Spirit of a Fighter – Chapter 1229
मैंने उसे उठाया।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी, और वो लाइन मेरे पिता की लिखाई में थी।
"बलवंत को बचा। वो मेरा बेटा नहीं, पर मेरा खून है।"
मेरे हाथ काँप गए। मैंने पीछे मुड़कर माँ को देखा — और माँ की आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। ऐसा डर जो बीस साल से दबा हुआ था, और अब उनके चेहरे पर खुलकर बैठा था।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट रही थी। "बलवंत… वो किसका बेटा है?"
माँ ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया। गंगा देवी ने उनकी तरफ़ देखा, और उनका चेहरा भी सफ़ेद था — जैसे वो ये सब जानती हों, और बीस साल से इसे अपने अंदर दबाए बैठी हों।
और तभी बूढ़े ने आख़िरी बात कही, और उसकी आवाज़ में वो सब था जो एक पुराने गवाह के पास होता है जो अब और नहीं रुक सकता।
"बलवंत तेरे पिता का बेटा नहीं है, वीर।" उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई और अपनी पूरी ऊँचाई पर आ गया, जो ज़्यादा नहीं थी। "वो तेरे पिता के सबसे पुराने दोस्त का बेटा है। वो आदमी जिसका नाम तेरे घर में आज तक किसी ने नहीं लिया।"
वो रुका, और हवा में सूखी हल्दी की गंध घुल गई।
"वो आदमी… वही है जिसने मुझे ये डायरी दी थी। मैं ही वो आदमी हूँ, वीर। और बलवंत मेरा बेटा है।"
मेरे हाथ से डायरी फिसल गई और ज़मीन पर गिरी। उसके पन्ने हवा में खुले, और उनमें से एक फोटो निकली — पुरानी, धुँधली, जिसमें तीन आदमी खड़े थे। बीच में मेरे पिता। एक तरफ़ जगदीश सिंह। और दूसरी तरफ़ — नौजवान, हँसता हुआ, मूँछें बड़ी…
वही बूढ़ा। वही आदमी। बीस साल पहले।
और उस फोटो के पीछे, मेरे पिता की लिखाई में, सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे, जो मैंने पढ़े और मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
"भाई बचा।"
॥
"भाई बचा" — मैंने वो दो शब्द दोबारा पढ़े, और मेरे हाथ से फोटो फिसलने लगी। मैंने उसे सीने से लगा लिया, क्योंकि अगर वो ज़मीन पर गिरती, तो शायद टूट जाती, और उसमें जो बूढ़ा हँसता हुआ नौजवान खड़ा था, वो कहीं खो जाता।
"तू… तू गोविंदा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लगी। "भवानी का दूधभाई। वैद्य। वो जो जलती कोठी में मुझे मिला था।"
बूढ़े ने अपनी लाठी पर हाथ रखा और धीरे से सिर हिलाया। उसकी आँखों में पानी नहीं था, पर उसकी पलकें भारी थीं — जैसे बीस साल का थकान उन पर बैठी हो।
"हाँ," वो बोला। "वही गोविंदा। पर उस रात मैंने तुझे पहचाना नहीं था। मैं तो खुद जल रहा था, वीर। और अब यहाँ आया हूँ, क्योंकि वक़्त निकल रहा है।" उसने पीछे देखा, अखाड़े के फाटक की तरफ़, जहाँ भीड़ अभी भी खड़ी थी। "बलवंत के गुर्गे हर तरफ़ हैं। मैं छुपकर आया हूँ। ज़्यादा देर नहीं रुक सकता।"
"तो जल्दी बोल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ आ गई जो मेरे पिता की आवाज़ में होती थी। "बलवंत किसका बेटा है? सच बोल। अब और कोई झूठ नहीं।"
गोविंदा ने एक गहरी साँस ली। उसकी छाती से सीटी जैसी आवाज़ निकली, जैसे उसके फेफड़े बीस साल की धूल से भरे हों।
"मैं झूठ नहीं बोलूँगा, वीर। पर जो सच है, वो तेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच लेगा।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और काँप रही थीं। "मैंने तुझे ये कहा कि बलवंत मेरा बेटा है। ये आधा सच था। मैंने उसे पाला ज़रूर है, पर वो मेरे खून का नहीं है।"
मैंने पीछे माँ को देखा। माँ का हाथ अब भी मुँह पर था, और उनकी आँखें गोविंदा पर टिकी थीं, जैसे वो पहले से जानती हों कि वो क्या कहने वाला है।
"तो किसका है?" मैंने पूछा। "जगदीश का?"
"नहीं।" गोविंदा ने सिर हिलाया। "जगदीश ने उसे बस अपना नाम दिया, अपना घर दिया, अपना ज़हर दिया। पर बलवंत जगदीश का बेटा नहीं है।" उसने मेरी आँखों में देखा। "बलवंत उस शिष्य का बेटा है जो तेरे पिता के अखाड़े का आख़िरी नौजवान था। नाम था — रघुवीर।"
मैंने वो नाम पहले कहीं सुना था। नहीं, सुना नहीं था — पढ़ा था। पिता की डायरी में।
"रघुवीर," मैंने धीरे से दोहराया। "वो जिसका नाम तहखाने की दीवार पर मिटा दिया गया था?"
गोविंदा की आँखें फैल गईं। "तूने वो दीवार देखी?"
"मैंने उसे छुआ था," मैंने कहा। "कालू काका को छूते देखा था। और मुझे ऐसा लगा जैसे दीवार ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया हो।"
कालू काका आगे आए, जो अब तक चुप खड़े थे, और उनकी लाठी ज़मीन पर टकराई। "गोविंदा," वो बोले, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो नाम से भी पुराना था, "तू अब भी वो बात नहीं कह रहा जो सबसे ज़रूरी है।"
गोविंदा ने अपनी आँखें बंद कीं। कुछ पल वो ऐसे ही खड़ा रहा, और सिर्फ़ हवा की आवाज़ आ रही थी — अखाड़े की मिट्टी से उठती धूल की, दूर किसी चिड़िया की, और मेरे अपने दिल की धड़कन की।
"रघुवीर को भैरव ने ज़हर दिया था," उसने कहा, आँखें बंद ही रखीं। "पर सिर्फ़ ज़हर नहीं दिया। भैरव ने रघुवीर की बीवी के हाथ से बच्चा छीन लिया, जब वो सिर्फ़ छह महीने का था। और उस बच्चे को जगदीश सिंह के घर में डाल दिया। कहा — 'ये तेरा बेटा है। अब इसे वही सिखाना जो मैं चाहता हूँ।'"
मेरा गला सूख गया। "और उस बच्चे का नाम?"
"बच्चे का नाम भवानी ने रखा था।" गोविंदा ने आँखें खोलीं। "भवानी ने रघुवीर से वादा किया था कि उसके बेटे का नाम वो खुद रखेगा। और उसने रखा — 'बल्लू।'" उसकी आवाज़ टूटी। "आज लोग उसे बलवंत कहते हैं। पर भवानी उसे बल्लू बुलाता था।"
मैं वहीं कीचड़ में बैठ गया। मुझे अपने घुटनों पर अपना कोई ज़ोर नहीं रहा। मीरा दौड़कर आई और मेरा कंधा पकड़ा, पर मैंने उसका हाथ नहीं देखा। मैं सिर्फ़ गोविंदा का चेहरा देख रहा था।
"तो बलवंत… वो पिता के अखाड़े का बच्चा है?" मैंने पूछा। "वो मेरे पिता का शिष्य का बेटा है? यानी…"
"यानी वो तेरा भाई है," माँ ने कहा। उनका हाथ अब मुँह से हट चुका था, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, जैसे बीस साल का दबा हुआ पानी एक झटके में फूट पड़ा हो। "खून का भाई नहीं, वीर। पर भवानी ने उसे अपना बेटा कहा था। और भवानी का कहा हुआ, मेरे लिए खून से भी बड़ा है।"
गोविंदा ने अपनी कमर से एक छोटी थैली निकाली। कपड़े की, जिस पर पुरानी हल्दी के दाग थे। उसने उसे खोला और अंदर से एक तस्वीर निकाली।
"ये मैंने बीस साल छुपाकर रखी है," उसने कहा। "भैरव के आदमियों ने जो कुछ जलाया, उसमें ये बच गई।"
मैंने तस्वीर अपने हाथ में ली। वो बहुत पुरानी नहीं थी — कोई बारह-तेरह साल पुरानी होगी। उसमें मेरे पिता खड़े थे — भवानी सिंह, पूरे शरीर में, उनकी बड़ी मूँछें, उनका चौड़ा सीना, उनकी आँखें जो काग़ज़ से भी बाहर देख रही थीं। और उनकी गोद में एक छोटा बच्चा था, जिसके बाल घुंघराले थे और जो अपनी उँगली भवानी की मूँछ में फँसा रहा था। बच्चा हँस रहा था। भवानी भी।
"ये बलवंत है?" मीरा ने धीरे से पूछा, मेरे कंधे के ऊपर से देखते हुए।
"यही है," गोविंदा ने कहा। "बारह साल का। भवानी उसे हर रविवार अखाड़े में लाता था। कहता था — 'ये मेरा बल्लू है। इससे बड़ा पहलवान कोई नहीं होगा।'"
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने उसे रोका नहीं। मैंने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया, और मेरे होंठ अपने आप बोले, बिना सोचे, बिना किसी से पूछे।
"ये तो मेरा भाई है, माँ।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनके हाथ से हल्दी की गंध आ रही थी — वही, जो बचपन में जब मैं बुखार में पड़ता था तो उनके हाथ से आती थी।
"हाँ, बेटा," वो बोलीं। "यही है। और यही सबसे बड़ा दुख है।"
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