Spirit of a Fighter1233 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1233

7 min read November 5, 2026

"तेरे पिता भी ऐसे ही बोलते थे," उसने कहा। "जब वो लड़ने निकलते थे, तो कहते थे — 'मैं लड़ने नहीं जा रहा।' और फिर भी कोई उनके सामने नहीं टिकता था।"

वो मुड़कर चल दिया, और उसकी पीठ देखकर मुझे लगा कि वो बूढ़ा आदमी आज कुछ ज़्यादा ही झुका हुआ चल रहा है।

मैं घर नहीं गया। मैं सीधे उस पुराने मंदिर की तरफ़ चल दिया, और रास्ते में मेरा दिल धक-धक कर रहा था — इस डर से नहीं कि वहाँ गुर्गे हैं। इस डर से कि वहाँ जो सच है, वो मैं उस आदमी तक पहुँचा पाऊँगा या नहीं।

पुराना मंदिर गाँव के बाहर उस टीले पर था जहाँ से पूरा रामपुर दिखता था। उसकी दीवारें टूटी थीं, छत आधी गिरी थी, और अंदर की मूर्ति का चेहरा इतने सालों की धूल में ऐसा ढका था कि लगता था वो भी अपनी पहचान छिपा रही है।

मैं दीवार के पास पहुँचा तो मुझे आवाज़ें सुनाई दीं। हँसी। बर्तन की खनक। और उसके ऊपर, एक आवाज़ जो बाकी सबसे अलग थी — भारी, धीमी, जैसे कोई बोलते-बोलते थक गया हो।

मैंने दीवार के दरार से झाँका।

अंदर आग जल रही थी। चार-पाँच गुर्गे बैठे थे, बर्तन में कुछ पका रहे थे। और उनके बीच, पत्थर पर बैठा, एक आदमी था — बड़ा शरीर, चौड़े कंधे, पर कमर झुकी हुई। उसने पीली धोती पहनी थी, गले में काला धागा। उसके हाथ में एक बोतल थी, और वो उसे धीरे-धीरे घुमा रहा था, जैसे कोई चीज़ तौल रहा हो।

बलवंत।

पर वो वैसा नहीं दिख रहा था जैसा चबूतरे पर दिखा था। चबूतरे पर उसकी आँखों में आग थी। यहाँ उसकी आँखों में कुछ और था। थकान। जैसे कोई आदमी बहुत दूर चलकर आया हो और अब रास्ता भूल गया हो।

उसने बोतल का ढक्कन खोला और उसे मुँह की तरफ़ उठाया।

मैंने सोचा भी नहीं। मैं दीवार से निकला और अंदर चला गया।

"वो मत पी।"

सब रुक गए। एक गुर्गे का हाथ बर्तन पर रुक गया। दूसरे ने लाठी उठाई। पर बलवंत ने हाथ उठाया — बस एक हाथ — और सब जहाँ थे वहीं जम गए।

उसने बोतल नीचे की और मेरी तरफ़ देखा।

"तू आ गया," उसने कहा। "मुझे लगा था तू डर जाएगा।"

"मैं डरा हूँ," मैंने कहा। "पर तेरी बोतल से ज़्यादा नहीं।"

बलवंत ने बोतल की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"ये पानी नहीं है," मैंने कहा। "ये तुझे मार रहा है।"

वो हँसा। ज़ोर से हँसा, और उसकी हँसी मंदिर की टूटी दीवारों से टकराकर लौटी।

"ये पानी नहीं, ये मेरी ताकत है," उसने कहा। "गुरुजी ने दिया है। चौबीस साल की उम्र में मुझे भारत केसरी के मुकाबले तक पहुँचाया। ये पानी नहीं होता तो मैं आज भी किसी अखाड़े की मिट्टी में पड़ा होता।"

"और ये पानी तेरे अट्ठाईस मुकाबलों में से हर एक के बाद तुझे बेहोश करवाता रहा?" मैंने कहा। "हर जीत के बाद तू गिरता रहा, और तुझे लगा कि ये थकान है? ये थकान नहीं है, बलवंत। ये तेरा शरीर है जो अंदर से जल रहा है।"

बलवंत की हँसी रुक गई। उसने बोतल को अपने घुटने पर रखा और मेरी तरफ़ झुककर देखा।

"तू मुझे क्या समझता है?" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "तू सोचता है मुझे नहीं पता? मुझे पता है ये मुझे खा रहा है। मैं रातों को उठकर बैठ जाता हूँ और अपनी हड्डियों में दर्द महसूस करता हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं, सुबह उठते वक़्त। पर तेरे पास इसका दूसरा रास्ता है? बता। मेरे पास क्या है? एक नाम — जगदीश सिंह का बेटा। और क्या? मेरे बाप ने मुझे पाला, मुझे पहलवान बनाया। उसने मेरा नाम बनाया। अगर ये शीशी छोड़ दूँ, तो मैं क्या हूँ? किसी का बेटा जो किसी का नहीं है।"

मेरे गले में कुछ अटक गया। ये वो आवाज़ नहीं थी जो चबूतरे से गूँजी थी। ये किसी और की आवाज़ थी — कोई अंदर बैठा हुआ आदमी, जो बाहर वाले से थक गया था।

