Spirit of a Fighter1234 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1234

7 min read November 5, 2026

अखाड़े में रणवीर सिंह अब भी बैठे थे — व्हीलचेयर में, कंबल ओढ़े, आँखें बंद। पर जैसे ही मेरी आहट आई, उन्होंने आँखें खोल दीं।

"गया था?" उन्होंने पूछा।

"हाँ।"

"और?"

"वो मेरा भाई है," मैंने कहा। "और वो मुझसे नफ़रत करता है।"

रणवीर सिंह ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "बैठ।"

मैं उनके सामने मिट्टी पर बैठ गया। अखाड़े की मिट्टी ठंडी थी, और उसकी गंध — गीली, भारी — मेरे अंदर तक गई।

"मुझे बलवंत को हराना है," मैंने कहा। "पर मारना नहीं। मुझे ऐसा दाँव चाहिए जो उसे गिराए, पर तोड़े नहीं।"

रणवीर सिंह ने कुछ देर कुछ नहीं कहा। फिर उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई — थकी, पुरानी, पर असली।

"तो फिर तैयार हो जा, बेटा," उन्होंने कहा। "आज से तेरी असली ट्रेनिंग शुरू होती है।"

उन्होंने अपने कंबल के नीचे से एक छोटी पोटली निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"इसे खोल।"

मैंने खोली। अंदर एक जोड़ी पहलवानी की लंगोट थी — लाल, मोटे कपड़े की, किनारों पर पीली कढ़ाई। और उसके नीचे एक रस्सी, जो किसी मिट्टी में लिपटी हुई थी।

"ये मेरी पहली लंगोट है," रणवीर सिंह ने कहा। "जिस दिन मैंने पहली बार अखाड़े में पैर रखा था। और ये रस्सी — ये उसी दिन की है। मेरे गुरु ने मुझे दी थी। उन्होंने कहा था — 'जिस दिन तुझे लगे कि तू अपने दुश्मन से नहीं, अपने आप से लड़ रहा है, उस दिन इसे बाँध लेना।'"

मैंने लंगोट को हाथ में लिया। कपड़ा मुलायम था, पर उसमें एक गंध थी — पुरानी मिट्टी, पुराना पसीना, और कुछ और भी। जैसे उस कपड़े ने बहुत सारी जीतें देखी हों और बहुत सारे दर्द भी।

"आज से तू सिर्फ़ ताकत नहीं सीखेगा," रणवीर सिंह ने कहा। "तू सीखेगा कि दुश्मन को कैसे गिराया जाता है बिना उसकी हड्डी तोड़े। ये सबसे मुश्किल दाँव है, वीर। कोई भी ताकतवर आदमी किसी को मार सकता है। पर किसी को गिराकर उठा देना — वो सिर्फ़ पहलवान का काम है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "कल सुबह चार बजे आना। और खाली पेट आना।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज से तू खाना जीतेगा, माँगेगा नहीं।"

मैं हँसा। पहली बार कई दिनों में मेरे अंदर से हँसी निकली, और वो अजीब लगी — जैसे कोई पुराना दोस्त दरवाज़े पर आया हो।

मैं उठा और घर की तरफ़ बढ़ा। माँ आँगन में बैठी थीं, गुड़िया उनके पास सो रही थी। माँ ने मुझे देखा और कुछ नहीं पूछा — बस एक कटोरी दाल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने बैठकर खाई। दाल में नमक कम था, और मैं जानता था कि क्यों।

"माँ," मैंने कहा, "कल से मैं सुबह जल्दी जाऊँगा। रणवीर सिंह के पास। ट्रेनिंग के लिए।"

माँ ने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा। पर खाली पेट लड़ने वाला जल्दी गिरता है। सुबह उठकर मैं तुझे रोटी दे दूँगी।"

मैंने सिर हिलाया। मेरी आँखें भर आई थीं, पर मैंने उन्हें कटोरी में झुका लिया।

तभी बाहर से पैरों की तेज़ आवाज़ आई। दरवाज़े पर टिंकू खड़ा था — हाँफता हुआ, टोपी तिरछी, आँखें फटी हुईं।

"वीर!" वो चिल्लाया। "वीर, जल्दी आ!"

मैं उठ खड़ा हुआ। "क्या हुआ?"

"कालू काका!" टिंकू की आवाज़ फट रही थी। "बलवंत के गुर्गे उन्हें उठाकर ले गए! अखाड़े से! मैंने देखा — वो लाठी लेकर आए और काका को घसीटकर ले गए!"

मेरा खून ठंडा हो गया।

"कहाँ ले गए?"

