Spirit of a Fighter1224 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1224

7 min read November 5, 2026

मैंने चाबी जेब में रखी और कदम बढ़ाया, पर तभी अखाड़े के बाहर से ढोल की आवाज़ आई।

एक ठोक। फिर दूसरी। फिर लगातार।

रात के इस वक़्त गाँव में ढोल कौन बजा रहा था?

मैं रुक गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। कालू काका की लाठी हवा में ही रुक गई, जैसे उन्होंने भी वो आवाज़ पहचान ली हो।

"ये ढोल तो…" टिंकू ने धीरे से कहा, "ये तो शहर वाला ढोल है, भाई। गाँव में इस तरह नहीं बजता।"

और फिर दीवार के पीछे से मशालों की रोशनी उठी। एक, दो, दस, बीस — मैंने गिनना छोड़ दिया। अखाड़े के फाटक पर लोगों की भीड़ दिखी, हाथों में मशालें, और सबके आगे एक आदमी।

वो लंबा था। मुझसे भी लंबा। कंधे बैल जैसे, और चाल में वो अकड़ जो पैसे वाले लोगों की होती है। उसने पैर अखाड़े की मिट्टी पर रखा — जूते पहने हुए। और फिर जान-बूझकर, धीरे-धीरे, अपना जूता मिट्टी में घुमाया।

मेरे अंदर कुछ जल उठा।

मैं आगे बढ़ा, पर कालू काका ने मेरी बाँह पकड़ ली। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उनकी आवाज़ सख़्त।

"अभी मत उलझ, बेटा। ये ज़हर पीकर आया है। इसकी आँखों में नशा है। नशे वाले से बहस नहीं करते।"

"ये कौन है?" मैंने पूछा।

कालू काका ने होंठ भींचे। फिर बोले, "बलवंत। भैरव का शिष्य। शहर के बड़े अखाड़े का पहलवान। दो बार 'भारत केसरी' का मुकाबला लड़ चुका है।"

मीरा मेरे पास आई। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैंने इसका नाम सुना है। पिता कहते थे ये पहलवानी से ज़्यादा डर से जीतता है।"

तब तक बलवंत अखाड़े के बीच आ चुका था। उसने चारों तरफ़ देखा — मिट्टी, सींची हुई, शांत पड़ी। और उसके चेहरे पर वो हँसी आई जो मुझे बचपन से पसंद नहीं।

"यही है वो अखाड़ा?" उसने ज़ोर से कहा। उसकी आवाज़ अखाड़े की दीवारों से टकराकर लौटी। "जहाँ मेरे गुरु बीस साल राज करते थे? यही वो मिट्टी है जिसके लिए वो जिए?"

उसने झुककर मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और उसे हवा में उड़ा दिया।

गाँव वाले फाटक के पीछे खड़े थे। औरतें अपने बच्चों को पीछे खींच रही थीं। सुक्खी बुआ अपने पान के बीड़े के साथ जम गई, मुँह खुला हुआ।

मैंने अपनी बाँह कालू काका की पकड़ से छुड़ाई। पर मैं शांत था। मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया था।

"अखाड़े की मिट्टी से खेलना बंद कर," मैंने कहा। "जूते उतार।"

बलवंत मेरी तरफ़ मुड़ा। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, और उसकी हँसी और बड़ी हो गई।

"तू ही वीर सिंह है?" उसने कहा। "मैंने सुना था कोई बड़ा शेर है। ये तो हड्डियों का ढाँचा है। गुरुजी को इससे डर लगा?"

मैं उसके करीब गया। इतना करीब कि उसके पसीने की गंध मेरे नाक से टकराई। और उसी पल मेरे पेट में एक झटका लगा।

उसके पसीने में वो कड़वाहट थी। वही जो मैंने पानी की बोतलों में सूँघी थी। वही जो भैरव के बनाए ज़हर की थी। पर इसके साथ एक और बू थी — तेज़, गरम, जैसे कोई जले हुए तांबे पर पानी डाल रहा हो।

ये आदमी ज़हर पीकर आया था। और बहुत पीकर आया था।

मैंने धीरे से कहा, जितना सिर्फ़ वो सुन सके, "तेरे गुरु ने तुझे भी बेच दिया, बलवंत। तू भी उसी पानी पर जी रहा है। कितने महीने हुए? हाथ काँपते हैं सुबह उठकर?"

बलवंत की आँखों में कुछ बदला। एक पल के लिए। फिर उसने अपनी आवाज़ और ऊँची कर ली, जैसे अपने ही डर को दबा रहा हो।

"वीर सिंह!" वो चिल्लाया। "सुन सब के सब सुन लें! भैरव गुरु ने मुझे इस अखाड़े की मिट्टी से उठाया है, पाला है। और तूने उन्हें जेल में डाल दिया। मैं तुझे 'भारत केसरी' में चुनौती देता हूँ। अगर तू मर्द है तो आ। अगर नहीं, तो आज से अखाड़े का नाम बदल देना। रणवीर का अखाड़ा नहीं, मेरा अखाड़ा — बलवंत का अखाड़ा!"

पूरा गाँव सन्न रह गया।

मैंने उसकी आँखें देखीं। वो लाल थीं। नशे की लाली। और उसके होंठों पर वो हँसी थी जो हारने वाले की नहीं होती।

मैंने मुस्कुरा दिया। धीरे से।

"मैं आऊँगा," मैंने कहा। "और मिट्टी में खड़ा होकर लड़ूँगा। जैसे मेरे बुज़ुर्ग लड़ते थे। जैसे रणवीर सिंह लड़ते थे।"

बलवंत हँसा। ज़ोर से। "मिट्टी में खड़ा हो तो तेरी हड्डियाँ भी मिट्टी में मिल जाएँगी।"

इतना कहकर उसने हाथ उठाया। और उसके पीछे खड़े चालीस गुर्गों ने अपनी मशालें और ऊँची कर दीं। रोशनी अखाड़े की दीवारों पर नाचने लगी। गाँव की औरतें बच्चों को घर में खींच रही थीं। किसी का खटिया का पाया टूटा, किसी का दीया बुझ गया। एक बच्चा रो पड़ा और उसकी माँ ने उसका मुँह दबा दिया।

टिंकू मेरे कान के पास आया। "भाई, चालीस आदमी हैं। और हम?" उसने उँगलियों पर गिना — "तू, मैं, मीरा, कालू काका, करण… और वो भी आधा जला है।"

"पाँच," मैंने कहा।

"हाँ, पाँच। और चालीस। भाई, गणित मेरा कभी अच्छा नहीं था, पर इस बार वो साफ़ बोल रहा है।"

"तू मिठाई बना," मैंने उसका कंधा थपथपाया। "बाकी मैं देख लूँगा।"

टिंकू ने टोपी ठीक की। "खीर बनाऊँगा, भाई। पर इस बार दो बर्तन में। एक हमारे लिए, एक शोक के लिए।"

इतने में रणवीर सिंह की कुर्सी आगे बढ़ी। करण उसे धकेल रहा था। रणवीर सिंह ने मिट्टी पर एक हाथ रखा और अपने बेटे की तरफ़ देखा।

बलवंत ने उन्हें देखते ही अपनी आवाज़ नरम कर ली, पर उसमें ज़हर भरा था। "रणवीर चाचा। कैसे हो? गुरुजी तो कहते थे तुम्हारी साँस भी उनकी दया से चल रही है। लगता है वो दया अब बंद हो जाएगी।"

रणवीर सिंह की मुठ्ठी मिट्टी में धँस गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा। पर उनकी आँखों में जो उठा, वो मैंने पहली बार देखा — सिर्फ़ गुस्सा नहीं, एक अधूरा हिसाब।

"चाचा न कहना उसे," रणवीर सिंह ने धीरे से कहा। "जिस आदमी को मैंने अपने हाथ से मिट्टी में लिपटे देखा है, वो मुझे चाचा नहीं बोलता।"

बलवंत ने होंठ भींचे। फिर वो मुड़ा और अपने गुर्गों की तरफ़ बढ़ गया। जाते-जाते उसका पैर फिर मिट्टी पर पड़ा, और उसने जान-बूझकर एक लकीर बनाई।

मैंने अपने आप को रोका। मेरा दिल कह रहा था दौड़कर उसकी गर्दन पकड़ लूँ। पर कालू काका की बात मेरे कानों में गूँज रही थी — ज़हर पीकर आया है।

वो फाटक तक पहुँचा। और फिर रुक गया।

वो पलटा। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं। और फिर वो मेरी तरफ़ चल पड़ा — तेज़। इतना तेज़ कि मैं सँभल भी नहीं पाया। वो मेरे कान के पास झुका, और उसकी गरम साँस मेरी गर्दन से टकराई।

"तेरी माँ को भी मैंने देखा है," उसने फुसफुसाया। "हवेली के उस कमरे में। जहाँ से कोई नहीं लौटता। वो बूढ़ी औरत अब भी वहीं है। और मैंने उसे जाते वक़्त कुछ दिया है। पीली शीशी।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। मेरे हाथ से हवेली की चाबी फिसल गई और मिट्टी में गिर गई।

बलवंत पीछे हटा। और इस बार उसकी हँसी में कुछ और था — जीत की हँसी।

"मिलते हैं 'भारत केसरी' में, वीर सिंह," उसने कहा। "अगर तब तक तेरी माँ ज़िंदा हो।"

वो मुड़ा और चला गया। उसके गुर्गे मशालें लेकर उसके पीछे चले। ढोल की आवाज़ दूर होती गई, फिर बंद।

अखाड़े में सिर्फ़ मिट्टी बची — और उस पर उसके जूते की लकीर।

मैं झुका। चाबी उठाई। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चाबी मुट्ठी में भींच ली, इतनी ज़ोर से कि उसके कोने मेरी हथेली में चुभने लगे।

मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा और उँगलियाँ खोलीं। हथेली पर खून की एक पतली लकीर उभर आई थी।

"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो नरमी थी जो वो सिर्फ़ अकेले में दिखाती है। "वो झूठ बोल रहा है। डराने के लिए।"

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