Spirit of a Fighter – Chapter 1231
"गाँव वालो!" बलवंत की आवाज़ पूरे चबूतरे पर गूँजी, और उसमें वो गरज थी जो उसने भैरव से सीखी थी। "सुनो! सुनो! आज से ठीक पंद्रह दिन बाद, इसी चबूतरे पर, 'भारत केसरी' की कुश्ती होगी!"
भीड़ में हलचल मच गई। किसी ने ताली बजाई, किसी ने सीटी, कोई चुप रहा। सुक्खी बुआ अपना पान का बीड़ा मुँह में दबाकर आगे आईं।
"अरे मैंने तो सुना है कि—"
"चुप!" बलवंत ने उनकी तरफ़ हाथ उठाया, और वो चुप हो गईं। "आज मैं ऐलान करता हूँ — इस कुश्ती में मेरा सामना होगा… वीर सिंह से!"
पूरा चबूतरा मेरी तरफ़ मुड़ा। हज़ार आँखें मुझ पर, और मैं वहीं खड़ा था, कीचड़ में, धोती में, टूटी चप्पल में, मेरे हाथ में पिता की डायरी और मेरे सीने में उसकी तस्वीर।
बलवंत ने मुझे देखा। उसकी आँखों में वो गुस्सा था जो मैंने पहले भी देखा था, पर आज उसमें कुछ और भी था — कुछ ऐसा जो शायद उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था। जैसे वो मुझे देखकर किसी पुराने चेहरे को याद करने की कोशिश कर रहा हो।
"और अगर वीर सिंह जीत गया," बलवंत ने आवाज़ ऊँची की, "तो मैं जगदीश सिंह की सारी ज़मीन, सारा अखाड़ा, सब उसके नाम कर दूँगा।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। इतना बड़ा दाँव कोई नहीं खेलता।
"और अगर मैं जीता," बलवंत ने कहा, और उसकी आवाज़ अब धीमी थी, हल्की, पर उसमें ज़हर घुला था, "तो वीर सिंह का सब कुछ मेरा होगा। उसका अखाड़ा। उसका घर।" वो रुका, और उसने मुझे सीधे देखा। "और उसकी माँ।"
मेरे हाथ में डायरी कस गई। मेरी आँखों के आगे लाल हो गया। मैं आगे बढ़ा, पर मीरा ने मेरी बाँह पकड़ ली।
"रुक," उसने मेरे कान में कहा। "ये वो चाहता है। तुझे गुस्से में देखना चाहता है।"
मैं रुका। मेरी साँस तेज़ थी। मेरे हाथ काँप रहे थे। पर मैं रुका।
गोविंदा ने मेरे कान के पास आकर धीरे से कहा, "वो तेरा भाई है, वीर। पर उसे ये नहीं पता। और भैरव ने उसे ये सिखाया है कि तेरा भाई तुझे मारना ही उसका धर्म है।"
"तो मैं उसे बताऊँगा," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ नीची रखी। "कुश्ती से पहले नहीं। कुश्ती में। जब वो मेरे सामने खड़ा होगा, तब मैं उसे सच बताऊँगा।"
बलवंत ने ताम्रपत्र ऊपर उठाया। "पंद्रह दिन! चबूतरे से चबूतरे तक खबर जाए! जो भी इस कुश्ती को देखना चाहता है, आ जाए! और वीर सिंह —" उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई — "तू आएगा ना? या डर के मारे भाग जाएगा?"
मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया, और मैंने वो कहा जो मेरे पिता ने मुझे सिखाया था — बिना चिल्लाए, बिना गुस्से के, बस ठंडे दिल से।
"मैं आऊँगा।" मैं रुका। मेरी आवाज़ पूरे चबूतरे तक गई। "और मैं तुझे कुछ बताना है, बलवंत। एक बात। जो तूने कभी सुनी नहीं।"
बलवंत रुका। उसका हाथ ताम्रपत्र पर जम गया।
"क्या?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो नहीं था — जिज्ञासा।
"वो बात मैं चबूतरे पर नहीं बताऊँगा," मैंने कहा। "वो बात मैं तेरे कान में कहूँगा, जब तू मेरे साथ मिट्टी में खड़ा होगा। और फिर तू खुद फैसला करेगा कि तू किसका बेटा है।"
बलवंत की आँखें सिकुड़ीं। वो मेरी तरफ़ देखता रहा, और उस पल में मुझे लगा कि उसके अंदर कहीं, बहुत गहरे, कोई छोटा बच्चा जागा है — वो बच्चा जो भवानी की गोद में हँसता था।
पर फिर उसने अपना चेहरा सख़्त कर लिया, ताम्रपत्र ऊपर उठाया और चिल्लाया, "पंद्रह दिन!"
