Spirit of a Fighter – Chapter 1232
"पंद्रह दिन," मैंने कहा, और मैंने मीरा की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े पर खड़ी थी। "पंद्रह दिन में मुझे अपने भाई को भैरव के ज़हर से बचाना है। और उसके लिए मुझे वो करना होगा जो मैंने कभी नहीं किया — अपना राज़ खोलना होगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, पर उसने कुछ नहीं पूछा। उसने बस अपना हाथ बढ़ाया और मेरा हाथ थाम लिया।
"तो कल से," उसने कहा, "हम तेरे भाई को ढूँढना शुरू करते हैं। अकेले।"
और उस रात, सोने से पहले, मैंने आँगन में खड़े होकर आसमान की तरफ़ देखा।
अगली सुबह मैं उठा तो आँगन में टिंकू अकेला बैठा था, और उसके सामने ज़मीन पर एक लकीर खिंची थी। वो उस लकीर को उँगली से बार-बार मिटा रहा था और फिर बना रहा था।
"क्या कर रहा है?" मैंने पूछा।
"गिन रहा हूँ," उसने सिर उठाए बिना कहा। "कितने दिन बचे हैं। तेरह। पर ये लकीर मिटती नहीं। मैं मिटाता हूँ, फिर भी रह जाती है।"
मैं उसके पास बैठ गया। उसकी उँगली पर मिट्टी लगी थी, और आँखों के नीचे काला घेरा।
"तू रात भर सोया नहीं?"
"नींद आई ही नहीं। सोचता रहा — जब तू अपने भाई से लड़ेगा, तो मैं क्या करूँगा? मैं तो किसी से नहीं लड़ सकता। मुझे तो डंडा पकड़ना भी नहीं आता।"
मैंने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। "तू मेरे साथ रहेगा। बस। जब मैं अकेला पड़ूँ, तू मुझे दिख जाए — इतना काफ़ी है।"
वो कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "मैं तेरे भाई को भी लड्डू खिलाऊँगा। जब वो लौटेगा।"
इसी बीच मीरा आई। उसके हाथ में एक बासी रोटी थी जो उसने रास्ते में ही खाई थी, और उसकी आँखें बता रही थीं कि वो भी रात भर जागी है।
"वो बूढ़ा," उसने धीरे से कहा, "जो कल आया था — मैंने उसके पीछे आदमी भेजा था। वो गाँव के बाहर पुराने कुएँ के पास रुका था। वहाँ कोई और भी आया — काला कुर्ता, लंबा आदमी। दोनों में कुछ देर बात हुई।"
मेरा पेट कस गया। "काला कुर्ता? भैरव के आदमी?"
"पता नहीं। पर बात करने के बाद बूढ़ा कुएँ की तरफ़ गया, और वो आदमी शहर की तरफ़। दोनों अलग-अलग रास्तों पर गए। जैसे कोई समझौता हुआ हो।"
मैंने गोविंदा की पोटली जेब से निकाली और उस काग़ज़ को फिर पढ़ा। "अगर वो सच में भैरव के साथ है," मैंने कहा, "तो ये पोटली भी जाल हो सकती है।"
"या वो फँसा हुआ है," मीरा ने कहा। "डरा हुआ आदमी अपने दुश्मन से भी बात कर लेता है। इसका मतलब ये नहीं कि वो उसका हो गया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में वो यकीन था जो मेरे अंदर नहीं था।
"तू उसे बचाना चाहती है?" मैंने पूछा।
"मैं तुझे बचाना चाहती हूँ," उसने सीधा कहा। "और तू उसे बचाना चाहता है। तो फ़ैसला तेरा है, मेरा नहीं।"
दोपहर को मैं अखाड़े की तरफ़ गया — न लड़ने, बस देखने। दूर से ही मैंने देखा कि अखाड़े का दरवाज़ा बंद था, और उस पर एक नया ताला लगा था। मेरे पिता का अखाड़ा। मेरा अखाड़ा। बंद।
मैंने ताला छुआ। ठंडा था। मेरी उँगलियाँ उस पर रुक गईं, और अचानक मुझे अपने पिता की आवाज़ याद आई — वो मुझे कंधे पर बैठाकर यहीं खड़े हुए कहते थे, "ये मिट्टी तेरी है, बेटा। इसे कभी मत बेचना।"
"तू इसे बंद नहीं कर सकता," मैंने ताले से कहा, जैसे वो भैरव हो। "ये मेरी मिट्टी है।"
शाम को लौटते वक़्त मैंने चबूतरे की तरफ़ देखा। वहाँ भीड़ थी। और भीड़ के बीच, ऊँचे बाँस पर, एक ढोल टँगा था — नया, चमकता, उस पर लाल कपड़ा बँधा।
मैं रुक गया। मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
