Spirit of a Fighter1221 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1221

7 min read November 5, 2026

"कि जब तू छोटा था, तो कैसा था। क्या करता था। क्या खाता था। रात में रोता था या नहीं।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैंने सोचा, शायद मुझे भी किसी ने ऐसे याद किया हो। पर मुझे किसी ने याद नहीं किया। मेरा बाप मर गया। मेरी माँ… मेरी माँ ने मुझे भूला दिया।"

"तेरी माँ कौन है?" मैंने पूछा।

वो हँसा। एक छोटी, टूटी हँसी।

"यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ, भाई।" उसने अपनी टाँकों वाली गर्दन सहलाई। "भवानी ने मुझे पाला। पर जब मैं जला, तो वो मेरे पास नहीं आया। वो तेरे पास आया। तू उसका बेटा था। मैं सिर्फ़… मैं सिर्फ़ एक मज़दूर का बेटा था जिसे वो रख लिया था।"

मेरे अंदर कुछ हिला।

"भवानी ने तुझे रखा था?"

"हाँ। मेरे बाप कालू। वो भवानी का मज़दूर था। जब मैं छोटा था, मेरे बाप ने मुझे भवानी के पास छोड़ दिया। कहा, 'मेरा बेटा तेरा बेटा।' भवानी ने मुझे अखाड़े में रखा। मैंने वहीं सीखा। मैं वहीं रहा। पर जब भैरव ने मुझे जलाया, तो भवानी ने मेरे लिए एक भी शब्द नहीं कहा। उसने बस… उसने बस कहा, 'ग़लती से आग लगी।'"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"इसलिए मैंने सोचा," चंदन ने कहा, "जब भैरव ने मुझे फिर से ज़िंदा होने का मौका दिया, तो मैंने लिया। मैंने सोचा, वो मेरा बाप था जो मुझे छोड़ गया, तो मैं उसका बेटा क्यों बनूँ? मैं भैरव का आदमी बन गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर भैरव भी मुझे नहीं अपनाता। वो मुझे 'जला हुआ' कहता है। मज़ाक में। पर मज़ाक में भी सच निकलता है, ना?"

मैं उसके पास गया और दीवार के सहारे उसके बगल में बैठ गया।

"चंदन," मैंने कहा। "मैं तुझे मारने नहीं आया।"

"तो क्यों आया?"

"क्योंकि तेरे पास एक काग़ज़ है जिस पर मेरे बारे में सच लिखा है। और तूने मुझे बताया नहीं। तूने मुझे बस इतना बताया कि भवानी मेरा बाप नहीं था। पर ये नहीं बताया कि मेरा बाप कौन था।"

वो चुप रहा।

"मेरी माँ कौन है, चंदन? मेरी सगी माँ?"

उसने अपनी जेब से एक और काग़ज़ निकाला। बहुत पुराना। मुड़ा हुआ, जर्जर। उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"मैंने इसे तेरे बाप की किताब के साथ रखा था। भवानी ने खुद लिखा था। मैंने सोचा, तुझे तब दूँगा जब तू अपने आप पूछे।"

मैंने काग़ज़ खोला।

लिखाई वही थी। भवानी की। पर इस बार बहुत छोटी, बहुत साफ़, जैसे किसी ने बैठकर आराम से लिखा हो।

"वीर की माँ का नाम गंगा देवी है। वो हवेली से भागी थी जब वो गर्भवती थी। उसने वीर को मुझे सौंपा और कहा, 'इसे अपना बेटा बना ले। मेरा कोई नाम मत लेना।' मैंने पूछा क्यों। उसने कहा, 'क्योंकि जिस आदमी ने मेरे पति को मारा, वो इस बच्चे को भी मार देगा।' मैंने पूछा, कौन? वो नहीं बोली। बस इतना बोली — 'जिसके पास पानी नहीं पहुँचता।'"

मेरे हाथ काँप रहे थे।

"गंगा देवी," मैंने धीरे से दोहराया।

वो नाम मैंने पहले सुना था। कहाँ? कब?

फिर याद आया। माँ ने कहा था — गंगा देवी हवेली में थीं। वो भवानी की आख़िरी बात जानती थीं। वो रणवीर सिंह की बहन थीं। वो बलराज की भी कुछ लगती थीं।

"गंगा देवी," मैंने फिर कहा। "वो मेरी माँ है।"

"हाँ," चंदन ने कहा। "और वो जिस जगह है, वहाँ पानी नहीं पहुँचता। वही जगह जिसका नाम तेरे बाप ने लिखा है।"

मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा।

"वो कहाँ है, चंदन?"

वो उठा। उसने अपनी जली हुई गर्दन सहलाई और दीवार की तरफ़ देखा।

"मैं तुझे बता दूँगा," उसने कहा। "पर पहले एक बात का जवाब दे। वो बूढ़ा जो आज तेरे सामने खड़ा था — बिशन। वो कह रहा था कि वो तेरा बाप है। तू मान गया?"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ — जो मेरा बाप होगा, वो मुझे ये नहीं कहेगा कि 'मैं तेरा बाप हूँ।' वो मुझे ये कहेगा कि 'तेरा हाथ कैसा है?'"

