की लंबी लाइन लगी थी। सत्तर से ज़्यादा। सबके साथ नए कमरबंद, साफ़ धोती, किसी का बाप, किसी का ताऊ, किसी का गुरु साथ खड़ा। मैं सबसे पीछे खड़ा था — फटी धोती में, टूटी चप्पल में, हाथ में माँ की दी रोटी का टुकड़ा। रोटी में आज अजवाइन की गंध थी, माँ ने कहा था — पेट में हवा रहेगी तो हिम्मत बनी रहेगी।
लुट्टन लाइन में घूमकर नाम लिख रहा था। जब मेरे पास आया, तो रुक गया। मेरी फटी धोती देखी, मेरी चप्पल देखी।
"तू?"
"हाँ, मैं।"
"भर्ती पहलवानों की है।" उसने कलम उठाई। "भिखारियों की नहीं।"
लाइन में कुछ लड़के हँसे। मेरे पीछे खड़ा एक लड़का मुझसे दूर हट गया, जैसे छूत लग जाएगी।
मैंने रोटी की गठरी कसकर पकड़ी और बोला, "मेहनत का कोई सर्टिफ़िकेट होता है क्या? जो दिखा दूँ?"
लुट्टन का मुँह टेढ़ा हुआ। "तेरी मेहनत मैंने देखी है। तू ईंटें ढोता है। उन्हीं ईंटों से ये अखाड़ा बना है। तेरे लिए अखाड़ा उठाना नहीं, ढोना है।"
लाइन में कोई नहीं बोला। हवा में सिर्फ़ मिट्टी की गंध और पसीना।
तभी अंदर से आवाज़ आई। मीठी, धीमी, जैसे गुड़ घुल रहा हो।
"लुट्टन।"
भैरव खुद बाहर आया। सफ़ेद कुर्ता, चाँदी की चेन, मूँछों में तेल की चमक। वो मेरे पास आया और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
"इसे आने दो।"
फिर उसने मुझे गले लगा लिया। सब देख रहे थे। और मुझे लगा जैसे साँप ने लिपट लिया हो। चेन ठंडी थी, मेरी गर्दन से चिपकी। मूँछों में तेल की गंध थी — भारी, मीठी, जैसे बासी मिठाई। मेरे पसीने और उसके इत्र के बीच मुझे उल्टी आने लगी, पर मैं मुस्कुराया। क्योंकि सब देख रहे थे।
॥
मैं मुस्कुराया। क्योंकि सब देख रहे थे। पर मेरे अंदर कुछ और चल रहा था। भैरव का हाथ मेरी पीठ पर था और मैं उसकी बाँहों में ऐसे फँसा था जैसे कोई मछली जाल में।
"बहादुर लड़का है," भैरव ने लाइन की तरफ़ मुँह करके कहा। "गरीब घर से आया है। मेहनत की क़द्र करना सीखो, लड़कों।"
लाइन में कुछ लड़कों ने सिर हिलाया। कुछ ने नहीं। लुट्टन की आँखें ज़मीन पर थीं।
भैरव मुझे छोड़कर पीछे हटा और एक लड़के ने आगे बढ़कर उसके हाथ में गिलास थमा दिया। पीतल का गिलास, ऊपर से झाग उठा हुआ पानी।
"भर्ती का रिवाज़ है," भैरव ने कहा। "जो अखाड़े में क़दम रखे, वो पहले ये पानी पिए। ये मिट्टी का पानी है। मिट्टी से वादा।"
गिलास मेरी तरफ़ बढ़ा। मैंने गिलास देखा। पानी साफ़ दिख रहा था, पर उसके ऊपर जो भाप की पतली लकीर उठ रही थी, वो पानी की नहीं थी। वो कुछ और थी। और गंध — गंध मेरे नाक में घुस गई। वही कड़वाहट। वही पुरानी स्याही जैसी बदबू जो मैंने लुट्टन की साँस में पहचानी थी। पानी में मिला हुआ ज़हर।
अब क्या करूँ? मना कर दूँ तो सबके सामने भैरव का नाटक खुल जाएगा। पर माँ ने कहा था — अकेले लड़ने का वक़्त खत्म। और सबके सामने ज़हर का सच बोलना पिछली बार काम नहीं आया था। भैरव ने हरनाम को बचाकर भीड़ को अपनी तरफ़ घुमा दिया था।
सत्तर लड़के देख रहे थे। उनके बाप, ताऊ, गुरु — सब देख रहे थे। अगर मैं आज गिलास नहीं पीता, तो भैरव कहेगा — देखो, ये लड़का अखाड़े की मिट्टी का अपमान कर रहा है। और फिर मुझे हमेशा के लिए बाहर कर देगा।
मैंने गिलास पकड़ा। पीतल ठंडा था, पर पानी के नीचे मेरी हथेली को कुछ गरम लगा। जैसे गिलास के तले में कोई चीज़ बैठी हो।
मैंने गिलास मुँह से लगाया। भैरव की आँखें सिकुड़ीं — नहीं, सिकुड़ीं नहीं, वो बस मेरी तरफ़ टिक गईं। मैंने गिलास को होंठों से छुआकर ऊपर उठाया, जैसे पी रहा हूँ। और फिर — मैंने गिलास झुकाया।
पानी ज़मीन पर गिरा। लाल मिट्टी ने उसे चुपचाप पी लिया। और मैंने ज़ोर से खाँसना शुरू कर दिया। इतनी ज़ोर से कि मेरी आँखों से पानी आ गया।
"गला सूख गया था, सर," मैंने खाँसते-खाँसते कहा। आवाज़ फटी हुई, जैसे सच में पानी गले में अटका हो। "रास्ते भर धूल उड़ी। सॉरी, सर। गिलास फिसल गया।"
मैंने झुककर गिलास उठाया। भैरव की आँखें मेरी आँखों पर थीं। वो कुछ नहीं बोला। बस देखता रहा। दो पल। तीन पल। मेरी साँस रुकी हुई थी।
फिर वो मुस्कुराया। वही मीठी मुस्कान, जो गुड़ की तरह घुलती है और पीछे कड़वाहट छोड़ जाती है।
"अच्छा," उसने कहा। बस इतना। एक शब्द। और वो पलटकर अंदर चला गया।
मेरी टाँगों से पसीना बह रहा था, पर चेहरे पर मैंने वो भोला-भाला नाटक रखा जो गाँव के लड़के रखते हैं जब उन्हें कुछ समझ नहीं आता।
लुट्टन कलम लिए मेरे सामने आया। उसने मेरा नाम लिखा — "वीर सिंह" — और फिर धीरे से, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुनूँ, बोला, "तेरी चाल मैं समझ गया, ईंट ढोने वाले।"
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