Spirit of a Fighter – Chapter 1219
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो काग़ज़ अभी भी हाथ में लिए खड़ी थी, जिस पर भवानी ने लिखा था — बिशन से मत मिलना, वो मर चुका है।
"भवानी ने ये क्यों लिखा?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था, सिर्फ़ सवाल।
बिशन ने एक लंबी साँस छोड़ी। "क्योंकि जगदीश ने उसे यकीन दिला दिया था कि मैं मर गया। भवानी ने मुझे आग में जाते देखा था। उसने मुझे ढूँढा भी, महीनों। पर जगदीश ने हर बार उसे गलत पते पर भेजा। आख़िर में उसने मान लिया। और जब आदमी किसी की मौत मान लेता है, तो वो उसके नाम पर एक लाइन लिख देता है — ताकि खुद को तसल्ली रहे कि भूल नहीं रहा, बस याद कर रहा है।"
टिंकू ने मेरे कंधे के पीछे से सिर निकाला। "भाई," उसने फुसफुसाया, "मुझे तो लगता है आज कोई नई मुसीबत आएगी।"
मैं हँस पड़ा। इस वक़्त हँसना अजीब था, पर हँसी अपने आप निकल गई।
"तू हर दिन यही बोलता है," मैंने कहा। "और हर दिन मुसीबत आती भी है। चल।"
"कहाँ?"
"भट्ठे पर। मुझे देखना है।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया। "भाई, अभी-अभी तूने सुना — कोई मरे हुए आदमी की गंध—"
"इसीलिए तो," मैंने कहा। "जो मेरी नाक पकड़ रही है, उसका मुँह मैं देखना चाहता हूँ।"
रास्ते में टिंकू मेरे पीछे-पीछे चलता रहा, एक हाथ अपनी टोपी पर, दूसरा मेरी कमीज़ की किनारी पर। जब भी कोई झाड़ी हिलती, वो मेरी पीठ में सिर मार देता।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू मेरी कमीज़ छोड़ दे। वरना मेरी पीठ पर तेरे नाखूनों का नक्शा बन जाएगा।"
"भाई, मैं तो बस सँभाल रहा हूँ। कहीं तू अचानक रुक गया तो मैं गिर न जाऊँ।"
"मैं अचानक क्यों रुकूँगा?"
"पता नहीं। पर सोचने से क्या फ़र्क़ पड़ता है।"
हम टीले के पीछे से निकले और भट्ठे की सड़ी हुई गंध मेरे चेहरे पर आ पड़ी। जली हुई मिट्टी। ठंडी राख। और उसके नीचे, बहुत गहरे, वो चंदन। वो कपूर।
मैंने आँखें बंद करके गहरी साँस ली।
बिशन की गंध नहीं थी। एक भी नहीं। जो आदमी अभी मेरे सामने खड़ा था, उसकी गंध कहीं नहीं थी। न पसीने में, न कपड़े में, न साँस में।
मैंने पलटकर देखा। बिशन हमारे पीछे-पीछे आ रहा था, हाँफता हुआ, हाथ में लाठी। उसकी कमीज़ पर मिट्टी लगी थी।
पर मेरी नाक कह रही थी कि वहाँ कोई नहीं है।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा और होंठ सिकोड़े। वो मेरी आँखें पढ़ गई। उसने बहुत हल्का सिर हिलाया — मतलब, देखते रहो।
भट्ठे के पीछे वो खुली जगह थी जहाँ कल रात बिशन ने मुझे किताब दी थी। वहाँ सब कुछ बदला हुआ था। ज़मीन पर काला धब्बा था, गोल, जैसे किसी ने आग जलाकर बुझा दी हो। उसके किनारे-किनारे राख थी, और राख में किसी के घुटने के निशान।
और उस धब्बे के पार, दो हाथ दूर, एक कब्र थी।
मेरे पैर वहीं रुक गए।
कब्र छोटी थी, बच्चों जैसी नहीं, पर जल्दी में बनाई हुई। मिट्टी अभी भी गीली थी। ऊपर लकड़ी का एक टुकड़ा गाड़ा था जिस पर चाकू से नाम खुदा था — बिशन।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया था। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर बिशन की तरफ़, फिर कब्र की तरफ़।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "तो ये जो पीछे चल रहा है—"
"हाँ," मैंने कहा। "वो भी नहीं है।"
मैं उस कब्र के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। मिट्टी गीली थी, ठंडी। मैंने हाथ बढ़ाया और उसे छुआ।
तभी कब्र के किनारे से, मिट्टी के नीचे से, किसी चीज़ का कोना दिखा।
टिंकू ने काँपते हाथों से एक टूटी कटोरी उठाई जो कब्र के पास पड़ी थी। उसमें सूखा हुआ काढ़ा था, काला, जमा हुआ। उसने सूँघा और मुँह बनाया।
"भाई, इसमें तो कड़वाहट है। बहुत ज़्यादा।"
मीरा ने कटोरी उसके हाथ से ली, उँगली से खुरचा, ज़ुबान पर लगाया और थूक दिया।
"सोंठ, काली मिर्च, और कुछ," उसने कहा। "पर ये कोई आम काढ़ा नहीं है। इसमें कोई ऐसी चीज़ है जो इसे ज़हर के साथ पिलाया जाता है। ज़हर का तोड़ देने के लिए नहीं — ज़हर को देर तक शरीर में टिकाए रखने के लिए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मतलब जिसे ये पिलाया जाता है, वो मरता नहीं," मीरा ने धीरे से कहा, "पर ज़िंदा भी नहीं रहता।"
मैंने फिर से कब्र की मिट्टी में हाथ डाला और वो कोना खींचा। काग़ज़ निकला, मुड़ा हुआ, गीला, पर ज़्यादा नहीं — मिट्टी ने उसे ज़्यादा नहीं खाया था। मैंने उसे खोला।
लिखाई काँपती थी। पर मैंने उसे पहचाना — यही लिखाई कल रात उस पोटली में थी। बिशन की।
पढ़ा — "वीर, तेरी माँ ज़िंदा है। वो कैद में है, उस जगह जहाँ पानी नहीं पहुँचता।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा ताकि वो हवा में न उड़े।
"मेरी माँ?" मैंने कहा। "मेरी माँ तो—"
मैं रुक गया। क्योंकि मेरे सामने एक और माँ थी जिसके बारे में मैं अभी जाना था। सरस्वती। जिसने मुझे पाला। जो मरे हुए आदमी के भेष में मेरे सामने खड़ी थी।
ना। मैंने सिर हिलाया। मैं अभी सरस्वती की बात नहीं कर रहा था। मेरी सगी माँ।
"बिशन," मैंने पलटकर कहा। पर वहाँ कोई नहीं था।
जहाँ वो खड़ा था, वहाँ सिर्फ़ राख थी। और उस राख पर एक जोड़ी पैरों के निशान, जो वहीं से शुरू होकर झाड़ियों की तरफ़ जाते थे।
टिंकू चीखता हुआ पीछे हटा। "भाई! भाई, वो गया! वो—"
"वो कभी था ही नहीं," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ शांत थी। ये मुझे भी अजीब लगा।
"मतलब?" मीरा ने पूछा।
"मैंने उसकी गंध नहीं पकड़ी। एक बार भी नहीं।" मैंने काग़ज़ को सँभालकर जेब में रखा। "मुझे हवा में चंदन और कपूर मिला। वो गंध किसी मरे हुए आदमी की नहीं थी — वो गंध उस आदमी की थी जो मेरे सामने खड़ा था। उसने खुद पर इत्र लगाया था।"
"उस्ताद," मीरा ने कहा।
"चंदन।" मैंने मुट्ठी भींची। "कालू काका का बेटा। जो खुद को जला हुआ बताता है। जो कल रात कोठे में मिला था।"
टिंकू ने अपना सिर पीटा। "मतलब वो बूढ़ा जो अभी हमारे साथ चल रहा था—"
"वो चंदन था। अपना चेहरा बदलकर। आवाज़ बदलकर। मेरे सामने खड़ा होकर मेरा बाप बन रहा था।"
मैं राख पर बैठ गया।
"पर क्यों?" टिंकू ने कहा। "क्यों कोई आदमी अपने आप को मेरा बाप बनाएगा?"
"क्योंकि वो जानता है," मीरा ने कहा, "कि वीर की सबसे बड़ी कमज़ोरी अभी खुल गई है। वीर को अब पता है कि भवानी उसका बाप नहीं था। उसे अपना असली बाप ढूँढना है। और जो आदमी उसके सामने आकर कहे, 'मैं तेरा बाप हूँ' — वीर उसकी बात सुनेगा।"
मैंने राख को मुट्ठी में भरा। गरम थी, अंदर से। जैसे कोई आग अभी बुझी हो।
"और उसने मुझे क्यों बताया कि मेरी माँ ज़िंदा है?" मैंने पूछा।
मीरा चुप रही।
"क्योंकि," मैंने खुद ही जवाब दिया, "वो मुझे कहीं भेजना चाहता है। उस जगह, जहाँ पानी नहीं पहुँचता। किसी ऐसी जगह, जहाँ वो मेरा इंतज़ार कर रहा होगा।"
टिंकू ने घुटने टेक दिए। "भाई, अब तो मैं सच में डर गया।"
मैं उठा। मेरे घुटनों पर मिट्टी लगी थी, हाथों पर राख। मैंने काग़ज़ फिर निकाला और उस आख़िरी लाइन को एक बार और पढ़ा।
"उस जगह जहाँ पानी नहीं पहुँचता।"
मेरे दिमाग़ में कुछ चलने लगा। मैंने आँखें बंद कीं और उन जगहों को याद किया जहाँ मैं गया था। अखाड़ा। तहखाना। हवेली। सुरंग। कोठा। कुआँ —
कुआँ।
कुएँ में पानी था। नीचे, बहुत नीचे। पर कुएँ के ऊपर तक पानी नहीं पहुँचता था। कुएँ की सीढ़ियाँ सूखी थीं।
"मीरा," मैंने कहा। "कुआँ। वो कुआँ जिसमें भैरव शीशियाँ डुबोता था। कोठे के पीछे। जिसके नीचे सुरंग है।"
उसकी आँखें फैल गईं।
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