Spirit of a Fighter – Chapter 1222
"मैं सिर्फ़ सच कहूँगा। भवानी ने मुझे पाला। मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया, पर भवानी ने मुझे उठाया, सिखाया, अपने हाथ से खिलाया। वही मेरा बाप है।"
मेरी आवाज़ टूट गई। मैंने मुँह फेर लिया, ताकि टिंकू मेरी आँखें न देख सके।
"और तू," मैंने मिट्टी से कहा, "तू चाहे जो भी हो, तेरे लिए मेरे मन में सिर्फ़ एक सवाल है। तूने मेरी माँ को कहाँ छोड़ा? और क्यों?"
हवा चली। राख उड़ी। और उसी वक़्त मेरी नज़र कब्र के किनारे पर पड़ी — मिट्टी के अंदर से किसी काग़ज़ का कोना बाहर निकला हुआ था, हवा से हिल रहा था।
मैंने उसे खींचा। मिट्टी हटाई। काग़ज़ निकाला। मुड़ा हुआ, गीला, पर लिखाई साफ़ थी।
लिखाई पहचानी। बिशन की। वही टेढ़ी-मेढ़ी, बड़ी-बड़ी।
मैंने पढ़ा। और पढ़ते ही मेरी साँस अंदर ही रह गई।
वीर, तेरी माँ ज़िंदा है। वो कैद में है, उस जगह जहाँ पानी नहीं पहुँचता।
॥
वो काग़ज़ मेरे हाथ में काँप रहा था, और मैं उसे पकड़े बैठा था ठंडी मिट्टी पर, जब सूरज भट्ठे की चिमनी के पीछे से निकलकर मेरी आँखों में आ गया। टिंकू मेरे पास बैठ गया। उसने काग़ज़ पढ़ा। दो बार पढ़ा। फिर काग़ज़ मेरे हाथ से लेकर मोड़कर अपनी जेब में रख दिया, जैसे कोई कीमती चीज़ हो जो हवा में उड़ न जाए।
"भाई," उसने कहा, "तेरे हाथ से खून बह रहा है।"
"पता है।"
"फिर भी तू यहीं बैठा है।"
"तो क्या करूँ? नाचूँ?"
वो चुप हो गया। फिर बोला, "मीरा मैडम को बुला। ये बात अकेले नहीं सुलझेगी।"
मैंने सिर उठाया। भट्ठे के पीछे वाली झाड़ियों में हवा चल रही थी। राख उड़कर उसकी धोती पर बैठ रही थी, जैसे किसी ने उस पर राख का चोला पहना दिया हो। मैंने जेब से कपड़ा निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ाया।
"तू अपनी धोती झाड़।"
"भाई, तू पहले अपना हाथ बाँध।"
उसने अपनी टोपी उतारी, उसमें से एक साफ़ रूमाल निकाला — वही जो उसकी माँ ने दुकान के लिए सिलकर दिया था, जिस पर छोटे-छोटे फूल काढ़े थे — और मेरी हथेली पर बाँधने लगा। रूमाल में हल्दी और घी की गंध थी। मेरी आँखें भर आईं, पर मैंने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
"मीरा को बुला," मैंने कहा। "और करण को भी।"
"करण कहाँ है?"
"पता नहीं। ढूँढ।"
टिंकू उठा और भट्ठे के सामने वाली तरफ़ चला गया। मैं वहीं बैठा रहा, कब्र के पास। मिट्टी ठंडी थी, और उसमें एक गंध थी जो मुझे चैन नहीं लेने दे रही थी। चंदन की, कपूर की, जले तेल की।
मैंने आँखें बंद करके गहरी साँस ली। अपनी नाक को धीरे से साफ़ किया, जैसे कालू काका ने सिखाया था — दो उँगली नाक के पास, साँस धीमी, और मन शांत।
और तभी मुझे वो मिली।
कब्र की मिट्टी के नीचे से, गहरे से, एक और गंध आ रही थी। मीठी नहीं। कड़वी। धुएँ वाली। जैसे कोई पुरानी रस्सी जल रही हो। मैंने हाथ मिट्टी पर रखा और उसे खुरचने लगा।
"भाई, तू क्या कर रहा है?" टिंकू की आवाज़ दूर से आई।
"आ रहा हूँ," मैंने कहा, पर हाथ रुका नहीं।
मिट्टी के नीचे से एक और चीज़ निकली। जली हुई रस्सी का टुकड़ा। और उससे बँधा हुआ एक छोटा-सा थैला। थैले में दो चीज़ें थीं — एक टूटा हुआ चश्मा, जिसके शीशे में दरार थी, और एक पुराना सिक्का।
चश्मा। चश्मा मैंने पहचाना। यही चश्मा हरनाम ठेकेदार पहनता था। जब वो हवेली में बैठकर हिसाब देखता था, तब उसकी नाक पर यही चश्मा टेढ़ा बैठा रहता था।
मेरा दिमाग़ चकराया। हरनाम का चश्मा बिशन की कब्र में क्यों?
