Spirit of a Fighter – Chapter 1235
पर मैंने उनकी आँखों में देखा और मुझे वो सुबह याद आई जब उन्होंने पहली बार मुझे अखाड़े की मिट्टी दी थी। उनके हाथ काँप रहे थे, और वो बोले थे — "ये मिट्टी सबकी नहीं होती। जो इसे अपना समझे, वही इसे पाता है।"
मैं आगे बढ़ा।
"ठीक है," मैंने कहा। "मैं मुकाबले में आऊँगा। पंद्रह दिन बाद। काग़ज़ पर, पंचायत के सामने।"
बलवंत के चेहरे पर हवा बदली। वो मुस्कुराया, पर वो मुस्कान उसके होठों तक ही पहुँची, आँखों तक नहीं।
"पर एक बात," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ठंडी थी। "मैं तेरे पानी के बिना लड़ूँगा।"
बलवंत रुका।
"क्या?"
"तेरी पीली शीशी," मैंने कहा। "जो तू पीता है, जो तेरे गुर्गे तेरी बोतल में घोलते हैं। मैं उसके बिना लड़ूँगा। और अगर मैं जीता — तो तू मेरी एक बात मानेगा।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया। गुर्गों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। कालू काका ने सिर उठाया और उनकी आँखें फैल गईं।
बलवंत हँसा। पहले धीरे, फिर ज़ोर से। उसकी हँसी अखाड़े की दीवारों से टकराकर लौटी।
"तू पागल है," उसने कहा। "तू जानता है मैं क्या हूँ? मैं अट्ठाईस मुकाबले लड़ा हूँ। अट्ठाईस! और तू — तू तो अभी बच्चा है। तेरे हाथों में मज़दूरी के छाले हैं, पहलवानी के नहीं।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मैं वही हूँ जो तेरे जैसा नहीं है। इसीलिए तू मुझसे डरता है।"
बलवंत की हँसी एक झटके में रुक गई। उसकी आँखें सिकुड़ीं, और उसके जबड़े की मांसपेशी उभरी।
"मान लूँगा," उसने कहा, और आवाज़ धीमी थी, खतरनाक। "पर तू जीतेगा नहीं।"
"तो फिर डर किस बात का?" मैंने कहा। "वादा कर, बलवंत। पंचायत के सामने।"
उसने एक पल सोचा। फिर उसने अपने गुर्गे की तरफ़ हाथ बढ़ाया और कहा, "रस्सी काट।"
गुर्गे ने छुरी निकाली और कालू काका के हाथों की रस्सी काट दी। काका आगे गिरने लगे, पर मैं दौड़कर पहुँचा और उन्हें थाम लिया। उनका शरीर सूखा था, हल्का — जैसे कोई पुरानी लाठी।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।
उन्होंने मेरा चेहरा देखा। उनकी आँखों से पानी बह रहा था — मिट्टी में धारियाँ बन रही थीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, हाँफते हुए। "तूने मेरे लिए वादा कर लिया। पर ये लड़ाई आसान नहीं है।"
"काका," मैंने कहा, और मैंने उनके झुर्रीदार हाथ पकड़े। "आपने मुझे मिट्टी दी थी। आज मैं आपके लिए लड़ूँगा।"
कालू काका ने अपना हाथ धीरे से उठाया और मेरे सिर पर रख दिया। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उसमें वो ताकत थी जो मिट्टी से आती है।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा," उन्होंने कहा, और आवाज़ काँप रही थी। "और आज मैंने देख लिया कि तू उसका असली बेटा है। भवानी भी यही कहते थे — जो मिट्टी से बैर न करे, वो कभी अकेला नहीं मरता।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उन्हें उठाया और टिंकू की तरफ़ बढ़ाया। टिंकू दौड़ा आया और काका का दूसरा हाथ थाम लिया।
"काका, आप बैठिए," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर अब भी था, पर उसने काका को सहारा दिया।
बलवंत ने ये सब देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदल रहा था — जैसे कोई दीवार अंदर से दरक रही हो। उसने अपनी बोतल जेब से निकाली, ढक्कन खोला, और पीने लगा।
"पंद्रह दिन," उसने कहा, और बोतल से उसकी मूँछें गीली थीं। "पंचायत के सामने काग़ज़। और फिर — मैदान।"
"मैदान," मैंने दोहराया।
वो पलटा और अपने गुर्गों के साथ चल दिया। पर जाते-जाते वो रुका और बिना पलटे बोला, "वीर सिंह।"
"क्या?"
"तेरी माँ ने तुझे अच्छा पाला। पर वो ये नहीं जानती कि मैं क्या बन चुका हूँ।"
वो चला गया। और उसके जाने के बाद अखाड़े में सिर्फ़ लालटेन की रोशनी बची, कालू काका की साँसें, और मेरे हाथों में मिट्टी की गंध।
मैंने काका को अखाड़े के किनारे बने पत्थर के चबूतरे पर बैठाया। टिंकू ने अपनी टोपी उतारकर काका के सिर के नीचे रख दी।
"काका," मैंने कहा, "वो कह रहा था कि तेरी माँ अच्छा पाला। उसे माँ के बारे में क्या पता?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब भी गीली थीं, पर उनमें कुछ और था।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "बलवंत को जगदीश सिंह ने पाला। और जगदीश सिंह वो आदमी है जिसने भैरव को उकसाया। पर बलवंत के दिल में कहीं न कहीं ये बात बैठी है कि उसकी माँ ने उसे छोड़ा। उसे कोई बताने वाला नहीं था कि सच क्या है।"
"और सच क्या है?" मैंने पूछा।
काका ने साँस ली। "सच ये है कि उसकी माँ — रघुवीर की बीवी सुहानी — मरी नहीं थी। उसे भी जगदीश ने कहीं बंद कर दिया। जैसे तेरी गंगा देवी को।"
मेरे हाथ रुक गए। "कहाँ?"
"मुझे नहीं पता, बेटा।" काका ने सिर हिलाया। "पर इतना पता है कि जगदीश सिंह के हर बंद कमरे की एक ही जगह है — हवेली के नीचे, तहखाने के उस पार। जहाँ तक कोई पहुँचा नहीं।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो पुराना डर लौट आया था, पर उसने कुछ नहीं कहा।
मैं उठा और अखाड़े की मिट्टी पर खड़ा हो गया। मेरे पैरों के नीचे वही लाल मिट्टी थी जो मेरे बचपन से मेरे सपनों में थी।
"काका," मैंने कहा, "मैं पंद्रह दिन में बलवंत से लड़ूँगा। पर उससे पहले मुझे उसकी माँ को ढूँढना है। अगर वो ज़िंदा है, तो ये सच बलवंत को तोड़ देगा — और अगर सच उसे तोड़ देगा, तो लड़ाई आधी जीत जाएगी।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो चमक फिर लौटी।
"तू सोचता है जैसे भवानी सोचते थे," उन्होंने कहा।
तभी अखाड़े के दरवाज़े पर आहट हुई। मैं पलटा, और मेरे दिल ने एक धड़कन छोड़ दी।
सरस्वती खड़ी थीं — अकेली, सिर पर सफ़ेद चोटी, माथे पर हल्दी का टीका, हाथ में वो पीतल का लोटा जिससे वो रोज़ चक्की के पास पानी पीती थीं।
"माँ?" मैंने कहा। "आप यहाँ?"
वो अंदर आईं। उनके कदम धीमे थे, पर रुके नहीं। और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने कभी नहीं देखा था — न डर, न गुस्सा। कुछ और। जैसे कोई बहुत दिनों से बोझ उठाए खड़ा हो और अब उसे नीचे रखने का फ़ैसला कर चुका हो।
वो मेरे पास आईं, और फिर कालू काका के सामने झुककर बैठ गईं।
"काका," उन्होंने कहा, "आप ठीक हैं?"
"सरस्वती," काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में हैरानी थी। "तुम यहाँ क्यों आईं? इतनी रात?"
सरस्वती ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने लोटा ज़मीन पर रख दिया और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
"मैंने एक बात छुपाई थी," उन्होंने कहा, और आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पुरानी गठरी खोल रहा हो। "बहुत दिनों से। और आज जब मैंने सुना कि बलवंत ने काका को उठा लिया, तो मुझे लगा कि अब और नहीं।"
"माँ," मैंने कहा, "क्या बात?"
वो उठीं और मेरी तरफ़ मुड़ीं। उनकी आँखें सीधी मेरी आँखों में थीं।
"बलवंत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक झटका था, "तेरी माँ अभी भी ज़िंदा है। और वो मेरी बहन है।"
अखाड़े में हवा रुक गई। टिंकू के हाथ से टोपी गिर गई। कालू काका की साँस अटक गई।
"क्या?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी।
"सुहानी," सरस्वती ने कहा, और उनका गला भर गया। "रघुवीर की बीवी। बलवंत की माँ। वो मेरी सगी बहन थी — गंगा से छोटी, मुझसे बड़ी। और जब भवानी मरे और हवेली में आग लगी, तो मैंने सोचा कि सुहानी भी उसी आग में जल गई। पर आज बीस साल बाद, गंगा के काग़ज़ों में मुझे उसका नाम मिला। वो ज़िंदा है, वीर। जगदीश ने उसे भी उसी जगह बंद कर रखा है।"
मैं एक कदम पीछे हटा। मेरे कानों में सनसनी थी। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी अचानक ढीली लगी।
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