"मालूम नहीं! पर जाते वक़्त एक गुर्गे ने कहा —" टिंकू ने साँस ली, "— कहा कि बलवंत का संदेश है। अगर वीर पंद्रह दिन बाद मुकाबले में नहीं आया, तो कालू काका की हड्डियाँ अखाड़े की मिट्टी में मिल जाएँगी।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था, पर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया — कसकर।

"तू जानता है ये क्या कर रहा है?" माँ ने कहा। "वो तुझे डराकर मुकाबले से भगाना चाहता है।"

"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजीब लगी — शांत, ठंडी। "वो मुझे मुकाबले में खींच रहा है। वो जानता है कि मैं कालू काका को छोड़कर नहीं जाऊँगा। उसे यही चाहिए — मुझे मैदान में लाना।"

"तो तू मत जा," टिंकू ने कहा। "हम पुलिस को बताते हैं—"

"पुलिस को बताने में देर है," मैंने कहा। "और बलवंत तेज़ है। वो काका को कहीं और ले जाकर छिपा सकता है।"

मैंने माँ का हाथ थामा और उनकी आँखों में देखा।

"माँ, वो मेरा भाई है," मैंने कहा। "मैं उससे नहीं हारूँगा। पर मैं उसे ये भी नहीं करने दूँगा कि वो किसी बूढ़े को अपने गुस्से की कीमत बनाए।"

माँ ने मेरा हाथ छोड़ा। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में लोहा।

"जा," उन्होंने कहा। "पर वापस आ।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने अपनी टोपी सीधी की और काँपती आवाज़ में कहा, "मैं साथ चलूँगा। डर लग रहा है, पर चलूँगा।"

"चल," मैंने कहा।

और जैसे ही मैं आँगन से बाहर निकला, मुझे दूर से आवाज़ आई — अखाड़े की तरफ़ से, जहाँ अंधेरा था। एक लाठी ज़मीन पर पटकी। और फिर एक आवाज़, जो मेरे कानों में सीधी घुसी।

"वीर सिंह! तेरा काका यहाँ है। आकर ले जा — अगर तेरा दिल है तो।"

टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा, पर मैं पहले ही कदम बढ़ा चुका था।

॥

मैंने कदम बढ़ाया तो टिंकू मेरे पीछे-पीछे दौड़ा, पर उसकी चप्पल की आवाज़ मेरे दिल की धड़कन से धीमी थी। रास्ते में नीम के पेड़ों की परछाइयाँ ज़मीन पर ऐसे पड़ी थीं कि लगा कोई बैठा है और हमें जाते हुए देख रहा है।

अखाड़े का दरवाज़ा खुला था। और अंदर, मिट्टी के बीच, एक लालटेन जल रही थी। उसी लालटेन की रोशनी में कालू काका बँधे थे — मिट्टी के बीच, घुटनों के बल, हाथ पीछे बँधे, सफ़ेद दाढ़ी में धूल।

उनके चारों तरफ़ आठ-दस गुर्गे खड़े थे, लाठियाँ हाथों में। और उनके बीच, मिट्टी पर पैर जमाए, बलवंत खड़ा था। उसने वही लाल धोती पहनी थी जो रणवीर सिंह की अलमारी से आती है, और गले में वही रस्सी थी जो किसी पहलवान की पहचान होती है।

"आ गया," बलवंत ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुड़ जैसी मिठास थी जो भैरव की आवाज़ में हुआ करती थी। "मुझे पता था तू आएगा। भवानी का बेटा अपने बूढ़े को छोड़कर कहीं नहीं जाता।"

मैं रुका। मेरी आँखें कालू काका पर थीं। उनकी साँस चल रही थी — मैंने उनका सीना उठते-गिरते देखा, और मेरे अंदर कुछ ढीला हुआ।

"काका," मैंने आवाज़ दी। "कुछ हुआ?"

कालू काका ने सिर उठाया। उनकी आँखों में डर था, पर उस डर के पीछे वो पुरानी चमक अब भी ज़िंदा थी।

"कुछ नहीं हुआ, बेटा," उन्होंने कहा, और आवाज़ रेत जैसी खुरदरी थी। "बस मेरी कमर टूट रही है।"

"बहुत बातें," बलवंत ने कहा। वो आगे बढ़ा, और मिट्टी उसके पैरों के नीचे दबी। "सुन, वीर सिंह। मैं तुझे आज़ाद नहीं करूँगा। न काका को, न किसी को। जब तक तू मुकाबले का वादा नहीं करता।"

"वादा?" मैंने कहा। "मैं तो पहले ही कह चुका हूँ। पंद्रह दिन बाद। अखाड़े में।"

"नहीं।" बलवंत ने सिर हिलाया, और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो हारी हुई आँखों में आती है। "तूने कहा था कि सच मिट्टी में कहेगा। मुझे वादा चाहिए — काग़ज़ पर, पंचायत के सामने, हरनाम के हाथ से। ताकि तू भाग न सके।"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और बहुत धीरे से सिर हिलाया — ना में। मत कर, बेटा। मेरे लिए मत कर।

मेरे पेट में कुछ जम गया। मैं जानता था कि काका क्या कह रहे हैं। वो कह रहे थे — मैं बूढ़ा हूँ, मेरी वजह से अपने आपको बाँध मत।

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