चंदन कुछ देर मुझे देखता रहा। फिर उसकी आँखों में कुछ बदला। थोड़ी देर पहले जो हँसी थी, वो ग़ायब हो गई।

"तेरी माँ," उसने धीरे से कहा, "गंगा देवी। वो हवेली की उस कोठरी में है जिसमें बीस साल से कोई नहीं गया। जिसकी दीवारें ईंट की हैं और फ़र्श पत्थर का। वहाँ एक भी खिड़की नहीं है। एक भी नल नहीं। वो जगह अखाड़े के तहखाने के नीचे है। जिस कुएँ की तू बात करता है, उससे भी नीचे।"

मेरी साँस रुक गई।

"वहाँ तक कोई नहीं पहुँचा," चंदन ने कहा। "सिर्फ़ एक आदमी ने। और उसने उसे बंद कर दिया।"

"कौन?"

चंदन ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे कंधे पर रखा। उसका हाथ ठंडा था, जले हुए चमड़े जैसा खुरदुरा।

"जगदीश सिंह," उसने कहा। "वो बूढ़ा जो तेरे सामने खुद को भवानी का भाई बताता है। उसने गंगा देवी को वहाँ बंद किया, ताकि वो कभी बाहर न आए। क्योंकि गंगा देवी वो एक चीज़ जानती है जो जगदीश को डराती है।"

"क्या?"

"वो जानती है कि भवानी को ज़हर किसने दिया।"

मेरी मुट्ठी भींच गई।

"और वो सबूत," चंदन ने कहा, "आज भी उसी कोठरी में है। गंगा देवी के पास। उसने उसे अपने शरीर पर छुपा रखा है। बीस साल से।"

मैं पलटा और सीढ़ियों की तरफ़ चला।

"वीर।

"वीर।"

चंदन की आवाज़ पीछे से आई, पर मैं नहीं रुका। सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैरों के नीचे ईंटें चरमरा रही थीं, और उस चरमराहट में मुझे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दे रही थी — जो मैंने कभी सुनी नहीं थी, पर जिसे मैं बचपन से सुनता आया था सपनों में।

बाहर निकला तो सुबह की हवा चेहरे पर पड़ी। अखाड़े का मैदान खाली था। मिट्टी पर किसी के पैरों के निशान अभी ताज़े थे।

टिंकू दीवार के पास बैठा था, घुटनों में मुँह गड़ाए। मुझे देखते ही खड़ा हो गया।

"भाई, तुझे खून निकल रहा है हाथ से।"

मैंने देखा। हथेली पर चीरा था, कब से लगा पता नहीं। खून सूखकर काला पड़ रहा था।

"चल," मैंने कहा। "भट्ठे चलना है।"

"भट्ठा? अभी? भाई, सुबह के छह बज रहे हैं।"

"तो?"

वो मेरे पीछे चल पड़ा। कुछ कदम चला, फिर बोला, "भाई, मुझे तो लगता है आज कोई नई मुसीबत आएगी।"

मैं हँसा। हँसी फटी हुई निकली, जैसे सूखे कुएँ से बाल्टी उठाई हो।

"तू हर दिन यही बोलता है। और हर दिन मुसीबत आती भी है।"

"इसीलिए तो बोलता हूँ। मेरी बात सच होती है।"

रास्ते में भट्ठे की चिमनी दिखने लगी। धुआँ नहीं था। जिस भट्ठे से धुआँ न उठे, वो भट्ठा मुर्दा होता है। और यहाँ सिर्फ़ जली हुई मिट्टी की गंध थी, ठंडी राख की तह बैठी थी ज़मीन पर।

मैंने गहरी साँस ली। बिशन की गंध ढूँढी। वो कड़वी, पुरानी, तेज़ गंध — नहीं थी। बहुत दिनों से नहीं थी। जैसे कोई चीज़ हवा से ही मिटा दी गई हो।

पर एक और गंध थी। चंदन काका की। उस्ताद की। कपूर और जले हुए तेल की। वो भट्ठे के पीछे से आ रही थी।

मैं पीछे गया।

और वहाँ, आधी जली ईंटों के ढेर के साथ, एक ताज़ी कब्र थी। मिट्टी अभी धँसी नहीं थी। ऊपर एक पत्थर रखा था, जिस पर बिना तराशे, जल्दी में खुदा था — बिशन।

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने जेब में हाथ डाला, तो उँगलियाँ किसी और चीज़ से टकराईं। वो काग़ज़। भवानी का। जो अभी चंदन ने दिया था।

टिंकू कब्र के पास गया। झुका। और एक टूटी कटोरी उठाई, जिसमें सूखा हुआ काढ़ा चिपका था, हरा-भूरा।

"भाई," उसने धीरे से कहा। "ये तो… ये तो काढ़े का कटोरा है।"

मैंने कटोरा देखा। फिर कब्र देखी। फिर अपने हाथ देखे।

मैं घुटनों के बल बैठ गया। मिट्टी ठंडी थी। उस पर हथेली रखी।

"सुन," मैंने कहा। आवाज़ किसी और की लग रही थी। "अगर तू मेरा बाप है, तो भी मैं तुझे बाप नहीं कहूँगा।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, पर कुछ नहीं बोला।

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