Spirit of a Fighter – Chapter 1220
"पर वो कुआँ तो अब भरा हुआ है," उसने कहा। "उस्ताद ने कहा था कि उन्होंने उसे बंद कर दिया है।"
"उसने कहा था," मैंने दोहराया। "क्योंकि वो चाहता था कि हम वहाँ न जाएँ।"
मैंने राख पर से उठकर अपने कपड़े झाड़े।
"टिंकू।"
"हाँ भाई?"
"तू सीधे गाँव जा। माँ की चारपाई के नीचे वो लोहे की कुंजी है जो कल ज़र्द पोटली में मिली थी। उसे लेकर सीधे अखाड़े जा। कालू काका से मिल। उसे बता कि कुएँ की सीढ़ियाँ खोलनी हैं।"
"और तू?"
"मैं उस जगह जा रहा हूँ जहाँ से चंदन की गंध आ रही है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"वीर—"
"मीरा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अगर मैं तेरे साथ वहाँ पहुँचा, तो मेरा ध्यान तुझ पर रहेगा। और मुझे आज अपना पूरा ध्यान चाहिए। अपनी नाक पर।"
उसने मेरी आँखों में देखा। मुझे लगा वो बहस करेगी। पर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और अपना बैग खोला।
"ले," उसने एक छोटी हरी शीशी दी। "अदरक और तुलसी। जब सिर फटे और नाक से खून आए, इसे सूँघ लेना। ज़्यादा मत करना। तीन बार से ज़्यादा नहीं।"
मैंने शीशी जेब में रखी।
"और वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो नरमी आई जो अब मैं पहचानने लगा था। "जो भी वो तुझे दिखाए, जो भी वो कहे — याद रखना। तेरा बाप वो नहीं है जो तेरा खून बने। तेरा बाप वो है जिसने तेरे लिए अपना खून बहाया।"
मैंने सिर हिलाया। कुछ कहने का मन नहीं हुआ। कहता तो आवाज़ टूट जाती।
टिंकू मेरे गले लग गया। उसके हाथ काँप रहे थे और उसकी गर्दन पर पसीना था।
"भाई," उसने फुसफुसाया, "मैं मज़ाक में कहता हूँ कि कल से कसरत शुरू करूँगा। पर आज सच में कुछ करना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूँगा। समझा?"
मैं मुस्कुराया। "समझा। अब चल।"
वो गाँव की तरफ़ भागा। उसकी टोपी हवा में उड़ते-उड़ते बची।
मैंने मुड़कर उन झाड़ियों की तरफ़ देखा जहाँ से चंदन के पैरों के निशान गए थे। वो रास्ता अखाड़े की दीवार के पीछे से होकर गुज़रता था। जहाँ से कोई नहीं जाता। जहाँ से सिर्फ़ वही जाता है जो छिपना चाहता है।
मैं चला।
रास्ते में मैंने अपनी नाक बंद कर ली — होंठ सींचकर, धीरे-धीरे। हर बीस कदम पर मैं गंध बदलता हूँ। जली मिट्टी। फिर सूखी घास। फिर नीम की पत्तियाँ। फिर वो। फिर से वो। चंदन, कपूर, और उसके नीचे — गीली मिट्टी जो सीलन में बदल रही थी।
मुझे कुएँ की तरफ़ जाना था। पर मेरे पैर मुझे अखाड़े की उस दीवार के पीछे ले गए, जहाँ बचपन में मैंने एक बार गुड़िया के लिए फूल तोड़े थे। दीवार पर आज कुछ और था। एक चौकोर पत्थर, जो पहले नहीं था। उसके चारों तरफ़ ताज़ी मिट्टी थी।
पत्थर हटाया तो नीचे सीढ़ियाँ थीं।
मेरी साँस रुक गई। ये वो सीढ़ियाँ नहीं थीं जो तहखाने की ओर जाती थीं। ये नई खोदी गई थीं, अंदर से, बाहर की तरफ़।
मैंने एक पैर रखा। दूसरा। नीचे अंधेरा था, पर हवा गरम थी और उसमें वो गंध थी — मोम, जली हुई रुई, और कुछ जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा था। दूध जैसी मीठी, पर बासी।
तीन सीढ़ियाँ और नीचे उतरा तो मेरे पैरों के नीचे से आवाज़ आई — चटक। मैंने झुककर देखा। काँच के टुकड़े थे। कई सारे। एक ही रंग के — पीला।
पीली शीशी। मेरे हाथ में। पर यहाँ?
मैंने झुककर एक बड़ा टुकड़ा उठाया। उस पर उँगली की छाप थी। मैंने उसे सूँघा।
मेरा दिमाग़ ठंडा हो गया।
वो गंध मेरी माँ की थी।
सरस्वती की।
उनके हाथों की, उनके हल्दी के टीके की, उनके चक्की वाले आटे की।
मैंने टुकड़ा ज़मीन पर रखा और तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरने लगा। नीचे एक छोटी सी कोठरी थी। दीवार पर लालटेन जल रही थी — धीमी, पीली। और उसकी रोशनी में, कोने में, एक चारपाई थी।
चारपाई पर कोई था।
मैं दौड़ा। मेरे घुटने फ़र्श पर टकराए। मैंने उसका चेहरा उठाया।
सरस्वती।
उनकी आँखें बंद थीं। होंठ सूखे थे, फटे हुए। माथे पर हल्दी का टीका अधूरा था, बालों की लटें खुली थीं। उनकी छाती धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।
ज़िंदा थीं।
"माँ!" मेरी आवाज़ फट गई। "माँ!"
