Spirit of a Fighter1215 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1215

7 min read November 5, 2026

टिंकू आगे आया। उसने अपनी टोपी ठीक की। "भाई, मैं तो कल से कसरत शुरू करने वाला था। पर लगता है आज ही करनी पड़ेगी।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन में। हँसी छोटी थी, आधी फटी हुई। पर थी तो।

करण ने अपनी लाठी उठाई। "मैं भी चलूँगा।"

"करण—"

"मत रोक, वीर।" उसकी आँखें सख़्त थीं। "उस आदमी ने मेरे बाप को भी इस्तेमाल किया। मेरे हाथ पर भी उसका ज़हर लगा है। मुझे साफ़ करना है।"

मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनके चेहरे पर कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर नहीं। हिम्मत।

"जा, वीर," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख। बलराज बातों का जादूगर है। वो सच को इतना घुमा-फिराकर बोलेगा कि तू अपनी ही माँ पर शक करने लगेगा। इसलिए तेरे कान खुले रहें, पर तेरा दिल बंद रहे।"

"सर," मैंने कहा, "आपकी दवा अब बंद। कालू काका आज से कुछ नहीं देंगे।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा। और फिर वो मुस्कुराए। "मैं बीस साल का भूखा हूँ, वीर। आज पहली बार मुझे भूख लगी है। ज़िंदा होने की भूख।"

मेरा गला भर आया।

मैंने पलटकर कालू काका की तरफ़ देखा। वो अभी भी ज़मीन पर बैठे थे।

"काका," मैंने कहा। "उठो। माफ़ी माँगने का वक़्त नहीं है। अब कुछ करने का वक़्त है।"

उन्होंने सिर उठाया। आँखों में पानी था, पर चमक भी।

"बोल, बेटा।"

"गोविंदा वैद्य आज कहाँ मिलेगा?"

उन्होंने सोचा। "वो रोज़ सुबह मंदिर के पीछे अपनी झोपड़ी में होता है। सूरज निकलने से पहले। उसके पास एक पुराना संदूक है जिसमें वो दवाइयाँ रखता है। और…" वो रुके।

"और क्या?"

"और उस संदूक की चाबी कभी उसके पास नहीं होती। वो हमेशा भैरव के पास होती थी। और अब…" उनकी आवाज़ रुक गई। "अब शायद बलराज के पास है।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। उसमें वो जंग लगी लोहे की चाबी थी जो कल मुझे जलती कोठी में मिली थी। जिसे मैंने उस वक़्त नहीं पहचाना था।

मैंने उसे निकाला और कालू काका की तरफ़ बढ़ाया।

"ये चाबी?" मैंने पूछा।

उन्होंने देखा। उनकी आँखें फैल गईं।

"ये तो…" उन्होंने धीरे से छुआ। "ये तो वैद्य के संदूक की चाबी है, बेटा।"

मैंने चाबी मुट्ठी में कसी। वो ठंडी थी। और भारी।

"तो चलो," मैंने कहा। "पहले वैद्य, फिर बलराज।"

मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।

और हम बाहर निकले।

आँगन में धूप अब ढल रही थी। नीम के पेड़ की परछाईं लंबी हो गई थी। और हवा में कुछ था — न कपूर, न बादाम का तेल। कुछ और। कुछ पुराना।

मैंने हवा सूँघी।

और मेरा दिल एक झटके में रुक गया।

क्योंकि उस हवा में एक आवाज़ थी — बहुत हल्की, जैसे किसी पुराने टेप रिकॉर्डर से आती हो। किसी की साँस। किसी की खाँसी। और फिर एक फुसफुसाहट, जो किसी गहरे कुएँ से आ रही हो।

मैंने चारों तरफ़ देखा।

कोई नहीं था।

पर मेरी नाक ने मुझसे कहा — वो आवाज़ अभी-अभी आई थी। और वो कहीं पास से आई थी।

बहुत पास से।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"क्या हुआ?" उसने पूछा।

मैंने अपनी पोटली कसकर पकड़ी।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस… लगता है हमें जल्दी चलना चाहिए।"

पर मेरे पेट में एक गाँठ बन गई थी। क्योंकि उस फुसफुसाहट में एक नाम था।

और वो नाम मेरे बाप का नहीं था।

वो नाम मेरा था।

"वीर सिंह," उस आवाज़ ने कहा था। "तू अब भी वहीं खड़ा है। और मैं तुझे देख रहा हूँ।"

मैंने कदम तेज़ किए।

क्योंकि अब मुझे पता था — बलराज सिंह सिर्फ़ फोन पर नहीं था। वो बाहर था। और वो मेरे आँगन तक आ चुका था।

॥

वो फुसफुसाहट मेरे कानों में रह गई, जैसे कोई चींटी खून में चल रही हो। मैंने कदम बढ़ाए, पर अंदर कुछ रुक गया था। नीम के पेड़ की परछाईं जैसे मेरे पीछे-पीछे चल रही थी।

मीरा ने मेरा हाथ छोड़ा और दो कदम आगे बढ़कर मेरे सामने आ गई।

"वीर। तू रुक क्यों गया?"

मैंने हवा फिर सूँघी। अब कुछ नहीं था। बस चूल्हे की राख और गीली मिट्टी। जैसे उस आवाज़ ने मुझे छूकर सब कुछ पीछे छोड़ दिया हो।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस सिर घूम गया।"

वो मेरी आँखों में देखने लगी। उसकी नज़र में वो बात थी जो मुझसे छिप नहीं सकती थी।

"तू झूठ बोल रहा है। तेरी नाक के पास बात आई और तूने निगल ली।"

पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। "भाई, तुझे पता है तेरा चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे तूने अचार की डिब्बी खोलकर उसमें से कीड़ा निकाल लिया हो।"

मैं हँसा नहीं। हँसी गले में ही अटक गई।

"बलराज यहाँ था," मैंने कहा। "अभी। इसी हवा में। उसने मेरा नाम लिया।"

कालू काका की लाठी ज़मीन पर टिकी रह गई। उनका मुँह खुला रह गया।

"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "बलराज सिंह दिखता नहीं। वो सिर्फ़ आवाज़ है। वो कभी सामने नहीं आता। बीस साल में मैंने उसे तीन बार सुना है, और तीनों बार किसी की लाश के पास।"

मेरे पेट में वो गाँठ और कस गई।

"तो क्या वो यहाँ खून करने आया है?"

"नहीं," कालू काका ने कहा। "वो खून नहीं करता। वो बातें बोता है। और बातें खून से ज़्यादा मारती हैं।"

मीरा ने अपना बैग कंधे पर सरकाया। उसका जबड़ा कसा हुआ था, जैसे वो अंदर ही अंदर कोई हिसाब लगा रही हो।

"फिर वैद्य के पास चलना और भी ज़रूरी हो गया," उसने कहा। "अगर बलराज वैद्य का संदूक खोल चुका है, तो उसमें जो कुछ था, वो अब उसके पास है।"

करण पीछे खड़ा था। उसने अब तक कुछ नहीं कहा था। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो जेल में अपने बाप से मिलने के बाद आई थी — कोई नरमी नहीं, बस एक सवाल जो उसे अंदर से खा रहा था।

"वीर," उसने कहा। "मेरे बाप ने तुझे फोन पर क्या कहा? तूने बताया नहीं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ में वो लाठी थी जो उसकी माँ ने दी थी — काली, चिकनी, नोक पर पीतल का छल्ला।

"उसने कहा कि वो मुझे अकेले बुला रहा है। और…" मैं रुका।

"और?"

"और उसने कहा कि वो मेरा बाप है।"

करण की लाठी ज़मीन पर गिर गई। सिर्फ़ आवाज़ आई — ठक। और फिर सन्नाटा।

टिंकू ने अपनी टोपी उतार ली और उसे हाथ में घुमाने लगा, जैसे उससे कोई जवाब निकलेगा।

"भाई," उसने कहा, "तेरे बाप की कितनी लिस्ट बन गई है। पहले शेर सिंह, फिर भवानी सिंह, अब भैरव। मैं तो कहता हूँ तू अगली बार किसी से मिलने से पहले उससे लिखवाकर ले आए कि वो तेरा बाप है या नहीं।"

उसकी बात में हँसी थी, पर आवाज़ काँप रही थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे पता चला — टिंकू डरा हुआ था। और डरते वक़्त वो मज़ाक करता था। यही उसकी आदत थी।

मैंने उसका कंधा थामा।

"टिंकू। तेरी मिठाई अभी बाकी है। मैं उसे बर्बाद नहीं होने दूँगा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो मुस्कुराया।

"तो चल, भाई। वैद्य की झोपड़ी में मुझे एक बात सूझ रही है — अगर वहाँ मिठाई की गंध आई, तो समझ लेना वो मेरे बाप का ठिकाना है।"

मीरा ने सिर हिलाया। "बकवास बंद। चलो।"

हम निकले। गाँव की गलियाँ अब खाली हो रही थीं। दूर किसी के आँगन में तुलसी के पत्ते जल रहे थे, और उसकी गंध हवा में पतली-पतली लकीर बनकर फैल रही थी। कुत्ते भौंक रहे थे, पर वो भौंकना अजीब था — जैसे वो किसी की तरफ़ नहीं, किसी चीज़ की तरफ़ भौंक रहे हों।

मंदिर के पीछे का रास्ता पतला था। दोनों तरफ़ बबूल के काँटे और ऊँची घास। मेरे पैरों के नीचे सूखी पत्तियाँ चटक रही थीं। करण मेरे बगल में चल रहा था, चुप। उसकी चुप्पी में एक सवाल घूम रहा था।

रास्ते के आख़िर में एक झोपड़ी थी। छत पर पुरानी टिन, जिस पर जंग ने हरे-भूरे धब्बे बना दिए थे। दरवाज़े के बाहर एक मटका रखा था, जिसमें आधा पानी था। और पानी की सतह पर एक पत्ता तैर रहा था।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho