Spirit of a Fighter – Chapter 1227
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं देखा था। "वीर, ये जगदीश सिंह का बेटा है। उसी जगदीश का, जिसने खुद मुझे कुएँ में बंद किया। उसने अपने ही बेटे को बचपन से तेरे खिलाफ़ पाला है। हर रात सोने से पहले उससे कहा है — वीर सिंह तेरा दुश्मन है। वो तेरा हक़ छीनने आया है।"
बलवंत ने अपना सिर पकड़ लिया। वो ज़मीन पर बैठ गया। जलती छत के नीचे, राख में, एक 'भारत केसरी' का दावा करने वाला पहलवान बच्चे की तरह बैठ गया।
और तभी मुझे अपना सिर चकराया। नाक से कुछ गरम बहा — खून। मैंने पोंछा। इस रात में मैंने अपनी सूंघने की शक्ति बहुत इस्तेमाल की थी। बहुत ज़्यादा।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "बस," उसने कहा। "और मत सूंघ।"
"पर बलवंत—"
"बलवंत अभी गिरेगा नहीं," उसने कहा। "ये पानी ऐसे नहीं काम करता। वो ऊपर से मज़बूत है। अंदर से खोखला। इसे अभी बस आराम चाहिए। और तुझे भी।"
रास्ते में माँ मेरे साथ चली। उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। गंगा देवी भी पीछे आ रही थीं, टिंकू उनका सहारा बना हुआ था। करण बलवंत को घसीटकर ले जा रहा था, और बलवंत के आदमी अब हथियार डाल चुके थे — उनका सरदार ही जब टूट गया, तो लड़ने का क्या मतलब।
आँगन में पहुँचे तो आसमान में हल्की लाली आ रही थी। चक्की की आवाज़ आ रही थी। धीमी, रुक-रुक कर।
मैं दरवाज़े पर रुक गया।
सरस्वती चक्की पर बैठी थीं। उनके हाथ लकड़ी के दस्ते पर थे, पर वो चक्की नहीं चला रही थीं। बस पकड़े हुए थीं, जैसे अब और नहीं होता। उनकी पीठ झुकी हुई थी। और उनके हाथ… उनके हाथ काँप रहे थे।
मैंने अपनी ज़िंदगी में माँ को ऐसे कभी नहीं देखा था।
वो मुझे देखकर उठीं। एक हाथ से उन्होंने अपनी कमर पकड़ी — दर्द की आदत थी, और वो दर्द अब छुपाया नहीं जा रहा था। फिर उन्होंने मेरा चेहरा देखा, और मेरी आँखों में आँसू देखे, और मेरी कमीज़ पर खून के छींटे देखे।
"आ जा," वो बस इतनी बोलीं और अपनी बाँहें खोल दीं।
मैं गया। उनकी बाँहों में। और उनका शरीर इतना छोटा लगा। मेरे दोनों हाथों की बाँहों में मेरी माँ इतनी छोटी क्यों लगी?
"तू ठीक है?" उन्होंने मेरे कान के पास पूछा।
"हाँ।"
"झूठ मत बोल।"
"हाँ, माँ।" और फिर मेरी आवाज़ टूट गई। "मैं ठीक नहीं हूँ।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैं तेरी माँ हूँ।"
वो मुझे छोड़कर पीछे हटीं, और मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने मेरी कमीज़ की तरफ़ इशारा किया।
"खून बह रहा है। मुँह धो। और फिर बैठकर सब बता।"
आँगन के चबूतरे पर सब बैठ गए। सूरज अभी पूरा नहीं निकला था, पर आसमान में वो धुँधली रोशनी फैल रही थी जब रात खत्म होने को होती है और दिन शुरू।
मैंने सब बताया। बलवंत की चुनौती। उसका ढोल। उसने क्या कहा, कैसे माँ का नाम लिया। गंगा देवी की शीशी। ज़मीन का फटना। बलवंत का लड़खड़ाना।
सब सुनने के बाद सरस्वती ने चक्की की तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सपाट थी। "वो झूठ बोल रहा है।"
"कौन?"