उन्होंने आँखें खोलने की कोशिश की। बहुत मुश्किल से, आधी खुलीं, फिर बंद हो गईं।
"बेटा…" उनका होंठ हिला, आवाज़ नहीं निकली।
मैंने अपनी जेब से मीरा की हरी शीशी निकाली और उनके नाक के पास रखी। वो साँस खींचने लगीं। एक। दो। तीन।
फिर उनकी आँखें खुलीं। साफ़। मुझे देखकर उनमें पानी आ गया।
"तू आ गया," उन्होंने कहा। "मना किया था ना… मना किया था मैंने।"
मेरी आँखें भर आईं। "तू मर गई थी, माँ। मुझे लगा—"
"मैं मरी नहीं," उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कमज़ोर थी। "वो मुझे… वो मुझे ज़िंदा रखना चाहता है। कहता है, 'जब तक ये ज़िंदा है, वीर अपनी माँ के लिए वापस आएगा। और मैं उसे यहीं पकड़ लूँगा।'"
मेरा गला सूख गया।
"कौन, माँ? कौन कहता है?"
"वो जला हुआ," उन्होंने फुसफुसाया। "वो जो खुद को मेरा बेटा बताता है।"
मेरे अंदर कुछ टूटा।
"चंदन," मैंने कहा।
सरस्वती ने हाँ में आँखें बंद कीं। फिर कुछ याद आया और उनकी पकड़ मज़बूत हुई।
"वो पागल हो गया है, वीर। वो सोचता है… वो सोचता है तू उसका भाई है। कि भवानी ने उसे छोड़ दिया था और तुझे पाला। उसने मुझसे पूछा कि तू कौन है। मैंने कहा, तू मेरा बेटा है। तो वो हँसा। और बोला, 'तो फिर मेरी माँ कौन है?'"
मेरी आँखों के सामने चंदन का जला चेहरा आया। टाँके। एक छोटी आँख। उस रात कोठे में जब उसने कहा था — "मैंने तुझे ढूँढा, भाई। सुक्खी बुआ के पास। तू मिला। पर मैं नहीं मिला।"
"माँ," मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा, "गुड़िया कहाँ है?"
सरस्वती की आँखों में डर आया।
"वो… वो उसे ऊपर ले गया। कहा, 'बहन को ऊपर रखूँगा, ताकि भाई जब आए तो पहले बहन से मिले।' वीर, वो गुड़िया को—"
मैं खड़ा हो गया।
तभी ऊपर से आवाज़ आई। गुड़िया की। गा रही थी — वही गाना जो कल कोठे में गा रही थी। पर अब उसकी आवाज़ में डर नहीं था। जैसे कोई उसे डरा नहीं रहा, बहला रहा हो।
और उसके नीचे, धीमी, भारी आवाज़ — चंदन की।
"गा, बहन। गा। तेरा भाई आ रहा है। मैं उसे देखना चाहता हूँ। मैं देखना चाहता हूँ कि जब वो अपनी माँ को इस हाल में देखेगा, तो वो मुझे क्या कहेगा।"
मैंने सरस्वती की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा।
"जा," उन्होंने कहा। "मैं ठीक हूँ। उसने मुझे कुछ नहीं किया। वो बस… वो बस बातें करता है। बहुत बातें।" उन्होंने आँखें बंद कीं। "वो बहुत अकेला है, वीर। गलत तरीक़े से, पर वो बहुत अकेला है।"
मैं सीढ़ियाँ चढ़ा।
ऊपर आकर मैंने देखा — चंदन दीवार के सहारे खड़ा था और गुड़िया उसके सामने बैठी थी, उसकी स्कूल की कॉपी गोद में। वो गा रही थी, पर उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं। उसने मुझे देखा और उसका गाना रुक गया।
"भैया," वो फुसफुसाई।
चंदन पलटा। उसके जले चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान आई।
"आ गया तू," उसने कहा। "मैंने कहा था ना, तू आएगा।"
"गुड़िया," मैंने कहा। "जा। माँ के पास जा। नीचे।"
चंदन ने रास्ता नहीं रोका। गुड़िया दौड़कर सीढ़ियों की तरफ़ गई और मेरे हाथ को एक पल छूकर नीचे उतर गई।
चंदन ने अपना सिर दीवार से टिकाया।
"तू मुझसे नाराज़ है," उसने कहा।
"तूने मेरी माँ को—"
"मैंने उन्हें कुछ नहीं किया।" उसकी आवाज़ में वो झुंझलाहट आई जो बच्चों में होती है। "मैंने उन्हें खाना दिया। पानी दिया। मैंने उन्हें कंबल दिया। मैंने बस… मैंने बस उनसे पूछा।"
"क्या पूछा?"
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