ढोल बजा — एक, दो, तीन बार। और भीड़ चुप हो गई। तभी चबूतरे पर एक आदमी चढ़ा, लंबा, चौड़े कंधे, पीली धोती। उसने हाथ उठाया, और भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"सुनो, गाँव वालो," उसकी आवाज़ चबूतरे से गूँजी। "भारत केसरी की तारीख़ तय हो गई। पंद्रह दिन बाद, इसी मैदान में। और ये लड़ाई सिर्फ़ दो पहलवानों की नहीं — ये लड़ाई सच और झूठ की है। जो जीतेगा, वही सच होगा।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैल गई। मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। और तभी उस आदमी ने आँखें उठाईं और सीधे मेरी तरफ़ देखा — जैसे वो मुझे पहले से ढूँढ रहा था।
वो मुस्कुराया। और उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे जाना-पहचाना लगा — जैसे मैंने ये मुस्कान कहीं और देखी हो, बहुत पहले, किसी और चेहरे पर।
वो भीड़ में घुल गया। और मैं वहीं खड़ा रह गया, ये सोचते हुए कि मैंने अभी क्या देखा।
तभी मेरे पीछे किसी ने धीरे से कहा, "देख लिया? वो ही है।"
मैं पलटा। गोविंदा वैद्य खड़ा था — इस बार चेहरा खुला, बिना शॉल, आँखों में वो डर नहीं, बस एक थकी हुई सच्चाई।
"तू यहाँ कैसे?" मैंने कहा।
"मैं तुझसे मिलने आया था," उसने कहा, "पर तेरे पीछे-पीछे कोई और भी आया था। उसने मुझे कुएँ के पास रोका। कहा — 'बूढ़े, तू बीच में मत आ।' मैंने कहा, 'मैं तो सिर्फ़ सच्चाई दे रहा हूँ।' वो हँसा और चला गया।"
"वो कौन था?"
"भैरव का आदमी। पर उसने मुझे मारा नहीं। क्यों — ये मैं नहीं जानता। शायद भैरव चाहता है कि तू सच जाने। शायद उसे लगता है कि सच जानकर तू टूट जाएगा।"
वैद्य ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे एक तरफ़ खींच लिया, भीड़ से दूर, दीवार की परछाई में।
"अब ध्यान से सुन," उसने कहा। "जो मैंने कल तुझे बताया, वो सच था। पर आधा सच। बलवंत भवानी का बच्चा है — ये सच है।
॥
"पर आधा सच। बलवंत भवानी का बच्चा है — ये सच है।"
वैद्य की उँगलियाँ मेरी कलाई पर कस गईं। उसकी हथेली ठंडी थी, पर पकड़ सख्त।
"आधा सच क्या है?" मैंने पूछा।
"ये कि बलवंत सिर्फ़ भवानी का बेटा नहीं है," वैद्य ने धीरे से कहा। "वो भवानी का बदला लेने के लिए पैदा हुआ है। जिस दिन वो पैदा हुआ, उस दिन उसकी माँ सुहानी ने उसे गोद में लेकर कहा था — 'ये बच्चा भवानी की मिट्टी का है, और एक दिन ये उसका हिसाब लेगा।' पर सुहानी ने ये नहीं कहा कि किससे। उसने नाम नहीं लिया। और जगदीश सिंह ने उसी चुप्पी का फ़ायदा उठाया। उसने बच्चे को गोद लिया, अपना नाम दिया, और उसके कान में ये बात डाल दी कि भवानी को भैरव ने मारा। फिर उसे पीली शीशी पकड़ाई। बीस साल तक उसे यही पिलाया।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"तो बलवंत को पता ही नहीं," मैंने कहा, "कि वो किसका बेटा है?"
"उसे पता है," वैद्य ने कहा। "पर उसे ये भी बताया गया है कि भवानी बुरा आदमी था। कि भवानी ने उसके बाप को मरवाया। बलवंत के दिल में भवानी की तस्वीर जली हुई है, वीर। उसने बचपन से उस आदमी से नफ़रत की है जो असल में उसका बाप था।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। पंद्रह दिन बाद मैं उस आदमी से लड़ने वाला था जिससे मेरा कोई बैर नहीं था। जिसका दुश्मन मैं नहीं था। जिसकी नफ़रत किसी और ने उसके दिल में बोई थी।
"तो फिर लड़ाई का मतलब क्या है?" मैंने कहा। "अगर वो मेरा भाई है—"
"लड़ाई का मतलब यही है," वैद्य ने कहा, "कि उसके दिल तक पहुँचने का एक ही रास्ता है। और वो रास्ता मिट्टी से होकर जाता है, बातों से नहीं। उसने बातें सुनी हैं बहुत — सब झूठ। अब उसे सच देखना है। और सच सिर्फ़ लड़ाई में दिखता है।"
उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और भीड़ की तरफ़ देखा, जो धीरे-धीरे छँट रही थी।
"वो गाँव के बाहर पुराने मंदिर में ठहरा है," वैद्य ने कहा। "पर जाने से पहले सोच ले। वहाँ तेरे अपने आदमी नहीं हैं।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं लड़ने नहीं जा रहा।"
वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी थकी आँखों में कुछ पिघला।
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