Spirit of a Fighter – Chapter 1217
मीरा ने उसे पढ़ा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"बिशन से मत मिलना। वो मर चुका है।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"क्या?"
मीरा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये लाइन भवानी की लिखाई में नहीं है। ये किसी और ने बाद में जोड़ी है।"
टिंकू ने गर्दन आगे की। "मतलब कोई इस काग़ज़ को भवानी के बाद पढ़ चुका है। और उसने ये लाइन जोड़ी है।"
मेरे पेट में ठंडक फैल गई।
"बिशन मर चुका है," मैंने दोहराया। "पर मैं उससे दो दिन पहले भट्ठे पर मिला था। वो ज़िंदा था।"
वैद्य का मुँह खुला रह गया। "नहीं। नहीं, ये नहीं हो सकता। भवानी ने मुझे बताया था कि बिशन…"
वो रुका।
"बिशन क्या?" मैंने पूछा।
"भवानी ने कहा था कि बिशन भट्ठे की आग में मर गया। बीस साल पहले।"
मेरा दिमाग़ काम करने लगा। मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"अगर बिशन बीस साल पहले मर गया," मैंने कहा, "तो भट्ठे पर मुझसे कौन मिला था?"
मीरा की आँखें फैल गईं। "वीर… जिस आदमी ने खुद को बिशन बताया, वो…"
"वो बिशन नहीं था," मैंने कहा। "मैंने उसकी गंध पहचानी थी — भट्ठे की जली मिट्टी, धुआँ, पुराना पसीना। पर मैंने उस चेहरे को नहीं पहचाना। मैंने सिर्फ़ उसकी बातों पर भरोसा किया।"
मैंने अपना सिर पकड़ लिया। सिर में दर्द उठ रहा था, वो दर्द जो तब आता था जब मैं अपनी नाक पर ज़्यादा ज़ोर डालता था।
"तो वो कौन था?" टिंकू ने पूछा। "जिसने तुझे किताब दी, ख़त दिया, और कहा कि वो तेरे बाप का दूधभाई है?"
कालू काका ने पीछे से आवाज़ दी। वो अब तक चुप खड़े थे, दरवाज़े के बाहर, लाठी पर झुके हुए।
"वो बिशन ही था," उन्होंने कहा। "पर बिशन ज़िंदा नहीं है।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"काका," मैंने कहा, "तू क्या कह रहा है?"
उन्होंने धीरे से लाठी टेकते हुए अंदर कदम रखा। उनके चेहरे पर वो थकान थी जो बीस साल की चुप्पी से आती है।
"बिशन," उन्होंने कहा, "भट्ठे की आग में मरा था। बीस साल पहले। उसी रात जिस रात भवानी मरा। मैंने उसकी लाश अपनी आँखों से देखी थी।"
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
"तो भट्ठे पर मुझसे कौन मिला?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, जैसे उन्होंने बहुत सोचने के बाद कोई फ़ैसला किया हो।
"मुझे नहीं पता, बेटा," उन्होंने कहा। "पर एक बात पता है। जो भी था, वो बिशन की तरह बोलता था, बिशन की तरह चलता था, बिशन की तरह गंध रखता था। और अगर कोई बीस साल तक किसी मरे हुए आदमी की तरह जी सके, तो उसके पास एक ही वजह हो सकती है।"
"क्या?"
"बदला।" उन्होंने कहा। "या फिर वो बिशन का हमशक्ल था। और भवानी की ज़िंदगी में एक हमशक्ल था। उसका भाई। जगदीश सिंह।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि चिराग की लौ की आवाज़ सुनाई दे रही थी — हल्की-सी फुसफुस, जैसे कोई बोल रहा हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"जगदीश सिंह," मैंने कहा। "वही जो अखाड़े में आया था। जो खुद को भवानी का भाई कहता है। जो कहता है कि भैरव ने उसे कुएँ में बंद रखा था।"
मीरा ने काग़ज़ अपने बैग में रखा। उसकी आवाज़ ठंडी और साफ़ थी।
"वीर, एक बात सोच। अगर भवानी ने ये काग़ज़ लिखा, और उस पर ये लाइन किसी और ने बाद में जोड़ी, तो उस किसी और के पास ये काग़ज़ पहले आया होगा। मतलब किसी ने इसे वैद्य के संदूक से पहले निकाला, पढ़ा, लाइन जोड़ी, और फिर वापस रख दिया।"
"और वो कौन हो सकता है?" टिंकू ने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो मुझे डरा रही थी।
"वही," उसने कहा, "जिसने अभी-अभी तुझे आवाज़ दी। बलराज सिंह।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। झोपड़ी के अंधेरे कोनों में, खुली अलमारी के पीछे, बंद दरवाज़े के बाहर।
"तो बलराज ने ये लिखा?" मैंने पूछा।
"या फिर बलराज किसी और का नाम है," मीरा ने कहा। "जगदीश सिंह का। या फिर भैरव का। या फिर किसी चौथे का जिसे हम अभी नहीं जानते।"
वैद्य ने अचानक सिर उठाया, जैसे उसे कुछ याद आया हो।
"एक बात," उसने कहा। "जब वो सुबह आया, तो उसने संदूक खोलते वक़्त एक बात कही थी। मैंने उसे याद रखा है, क्योंकि वो अजीब थी।"
"क्या कही?"
"उसने कहा — 'गोविंदा, तूने ये संदूक बीस साल संभाला। अब तेरा काम खत्म। मालिक आ गया है।'"
मेरी साँस रुक गई।
"मालिक?"
"हाँ।" वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा। "उसने खुद को मालिक नहीं कहा। उसने कहा कि मालिक आ गया है। मतलब जो आया था, वो मालिक नहीं था। वो किसी और के लिए संदूक खोल रहा था।"
टिंकू ने अपनी टोपी पहन ली, जैसे उसे ठंड लग रही हो।
"भाई," उसने कहा, "मैं एक बात कहूँ? अब तक हमने जितने नाम सुने, सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। शेर सिंह, भवानी सिंह, जगदीश सिंह, भैरव, बलराज। ये सब एक ही खून के हैं। और सबका दुश्मन एक ही है — मिट्टी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि हर कोई मिट्टी पर हक़ जमाना चाहता है। भवानी ने मिट्टी से मोहब्बत की, और मर गया। भैरव ने मिट्टी में ज़हर घोला, और जेल में है। जगदीश मिट्टी के नीचे छिपा था, और अब बाहर है। और बलराज…" वो रुका। "बलराज को मिट्टी चाहिए। पर वो सामने नहीं आता। वो आवाज़ बनकर आता है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे सामने खड़ी थी, काग़ज़ हाथ में, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे हिम्मत देती थी।
"एक काम कर," मैंने कहा। "जगदीश सिंह से मिलते हैं।"
कालू काका का चेहरा पीला पड़ गया। "बेटा, वो…"
"काका, वो खुद कहता है कि वो भवानी का भाई है। अगर वो सच बोल रहा है, तो उसे ये सब पता होगा। और अगर वो झूठ बोल रहा है, तो हमें उसका झूठ पकड़ना होगा।"
मीरा ने सिर हिलाया। "सही कह रहा है। पर एक शर्त। हम अकेले नहीं जाएँगे।"
"मैं साथ चलूँगा," करण ने कहा। उसकी आवाज़ में वो तेवर था जो जेल में मिलने के बाद आया था।
"और मैं?" टिंकू ने कहा। "मैं तो हर हाल में साथ हूँ। पर बता दूँ, मेरी मिठाई की दुकान आज बंद है। इसका मतलब है आज मैं हीरो हूँ।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन।
"ठीक है, हीरो," मैंने कहा। "चल।"
हम झोपड़ी से बाहर निकले। आसमान पर बादल छा गए थे, और हवा में पानी की गंध आ रही थी। मंदिर की घंटी दूर कहीं बज रही थी, धीमी, जैसे किसी ने हाथ से घंटी को छुआ हो और फिर छोड़ दिया हो।
मैंने वैद्य की तरफ़ पलटकर देखा।
"काका, तू यहाँ अकेला मत रहना। कालू काका, तू इसे अपने साथ ले जा।"
कालू काका ने सिर हिलाया। "पर बेटा, जगदीश सिंह कहाँ मिलेगा?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"वो खुद आएगा," मीरा ने कहा। "वो हमारा इंतज़ार कर रहा है। और वो जानता है कि हम उसके पास आएँगे।"
मैंने हवा सूँघी। पानी की गंध, मिट्टी की गंध, और उसके नीचे, बहुत हल्की, वो कुछ और — जो मैंने पहले भी महसूस किया था।
चंदन। और कपूर।
वही गंध जो मेरे आँगन में थी।
"वो पहले से जानता है," मैंने कहा। "और वो हमें बुला रहा है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी मुट्ठी गर्म थी।
"तो चल," उसने कहा। "पर वीर, एक बात। अब तू जो भी सुने, जो भी देखे — याद रखना, तेरे हाथ तेरे हैं। किसी बाप के नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे। उसके माथे पर पसीने की एक बूँद थी।
"मैं याद रखूँगा," मैंने कहा।
हम गाँव की तरफ़ चल पड़े। रास्ते में एक भी आदमी नहीं मिला। दुकानें बंद थीं, चबूतरा खाली था, और नीम के पेड़ के नीचे बैठी सुक्खी बुआ भी गायब थी।
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