मैंने थैला समेटा और उठकर भट्ठे के सामने आया। टिंकू वहाँ मीरा और करण के साथ खड़ा था। मीरा के हाथ में पानी की बोतल थी, और करण के कंधे पर पट्टी बँधी थी।
मैंने चश्मा सीधे हरनाम के हाथ में रख दिया।
"ये तेरा है?"
हरनाम ने देखा। उसका चेहरा पहले सफ़ेद हुआ, फिर लाल। उसने चश्मा हाथ में उलट-पलटकर देखा, और उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।
"ये… ये मेरा पुराना है। बीस साल पहले का। ये मेरे घर से कब गया, मुझे नहीं पता।"
"ये बिशन की कब्र में था," मैंने कहा। "जली रस्सी से बँधा।"
हरनाम ने एक कदम पीछे हटकर मुँह फेर लिया। उसके कंधे झूल रहे थे, जैसे कोई बोझ उठाए खड़ा हो।
"मैंने… मैंने उसे मारा नहीं था," वो बोला, आवाज़ फटी हुई। "मैं कसम खाता हूँ। मैं तो उस रात वहाँ था ही नहीं।"
"कौन-सी रात?" मीरा ने सीधे पूछा।
हरनाम ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "जिस रात भवानी मरे थे। उस रात मुझे भैरव ने भट्ठे पर बुलाया था। कहा था — काग़ज़ों पर दस्तख़त करने हैं। मैं आया, तो भट्ठा जल रहा था। और बिशन… बिशन जल रहा था अंदर।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ा। "और तूने बचाया नहीं?"
"मैंने बचाने की कोशिश की!" उसकी आवाज़ चीख में बदल गई। "पर भैरव ने मेरा हाथ पकड़ लिया। कहा — 'अगर तू इसे बचाने गया, तो अगली लाश तेरी बेटी की होगी।' मेरी बेटी, वीर। अंजली। वो तब आठ साल की थी।"
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी पकड़ मज़बूत थी, और उँगलियाँ ठंडी।
"तो तूने उसे जलने दिया?" मैंने पूछा। अपनी आवाज़ में गुस्सा था, पर वो गुस्सा किसी और पर नहीं, खुद पर भी था — कि मैंने हरनाम को इतने दिन शक के दायरे में रखा, और वो शक सही था, पर वजह ग़लत।
हरनाम घुटनों के बल बैठ गया। "मैंने उसे जलने नहीं दिया। मैं भागा, और भागते वक़्त बिशन की आवाज़ सुनी — 'हरनाम, काग़ज़… काग़ज़ संदूक में…' मैं वापस आया, पर तब तक छत गिर चुकी थी। मैंने उसे निकाला, तो वो आधा जल चुका था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — 'मेरा बेटा… वीर… उसे बचा।' और फिर उसने मेरे कान में एक नाम कहा।"
मेरी साँस रुक गई। "कौन-सा नाम?"
"गंगा," उसने कहा। "उसने कहा — 'गंगा को बता देना कि मैंने उसका काग़ज़ संदूक में रख दिया है। और वो जगह… जहाँ पानी नहीं पहुँचता… वही जगह है जहाँ उसका बेटा है।'"
मैंने अपना सिर पकड़ लिया। मेरे कानों में सनसनी चलने लगी। टिंकू मेरे पास आया और मुझे सहारा देकर बैठा दिया।
"भाई, तेरी नाक फिर खून बहने वाली है। बैठ जा।"
मैं बैठ गया, पर मेरा दिमाग़ एक ही जगह थी। "हरनाम," मैंने कहा, "ये काग़ज़ मुझे मिला है। बिशन ने खुद लिखा है — 'वीर, तेरी माँ ज़िंदा है। वो कैद में है, उस जगह जहाँ पानी नहीं पहुँचता।'"
हरनाम ने अपनी आँखें मलीं। "तो… तो वो मरा नहीं। बिशन ज़िंदा नहीं है, पर उसकी बात ज़िंदा है।"
"उसकी बात ज़िंदा है," मीरा ने धीरे से कहा, "क्योंकि वो मरने से पहले ये ज़मीन में दबा गया। कोई उसे ढूँढ न सके। और शायद उसने ये काग़ज़ इसलिए दबाया कि जो भी उसकी कब्र तक पहुँचे, वो सच पढ़े।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो हावी ज़िद थी जो मुझे पहले दिन से डराती और खींचती भी थी।
"मीरा," मैंने कहा, "मुझे एक जगह याद आ रही है। जहाँ पानी नहीं पहुँचता।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ी। "कहाँ?"
"हवेली के नीचे वाला सूखा कुआँ। जिसे भैरव ने पत्थर से ढकवा दिया था। जिसमें बीस साल से कोई नहीं गया। जहाँ बारिश का पानी भी नहीं पहुँचता।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चमक आई जो हमेशा किसी रहस्य की चाबी मिलने पर आती थी।
"तो फिर देर किस बात की?"
हम लौट पड़े। रास्ते में भट्ठे की राख जूतों में भर गई, और धूप तेज़ हो चली थी। पगडंडी पर टिंकू आगे चल रहा था, हरनाम बीच में, और करण सबसे पीछे। मैं और मीरा बराबर में।
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