मैंने अपनी जेब से वो तस्वीर निकाली जो गोविंदा वैद्य ने मुझे दी थी — भवानी की तस्वीर, जिसमें वो मिट्टी में खड़े थे, अपने दोनों शिष्यों के बीच।

"ये आदमी तुझे जानता था," मैंने कहा, और तस्वीर उसकी तरफ़ बढ़ा दी। "ये भवानी सिंह हैं। और तू इनका बेटा है।"

बलवंत की नज़र तस्वीर पर पड़ी और वो जम गई।

उसने हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ काँप रही थीं — वो वाली कंपकंपी जो पानी से नहीं आती। उसने तस्वीर अपने हाथ में ली और उसे आग की रोशनी में उठाया।

बहुत देर तक वो कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें तस्वीर पर टिकी थीं, और उसका जबड़ा कसता जा रहा था।

"ये… ये मेरे गुरुजी हैं," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो। "मैंने इनकी तस्वीर देखी है। गुरुजी के कमरे में, ताले के अंदर। मैंने एक बार पूछा तो उन्होंने मुझे डाँट दिया था। कहा था — 'ये आदमी हमारे खून का दुश्मन था।'"

"वो झूठ बोले," मैंने कहा। "भवानी सिंह तेरे बाप थे। उनकी मौत पर उनका भाई रोया नहीं, हँसा। और तू बीस साल से उसी भाई के हाथ की बोतल पी रहा है।"

बलवंत की आँखें भर आईं। उसने तस्वीर को अपने सीने से लगाया — बस एक पल के लिए — और उस पल में वो पहलवान नहीं था, एक बच्चा था जिसे बताया गया था कि उसका बाप कोई और है।

तभी पीछे से एक गुर्गा उठा — लंबा, दुबला, आँखों पर एक निशान। शेराज़ का साथी लग रहा था।

"ये झूठ बोल रहा है!" वो चिल्लाया। "बलवंत भाई, ये वही है जिसने तेरे बाप को जेल में डाला! ये भवानी का बेटा है, और भवानी ने ही तेरे असली बाप को मरवाया था। ये तुझे तोड़ने आया है!"

बलवंत का शरीर कठोर हो गया। उसने तस्वीर को हाथ से दूर किया, और उसकी उँगलियाँ फिर कसने लगीं।

"तू मुझे बर्बाद करने आया है," उसने कहा। आवाज़ फिर भारी हो गई थी, फिर वो वाली, जो चबूतरे से आई थी। "तू मेरा नाम छीनने आया है। मेरी जीत छीनने आया है।"

"मैं तेरा कुछ नहीं छीन रहा," मैंने कहा। "मैं तुझे तेरा ही बता रहा हूँ।"

"चुप कर!" उसने तस्वीर ज़मीन पर पटक दी। काँच चटककर बिखर गया। "मैं तुझे मैदान में मारूँगा। यहीं क़सम खाता हूँ — पंद्रह दिन बाद, उसी मिट्टी में, मैं तुझे ऐसा गिराऊँगा कि तेरा नाम भी मिट जाए।"

उसके गुर्गे मेरी तरफ़ बढ़े। एक ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धक्का दिया। मैं लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं।

मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैं झुका, ज़मीन पर बिखरे काँच के बीच से तस्वीर उठाई — काँच टूटा था, पर भवानी का चेहरा साफ़ था। मैंने काँच के टुकड़े झाड़े और तस्वीर अपनी जेब में रख ली।

फिर मैंने बलवंत की तरफ़ देखा। वो वहीं खड़ा था, साँस भारी, आँखें लाल। मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी तरफ़ देखा — उस आदमी की तरफ़ जो मेरा भाई था और नहीं जानता था, जिसका गुस्सा किसी और का बोया हुआ था, जिसका दर्द मेरे अपने दर्द से मिलता था।

और उस पल मुझे अपने पिता की बात याद आई — "मिट्टी से बैर मत करो।" मैंने सोचा, आदमी से भी नहीं। क्योंकि जिस आदमी से तुम लड़ रहे हो, वो कभी तुम्हारा दुश्मन था ही नहीं।

मैं मुड़ा और बाहर चला गया। पीछे से किसी ने कुछ कहा, पर मैंने सुना नहीं। बाहर निकलकर ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी, और मुझे एहसास हुआ कि मेरी कमीज़ पसीने से भीगी हुई है।

रास्ते में मैंने तस्वीर जेब से निकाली और उसे देखा। भवानी सिंह मिट्टी में खड़े मुस्कुरा रहे थे, उनके दोनों तरफ़ उनके शिष्य — एक तरफ़ रघुवीर, दूसरी तरफ़ वो औरत जिसका नाम मुझे नहीं पता था। और उनके पीछे, धुंधला, एक और चेहरा था — जवान, बड़ी मूँछें, तेल लगी। जगदीश सिंह। वो भी उस तस्वीर में था। उस वक़्त भी वो उनके पीछे खड़ा था।

मैंने तस्वीर जेब में वापस रखी और कदम तेज़ कर दिए।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho