Spirit of a Fighter – Chapter 1230
टिंकू दौड़कर आया। उसके हाथ में मिठाई की एक छोटी डिब्बी थी, जो उसने अब तक अपने पास रखी थी — शायद बलवंत की भीड़ से छुपाने के लिए। उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई, फिर रुक गया, जब उसने तस्वीर देखी।
"ये…" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी जो हमेशा रहती थी। "ये भवानी चाचा हैं ना? और गोद में ये बच्चा कौन है?"
"बलवंत," मैंने कहा। "हमारा भाई।"
टिंकू ने तस्वीर देखी, फिर मुझे देखा, फिर मीरा को। और फिर उसने डिब्बी मेरे हाथों में रख दी और वहीं कीचड़ में बैठ गया।
"भाई," वो बोला, और उसकी आवाज़ से पता चल रहा था कि वो कुछ सोच रहा है जो उसे समझ नहीं आ रहा। "मैंने बलवंत को अखाड़े में देखा। वो जब मिट्टी पर जूता घुमा रहा था, तो मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा रहा था… मुझे गुस्सा आ रहा था। पर अब…" वो रुका। "अब अजीब लग रहा है। जैसे मैंने अपने ही भाई को गाली दी हो।"
गोविंदा ने उसकी तरफ़ देखा। "तू टिंकू है?" उसने पूछा। "सरस्वती का छोड़ा हुआ बेटा?"
टिंकू का सिर झटके से ऊपर उठा। "तुम्हें कैसे पता?"
"मुझे सब पता है," गोविंदा ने कहा। "मैं तेरे घर के पास से गुज़रा था, बहुत साल पहले। तब तू बहुत छोटा था। सुक्खी बुआ के आँगन में खेल रहा था।" उसने एक गहरी साँस ली। "तेरी माँ ने तुझे इसलिए दिया था कि भैरव तेरे तक न पहुँचे। वो जानती थी कि भैरव भवानी के हर बच्चे को मारेगा।"
टिंकू ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी टोपी उतारी और अपने घुटनों में मुँह छिपा लिया। मैंने उसे देखा और मुझे लगा कि अगर आज मैंने ये सब नहीं सुना होता, तो शायद मैं भी ऐसे ही बैठ जाता।
गोविंदा ने अपनी कमर से एक और चीज़ निकाली। एक डायरी। वही पीली, भुरभुरी, जिसकी बात उसने पहले की थी।
"ये पूरी है," उसने कहा। "पहली डायरी में बस कुछ पन्ने थे। ये… ये पूरी डायरी है, वीर। तेरे पिता ने इसे मुझे दिया था, और कहा था — 'इसे उसी दिन खोलना जब बल्लू अखाड़े में खड़ा हो और तेरा बेटा उसके सामने।'"
मैंने डायरी अपने हाथ में ली। मैंने उसे खोला। पन्ने पीले थे, कुछ जगह से फटे हुए, कुछ पर पानी के दाग। पहले पन्ने पर मेरे पिता की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन थी, जो मैंने ज़ोर से पढ़ी, क्योंकि मेरी आवाज़ अंदर ही अंदर गूँज रही थी।
"बल्लू को कोई ये मत बताना कि वो किसका बेटा है। अगर बताना ही हो, तो उस दिन बताना जिस दिन वो अपने हाथों से अपना हक़ ले सके।"
मैंने आगे पढ़ना शुरू किया। पिता की लिखाई में पूरी कहानी थी, और वो कहानी मेरे अंदर घुसती गई, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी नदी अपना रास्ता बनाती हो।
रघुवीर भवानी का सबसे प्रिय शिष्य था। उसकी उम्र तब अट्ठाईस साल थी, और उसकी बीवी का नाम था — सुहानी। सुहानी अखाड़े के पास के गाँव की थी, और उसकी आँखों में वो रंग था जो छोटे बच्चों को हँसाता है। जब बल्लू पैदा हुआ, तो भवानी ने पूरे अखाड़े में मिठाई बाँटी, तीन दिन तक लगातार, और चबूतरे पर अपने हाथों से पहली पूरी अपने शिष्य की बीवी के हाथ में रखी।
पर चौथे दिन भैरव आया। उसने रघुवीर को अखाड़े के बाहर बुलाया और कहा — "तू अब मेरे साथ चल। तेरे बाप का काम मैं तुझे दूँगा।" रघुवीर ने मना कर दिया। कहा — "मेरा बाप तो भवानी है, मैं उसके अखाड़े में मरूँगा।" भैरव हँसा और चला गया।
और उसी रात रघुवीर को ज़हर मिला। पानी में।
वो तीन दिन तड़पा। चौथे दिन मर गया। और उसके मरने के बाद, भैरव ने सुहानी को घर से उठवाया और कहा — "तेरा बेटा मेरा है। अगर तूने किसी को कुछ बताया, तो ये बच्चा भी नहीं रहेगा।" सुहानी चुप रही। चार महीने बाद वो भी मर गई — किसी ने कहा बुखार, किसी ने कहा दुख।