ढोल फिर बजे। शंख फिर बजे। भीड़ बिखरने लगी।
और मैं वहीं खड़ा रहा, अपने पिता की डायरी सीने से लगाए, अपने भाई को देखता हुआ, जो मुझे अपना दुश्मन समझ रहा था।
गोविंदा मेरे पास आया, जब भीड़ छँट गई। उसने अपना पीला कपड़ा उतारा और लंबी साँस ली।
"मैं अब जाऊँगा," उसने कहा। "बलवंत के गुर्गे मुझे ढूँढ रहे हैं। पर वीर, एक बात याद रखना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"बलवंत तेरा भाई है, ये सच है।" वो रुका, और उसकी आवाज़ भारी हो गई। "लेकिन उसका दिल अब भैरव का है। और भैरव ने उसे सिखाया है कि तेरा भाई तुझे मारना ही उसका धर्म है। तू उसे सच बताएगा, तो वो मानेगा नहीं। वो तुझ पर हँसेगा। वो कहेगा कि तू झूठ बोल रहा है। और फिर वो तुझे मारने की कोशिश करेगा।"
मैंने अपनी डायरी कसकर पकड़ी। "तो मैं क्या करूँ?"
"तू उसे हराना नहीं, वीर।" गोविंदा ने मेरी आँखों में देखा। "तू उसे जिताना। उसे ऐसे हराना कि वो अपने आप से हार जाए। और जब वो अपने आप से हार जाए, तब वो सच सुनेगा।"
वो पलट गया और अंधेरे में चला गया। उसकी लाठी की आवाज़ दूर होती गई, और फिर सिर्फ़ मेरे अपने दिल की धड़कन बची।
मीरा ने मेरा हाथ थामा। "पंद्रह दिन," उसने कहा। "पंद्रह दिन में तुझे अपने भाई को हराना है, और उसे बताना भी है कि तू उसका भाई है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और पंद्रह दिन में मुझे ये भी सीखना है कि कोई अपने ही भाई से कैसे लड़ता है।"
टिंकू मेरे पास आया, उसकी आँखें लाल थीं, पर उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी अब भी थी। उसने उसे खोला और उसमें से एक लड्डू निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"खा," उसने कहा। "पंद्रह दिन की लड़ाई के लिए ताकत चाहिए।"
मैंने लड्डू लिया और मुँह में रखा। मीठा था। और मैंने पहली बार महसूस किया कि ज़िंदगी में कुछ चीज़ें अब भी मीठी हैं — भाई की लड़ाई के बीच भी।
आँगन में लौटकर मैंने डायरी फिर खोली। माँ मेरे पास बैठीं। गुड़िया मेरे दूसरी तरफ़, उसका सिर मेरे कंधे पर।
मैंने डायरी का एक पन्ना पलटा, जो मैंने पहले नहीं पढ़ा था। उस पर सिर्फ़ चार लाइनें थीं, और वो मेरे पिता की आख़िरी लिखाई थीं — काँपती, टूटती, किसी मरते हुए आदमी की।
"बल्लू से कहना — मैंने तुझे अपने हाथों से नहीं छोड़ा। मुझे छोड़ने पर मजबूर किया गया। और जिसने किया, वो तेरे सामने खड़ा है — अपना नाम बदलकर। उसका असली नाम विक्रम है, और वो मेरा शिष्य था। पर अब वो मेरा कातिल है। बल्लू, तू उससे मेरा बदला ले। पर पहले ये जान ले कि तू किसका बेटा है। तू भवानी का बेटा है। और भवानी का बेटा कभी झुकता नहीं।"
मैंने डायरी बंद की और अपनी आँखों से पानी पोंछा।
"पंद्रह दिन," मैंने धीरे से कहा, खुद से, माँ से, और उस तस्वीर से जिसमें मेरा भाई भवानी की गोद में हँस रहा था। "पंद्रह दिन में मैं तुझे तेरा बाप वापस दिलाऊँगा, बल्लू। चाहे मुझे खुद टूटना पड़े।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनके हाथ से हल्दी की गंध आ रही थी, और उस गंध में मुझे अपने पिता की आवाज़ सुनाई दी — दूर, बहुत दूर से, पर साफ़।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा। और तेरा भाई भी मिट्टी से बना है। उसे बस याद दिलाना है कि वो किस मिट्टी से बना है।"
मैंने सिर हिलाया। और तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई — तीन बार, धीमी, रुकी हुई।
टिंकू दौड़कर गया। दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ ज़मीन पर एक छोटी पोटली रखी थी — पीले कपड़े में बँधी, जिस पर सूखी हल्दी के दाग थे। वही कपड़ा। वही दाग। गोविंदा का।
मैंने पोटली उठाई और खोली। अंदर एक काग़ज़ था, और उस पर सिर्फ़ एक लाइन, जो गोविंदा की लिखाई में थी।
"भैरव ने बलवंत को पंद्रह दिन तक पीली शीशी देना शुरू कर दिया है। वो उसे तेरे खिलाफ़ पागल कर देगा। अगर तू उसे बचाना चाहता है, तो कुश्ती से पहले उससे मिलना होगा — अकेले। और वो मिलेगा नहीं, जब तक तू उसके सामने अपना सबसे बड़ा हथियार न रख दे।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रखा। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे।
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