Spirit of a Fighter1236 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1236

7 min read November 5, 2026

"तो बलवंत…" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ रुक गई।

"तू और बलवंत सगे भाई नहीं हो," सरस्वती ने कहा, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था। "पर मौसेरे भाई हो। सुहानी की कोख और गंगा की कोख — दोनों एक ही माँ की बेटियों की थीं। तू गंगा का बेटा है, बलवंत सुहानी का। तुम्हारी नसों में एक ही खून है।"

मैंने अपने हाथों को देखा। वो काँप रहे थे। और मुझे अचानक वो पल याद आया जब बलवंत ने मुझे पहली बार देखा था — उसकी आँखों में जो नफ़रत थी, वो किसी अजनबी की नहीं थी। वो किसी ऐसे आदमी की थी जो अपने ही खून से लड़ रहा हो और उसे पता भी न हो।

तभी अखाड़े के दरवाज़े पर आहट हुई। मैं पलटा।

बलवंत खड़ा था। वो गया नहीं था। वो दरवाज़े के बाहर अंधेरे में खड़ा था, और उसने सब सुन लिया था। उसके हाथ में पीली शीशी थी, और उसकी उँगलियाँ उस पर इतनी कसकर थीं कि नाखून सफ़ेद हो गए थे।

"ये झूठ है," उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "तुम झूठ बोल रही हो। मेरी माँ मर चुकी है। जगदीश बाबा ने कहा था—"

"जगदीश बाबा ने झूठ कहा," सरस्वती ने कहा, और वो उसकी तरफ़ बढ़ीं, न डरती हुई, न रुकती हुई। "और तूने उसका झूठ बीस साल पिया है, बेटा। जैसे उसने तुझे ज़हर पिलाया है।"

बलवंत की शीशी उसके हाथ से छूट गई। वो मिट्टी पर गिरी, और उसका ढक्कन खुल गया, और अंदर का पानी मिट्टी में फैल गया — एक काला धब्बा बनता हुआ।

बलवंत ने अपने खाली हाथों को देखा, फिर मेरी तरफ़। और उसकी आँखों में पहली बार वो चीज़ दिखी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — टूटन।

"अगर वो ज़िंदा है," उसने धीरे से कहा, और आवाज़ बच्चे जैसी थी, "तो उसने मुझे क्यों नहीं बचाया?"

सरस्वती ने उसके पास जाकर उसका हाथ पकड़ लिया — वो हाथ जो अभी शीशी पकड़े था, जो अट्ठाईस मुकाबले लड़ चुका था।

"क्योंकि वो भी बंद है, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "जैसे मेरी बहन गंगा बंद थी। जैसे तू बंद था। और आज रात हम उसे निकालेंगे।"

बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"बलवंत," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो नरमी थी जो मुझे खुद भी अजीब लगी। "तेरी माँ ज़िंदा है। और अगर तू चाहे तो आज रात, मेरे साथ, उसे निकालने चल। ये लड़ाई बाद में। पहले हम उसे निकालें।"

बलवंत ने मेरे हाथ को देखा। फिर अपनी मुट्ठी को। फिर उसने बहुत धीरे से अपनी मुट्ठी खोली और मेरा हाथ पकड़ लिया।

उसकी हथेली ठंडी थी। और काँप रही थी।

॥

उसकी हथेली ठंडी थी। और काँप रही थी। मैंने उसे कसकर थामा, पर वो एक पल भी मेरा हाथ नहीं थामे रहा। अपनी मुट्ठी झटककर छुड़ाई और पीछे हट गया।

"झूठ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़ंग थी जो लोहे पर लगती है। "तुम सब मिलकर मुझे पागल बना रहे हो। मेरी माँ मर चुकी है। मैं चार साल का था जब मरी। गुरुजी ने बताया था।"

"गुरुजी ने बहुत कुछ बताया होगा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से काँप रही थी। "पर एक बात बता — तेरे गुरुजी ने कभी तुझे तेरी माँ की कोई चीज़ दी? कोई कपड़ा? कोई तस्वीर? कुछ भी?"

बलवंत का जबड़ा कसा। उसकी गर्दन की नसें उभर आईं।

"मेरे पास उसकी अँगूठी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी नरम पड़ी। "चाँदी की। जगदीश बाबा ने दी थी। कहा था — तेरी माँ की आख़िरी निशानी है।"

"दिखा उसे।"

"क्यों?"