"बलवंत। या जो भी उसे भेजता है।" उन्होंने चक्की का दस्ता छोड़ा और अपने हाथ आँचल में पोंछे। "जब वो कहता है कि तेरे पिता ने उसके बाप को मारा — वो झूठ है। तेरे पिता भवानी सिंह ने किसी को नहीं मारा। उन्होंने सिर्फ़ सच कहा था, और सच कहने की क़ीमत उन्होंने अपनी जान से चुकाई थी।"
वो उठीं और कुछ कदम चलीं। उनके कदम धीमे थे, पर काँपते नहीं।
"पर एक बात सुन, वीर।" वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। "बलवंत के पीछे भैरव नहीं है। भैरव तो जेल में बैठा है, और वो खुद अपनी साँसों का हिसाब लगा रहा है। बलवंत के पीछे जगदीश सिंह खड़ा है। उसी ने उसे बचपन से यही सिखाया है कि तू उसका दुश्मन है। उसने बलवंत को बच्चे की तरह पाला, पर उसके दिमाग़ में सिर्फ़ एक बात भरी — इसे मारना या खुद मरना।"
गंगा देवी ने अपना सिर हिलाया। "मैंने वो सुना है," वो बोलीं। "कुएँ में बंद रहकर भी सुना है। जगदीश हर हफ़्ते बलवंत को अपने कमरे में बुलाता था। और जब वो निकलता, उसकी आँखें लाल होती थीं। मैंने एक बार उसे अपने आप से बातें करते सुना — 'वो मेरा हक़ है। वो मेरा हक़ है।' बीस साल से वही रट रहा है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा फैल गया। मैंने सोचा — बलवंत भी उसी पानी का शिकार है। जिस पानी ने कितनों को मारा। जिस पानी से बचने के लिए मैंने अपनी नाक तक बंद कर ली थी। और वो पानी उसे रोज़ पिलाया जा रहा है, एक ऐसे आदमी के हाथों, जो उसे बाप कहता है।
"माँ," मैंने कहा। "अगर बलवंत मरे, तो जगदीश को क्या मिलेगा?"
"कुछ नहीं," सरस्वती ने कहा। "बलवंत मरे तो जगदीश के पास सिर्फ़ बदला बचेगा। ये बात उसने खुद मुझसे कही थी — उस रात, जब वो हवेली में आया था और गंगा दीदी को कुएँ में बंद करवा रहा था। उसने मुझसे कहा था — 'तेरा बेटा बड़ा होकर मेरे बेटे से लड़ेगा, और मेरा बेटा उसे मार देगा, और फिर मैं भवानी के खून का आख़िरी हिसाब बराबर कर दूँगा।'"
मैं चुप हो गया। पर मेरे हाथ नहीं रुके। मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं। चक्की के पत्थर पर रखी माँ की उँगलियाँ काँप रही थीं — और ये काँपना कमज़ोरी नहीं था। ये उस बीस साल की चुप्पी का काँपना था जो अब टूट रही थी।
तभी मीरा आई। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, और उसके पीछे वो शहर का लड़का खड़ा था जिसे मैंने एक बार अखाड़े में देखा था — लंबा, पतला, चश्मा, हमेशा कुछ लिखता रहता था।
"ये हरीश है," मीरा ने कहा। "शहर के अखाड़े का मुंशी। मैंने रात में ही उसे बुलाया था।"
हरीश ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उस पर घसीटती लिखाई में कुछ लिखा था।
"बलवंत का रिकॉर्ड," मीरा ने कहा। "अट्ठाईस मुकाबले। अट्ठाईस जीत।"
"तो?"
"तो ये देखो — हर मुकाबले के बाद।" उसने उँगली रखी। "तेरहवें मुकाबले के बाद, दो दिन बेहोश। उन्नीसवें के बाद, एक हफ़्ता बेहोश। चौबीसवें के बाद, उसकी आँखें तीन दिन तक ठीक से नहीं खुलीं। और अट्ठाईसवें के बाद…" वो रुकी। "अट्ठाईसवें मुकाबले के बाद वो दो हफ़्ते उठ नहीं पाया। उसके बाप ने इसे 'कसरत की थकान' लिखवा दिया।"
मेरे हाथों से काग़ज़ लेते वक़्त मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने उसे पढ़ा — नहीं पढ़ पाया, क्योंकि मेरी नज़र उन लाइनों पर अटक रही थी जहाँ 'बेहोश' लिखा था।
"ये जीत नहीं है," मीरा ने कहा। वो मेरे सामने बैठ गई। "ये ज़हर का खेल है। कोई आदमी अट्ठाईस लड़ाई जीतकर हर बार बेहोश नहीं गिरता। ये शरीर का हिसाब है — हर जीत के साथ कुछ खो रहा है। जिस दिन उसका हिसाब पूरा होगा, वो उठेगा नहीं।"
मैंने काग़ज़ चबूतरे पर रख दिया। मेरे सामने बैठे सब लोग चुप थे। कालू काका ने अपनी दाढ़ी खुजलाई और धीरे से बोले, "मिट्टी बोलती है, पर ये पानी… ये पानी चुपचाप मारता है।"
"कितना वक़्त बचा है?" मैंने पूछा।
मीरा ने अपना सिर हिलाया। "पता नहीं। महीना, दो महीने। उसकी आँखें देखो — अगर उनमें पीलापन आ गया है, तो वक़्त कम है।"
"और अगर हम उसे रोक दें?"
वो एक पल चुप रही। फिर बोली, "अगर हम उसे रोक दें, तो वो ज़िंदा रहेगा। पर अंदर से वो उतना ही टूटा रहेगा। ये बीमारी ठीक नहीं होती। रुकती है, बस।"
उसकी आवाज़ में कुछ था। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो अपने हाथों को गोद में रखे बैठी थी, और उसके हाथ भी काँप रहे थे — ठीक वैसे जैसे माँ के।
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