पर भवानी जानता था। उसे भैरव पर शक था। पर उसके पास सबूत नहीं था। तो उसने एक काम किया। उसने गोविंदा को बुलाया और कहा — "बल्लू को भैरव के घर से नहीं निकाल सकता, वो अब भैरव का बेटा बन चुका है जगदीश के घर में। पर मैं उसे अपने दिल में रखूँगा। और मैं उससे वादा करता हूँ कि जिस दिन वो बड़ा होकर अखाड़े में आएगा, मैं उसे सच बताऊँगा।"
पर भवानी मर गया, सच बताने से पहले।
डायरी का आख़िरी पन्ना मैंने पढ़ा, और मेरी आँखें धुँधली हो गईं।
"अगर मैं न रहूँ, तो बल्लू को ये डायरी देना। और उससे कहना — तेरे बाप ने तुझे नहीं छोड़ा। तेरे बाप को छोड़ने पर मजबूर किया गया। और जिसने किया, वो तेरे सामने खड़ा है, अपना नाम बदलकर — भैरव। उसका असली नाम विक्रम है। वो मेरा शिष्य था, और अब वो मेरा कातिल है।"
मैंने डायरी बंद की। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने उसे सीने से लगा लिया, जैसे इसमें मेरे पिता की साँस बंद हो।
मीरा ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। उसकी आँखें भी गीली थीं।
"तो ये जंग नहीं है," उसने कहा, धीरे से, जैसे खुद से बोल रही हो। "ये परिवार की जंग है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और मैं अपने भाई से लड़ने नहीं जा रहा। मैं उससे उसका बाप वापस दिलाने जा रहा हूँ।"
गोविंदा ने अपनी लाठी उठाई। वो जाने को था — मुझे उसकी चाल से पता चला, उस पुराने आदमी की चाल से जो हमेशा भागता हुआ चलता है।
"रुक," मैंने कहा, और मैं उठ खड़ा हुआ, कीचड़ में, घुटनों पर, पर खड़ा होकर। "एक बात और।"
"क्या?"
"तूने ये सब बीस साल छुपाया।" मेरी आवाज़ में आरोप नहीं था, सिर्फ़ सवाल था। "क्यों? तू उस दिन अखाड़े में आ सकता था। मेरे पिता की मौत के बाद। कोई नहीं रोकता था।"
गोविंदा ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और उस पर टेक लगाई। उसका चेहरा उस पल में और भी पुराना लगा।
"मैं आया था," उसने कहा। "तेरे पिता की मौत के तीन दिन बाद। मैं अखाड़े के फाटक पर खड़ा था। और भैरव ने मुझे देखा।" वो रुका। "उसने मुझे कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराया, और अपनी जेब से एक चीज़ निकाली — बल्लू की एक छोटी जूती। और मेरी तरफ़ फेंक दी। फिर बोला — 'गोविंदा, तेरी बीवी अच्छी रोटी बनाती है। कल मैं उसके हाथ की रोटी खाने आऊँगा।'"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया। "तो तू डर गया।"
"मैं डर गया," गोविंदा ने कहा, और उसने अपनी आँखें नहीं चुराईं। "मैं अपनी बीवी और बच्चों को लेकर शहर भाग गया। बीस साल तक भैरव की परछाई से डरता रहा। हर आवाज़ पर मेरा दिल रुक जाता था। और तू अब मुझसे पूछेगा कि मैं तेरे पिता का दूधभाई था — तो मैं कहूँगा, हाँ, था। पर डर ने मुझे सबसे बड़ा गद्दार बना दिया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में शर्म थी, और उस शर्म से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती। मैंने उसे माफ़ नहीं किया, पर मैंने उससे नफ़रत भी नहीं की। मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया।
"आज तू यहाँ खड़ा है," मैंने कहा। "इसीलिए मैं तुझे माफ़ करता हूँ।"
और तभी बाहर से ढोल की आवाज़ आई।
नहीं, एक ढोल नहीं — तीन ढोल। और उनके साथ शंख। और भीड़ की आवाज़ जो अचानक फट पड़ी, जैसे गाँव का पूरा चबूतरा उठकर खड़ा हो गया हो।
मैं दौड़कर अखाड़े के फाटक तक आया। मीरा मेरे पीछे थी। टिंकू भी। गोविंदा ने अपना मुँह पीले कपड़े से ढक लिया और मेरे पीछे-पीछे चला।
चबूतरे पर एक ऊँचा मंच बनाया गया था — लकड़ी का, जिस पर लाल कपड़ा बिछा था। और उस पर खड़ा था बलवंत। आज उसने लाल धोती पहनी थी, और उसके गले में सोने की मोटी चेन थी — भैरव की चेन, मैंने तुरंत पहचान लिया। उसके दोनों ओर दो गुर्गे खड़े थे, और उसके हाथ में एक ताम्रपत्र था, जिस पर सोने के अक्षर चमक रहे थे।
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