"क्योंकि मेरे पास भी एक चाँदी की अँगूठी है," मैंने कहा। "और वो भी किसी की माँ की है। और मुझे शक है कि दोनों अँगूठियाँ एक ही हाथ की थीं।"

बलवंत ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने चाँदी की अँगूठी निकाली — छोटी, घिसी हुई, ऊपर एक फूल बना हुआ।

मेरे पेट में ठंडी सुई सी चुभी। यही अँगूठी थी। बिल्कुल यही। जो मुझे भवानी की कब्र की मिट्टी में मिली थी। जिस पर बाहरी पानी वाले आदमी के नाखून का निशान था।

"मेरे पास भी यही है," मैंने कहा, और अपनी जेब से निकाली।

दो अँगूठियाँ उसके हाथ में एक साथ चमकीं। एक जैसी। एक ही ढलाई। एक ही फूल। फर्क सिर्फ़ इतना कि एक पर नाखून का निशान था और दूसरी पर धूल जमी थी।

बलवंत की साँस रुक गई। उसने अँगूठी को अपनी आँखों के बहुत पास उठाया और देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"ये…" उसकी आवाज़ फटी। "ये तेरे पास कहाँ से आई?"

"तेरे पिता की कब्र से," मैंने कहा। "भवानी सिंह की। जिसे तेरे गुरुजी ने मरवाया। और जिसकी हड्डियाँ आज भी एक पीतल के संदूक में सड़ रही हैं।"

बलवंत ने अँगूठी अपनी मुट्ठी में भींच ली। उसकी मुट्ठी से खून की एक बूँद नीचे गिरी — क्योंकि उसके हाथ में अभी खंभे से मारने का घाव ताज़ा था और उसने उसे साफ़ भी नहीं किया था।

"मेरे पिता ज़िंदा हैं," उसने कहा। "बिशन। जो कल भट्ठे पर आया था। जिसने कहा था—"

"बिशन तेरा पिता नहीं है," मैंने कहा। "बिशन भवानी का दूधभाई है। तेरा पिता रघुवीर था। और तेरी माँ सुहानी है। और वो ज़िंदा है।"

बलवंत ने आँखें बंद कर लीं।

मैंने सरस्वती की तरफ़ देखा। वो अपनी जगह पर खड़ी थीं, हाथ जोड़े हुए, होंठ हिल रहे थे — जैसे कोई दुआ पढ़ रही हों। उनकी आँखों से पानी बह रहा था, पर वो पोंछ नहीं रही थीं।

"अगर वो ज़िंदा है," बलवंत ने धीरे से कहा, आँखें बंद ही रखीं, "तो बीस साल से कहाँ थी? क्यों नहीं आई? क्यों मुझे जगदीश बाबा के पास छोड़ दिया?"

"क्योंकि उसे बंद कर दिया गया था," सरस्वती ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "जैसे गंगा को बंद किया। जैसे मुझे बंद किया जाता रहा — मेरे सपनों को, मेरे हाथों को, मेरी ज़ुबान को। सुहानी को जगदीश ने उसी जगह रखा जहाँ गंगा है। और बलवंत — सुन मेरी बात — तुझे उससे दूर रखा इसलिए कि तू उसकी गोद में बैठकर रो न सके। क्योंकि जो बेटा माँ की गोद में रो लेता है, वो फिर किसी और का गुलाम नहीं बनता।"

बलवंत ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में पानी था — पर गुस्से का। वो पलटा और अखाड़े के मिट्टी के खंभे पर अपनी पूरी ताकत से मुक्का मारा।

खंभा हिला। मिट्टी उड़ी। और बलवंत की उँगलियों से खून की धार बहने लगी।

"बस कर!" मैंने कहा, और उसका हाथ पकड़कर पीछे खींचा। "ये हाथ लड़ने के लिए है, दीवार तोड़ने के लिए नहीं।"

"मुझे क्या करना चाहिए?" उसने मेरी तरफ़ पलटकर कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "बीस साल मुझे बताया गया कि मेरी माँ मर चुकी है और मेरे बाप ने उसे मारा। बीस साल मुझे उस आदमी के पास खड़ा किया जो मेरे पिता का क़ातिल है। और मैं उसके पैर छूता रहा। मैं उसकी मिट्टी पर सिर झुकाता रहा।" उसने अपना घायल हाथ देखा। "मैं क्या हूँ, वीर सिंह? मैं किसका बेटा हूँ? किसका शिष्य हूँ? मैं किस चीज़ का नाम हूँ?"

यही वो पल था। मैंने उसे बोलने नहीं दिया। मैंने उसका कंधा पकड़ा और उसे मिट्टी पर बैठा दिया — उसी मिट्टी पर जिसे उसने अभी जूते से घुमाया था।

"तू भवानी सिंह का बेटा है," मैंने कहा, और मैंने अपना पूरा ज़ोर लगाया आवाज़ में। "जिसने बीस साल पहले एक बच्चे को आग से निकाला था। जिसने अपनी जान देकर भी एक सच बचाया था। और तू उसी का बेटा है। तेरी नसों में वही खून है जो मेरे पिता की नसों में था।"

बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

"मैं तुझे तेरी माँ से मिलवा सकता हूँ," मैंने कहा, और मैंने उसकी आँखों में देखा। "आज रात। पर एक शर्त है।"

"क्या?"

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