Spirit of a Fighter – Chapter 1214
"वीर।"
"सर।"
"मुझे पता था।"
मैं ठिठक गया। "क्या?"
"मुझे पता था कि मुझे ज़हर दिया जा रहा है।" उन्होंने आँखें मेरी तरफ़ उठाईं। "पहले महीने में पता चल गया था। मेरे पैर सुन्न होने लगे थे, मेरे हाथ काँपते थे, मेरे बाल झड़ रहे थे। मैं पहलवान था, वीर। मैं अपने शरीर की एक-एक नस जानता था।"
"तो आपने कुछ किया क्यों नहीं?" ये मैंने चिल्लाकर कहा। मुझे अपनी आवाज़ पर काबू नहीं रहा। "आपने क्यों नहीं बताया? आपने क्यों नहीं उस गिलास को फेंक दिया?"
वो मुस्कुराए। मुस्कुराहट कड़वी थी।
"क्योंकि मैं डर गया था, वीर। तेरे बाप की तरह मरने से।" उन्होंने अपनी सून्न टाँगों की तरफ़ देखा। "भवानी मरा। शेर सिंह मरा। ग्यारह और पहलवान मरे। मैंने सोचा — अगर मैं चुप रहूँगा, तो मैं ज़िंदा रहूँगा। मेरी बेटी के सिर पर छत रहेगी। मेरा अखाड़ा चलेगा।"
वो रुके। उनकी आँखें भर आईं।
"और उस चुप्पी की क़ीमत मैंने अपने पैरों से दी। रोज़ एक घूँट। बीस साल। सात हज़ार तीन सौ गिलास। और हर गिलास में मैंने अपना एक टुकड़ा खोया।"
मीरा उनके पास गई। वो उनके पैरों के पास बैठ गई और उनके घुटनों पर सिर रख दिया। उसके कंधे हिल रहे थे। वो रो रही थी, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरा दिल फट गया।
क्योंकि ये वो लड़की थी जिसने रोज़ अपने पापा को दवा पिलाई थी। अपने हाथों से। और वो नहीं जानती थी कि वो क्या पिला रही है।
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।
"मीरा," मैंने कहा। "तेरी गलती नहीं है।"
उसने सिर नहीं उठाया। "मैंने उसे पिलाया, वीर। मेरे हाथ से। रोज़।"
"तूने दवा दी थी। ज़हर किसी और ने भरा था।"
"फर्क क्या है?" उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं। "मेरे हाथ पर वो ज़हर लगा है। मैं इसे कभी नहीं धो सकती।"
मैं चुप हो गया।
क्योंकि उस बात का कोई जवाब नहीं था। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो धुलती नहीं। सिर्फ़ सही जाती हैं।
तभी दरवाज़े पर आवाज़ आई।
"सर!"
ये करण था। वो दौड़ता हुआ आया। उसकी साँस फूल रही थी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पुराना।
"सर, मैंने…" उसने हाँफते हुए कहा। "मैंने अखाड़े के पुराने काग़ज़ देखे। जो भैरव की अलमारी से मिले थे। उनमें एक काग़ज़ था जिस पर वैद्य का नाम था। और उसके नीचे एक और नाम।"
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"किसका नाम?" मैंने पूछा।
"उसी आदमी का जो आज भी हवेली में आता है। जो दवा देता है।"
मैंने काग़ज़ खोला।
और मेरी साँस रुक गई।
काग़ज़ पर लिखा था — "दवा तैयार करने वाला वैद्य — गोविंदा। सहायक — कालू।"
मेरे हाथ में काग़ज़ था और मेरे दिमाग़ में बिजली दौड़ गई।
गोविंदा। वो वैद्य जिससे मैं कल मिला था। जो खुद को भवानी का दूधभाई बता रहा था। जिसने कहा था कि वो ज़हर का तोड़ बनाता है।
और… कालू। कालू काका।
मैंने धीरे से पलटकर देखा।
कालू काका अभी भी घुटनों पर थे। उनका सिर झुका था। उनके हाथ ज़मीन पर टिके थे।
"काका," मैंने कहा। "ये गोविंदा कौन है?"
उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें खाली थीं। "वो मेरा…" वो रुके। "वो मेरा साथी था, बेटा। भैरव ने हम दोनों को साथ रखा था। मैं मिट्टी सँभालता था, वो दवा।"
"तो तू जानता था कि दवा में ज़हर है?"
वो चुप रहे।
"काका, जवाब दे।"
"मुझे शक था," उन्होंने धीरे से कहा। "पर मैंने कभी पूरा यकीन नहीं किया। क्योंकि अगर यकीन कर लेता, तो मुझे कुछ करना पड़ता। और मैं कुछ नहीं कर सकता था।"
वो फिर रोए। इस बार आवाज़ के साथ। बूढ़े आदमी का रोना — जो किसी बच्चे जैसा होता है। बेबस। बिना किसी ताकत के।
और मैं वहीं खड़ा रह गया।
क्योंकि मुझे समझ आ गया कि इस कहानी में सिर्फ़ एक शैतान नहीं था। एक पूरा जाल था। और उस जाल में कुछ लोग ऐसे भी फँसे थे जिन्होंने अपनी डर की क़ीमत चुकाई थी — और कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने दूसरों से वो क़ीमत वसूल की थी।
तभी मेरी जेब में मोबाइल बजा।
मैंने निकाला। स्क्रीन पर नाम नहीं था। अनजान नंबर।
मैंने उठाया।
"वीर सिंह?" दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई। मीठी। बहुत मीठी। "मैं जानता हूँ तू अभी रणवीर के कमरे में खड़ा है। और मैं जानता हूँ तेरे हाथ में एक काग़ज़ है।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
"तू कौन है?"
"मैं वही हूँ जो तेरे पापा का दोस्त था," आवाज़ हँसी। "और जो तेरी माँ का भी। तू मुझसे मिलना चाहेगा। क्योंकि मेरे पास वो चीज़ है जो भैरव के पास भी नहीं है।"
"क्या?"
"तेरे बाप की आवाज़।"
मेरा हाथ काँपा।
"क्या बक रहा है?"
"भवानी सिंह ने मरने से पहले एक आख़िरी बात रिकॉर्ड की थी। उस पुराने टेप रिकॉर्डर पर। जो अब मेरे पास है। और उसमें उसने खुद बताया है कि उसे किसने मारा। नाम के साथ। पूरे नाम के साथ।"
मैंने आस-पास देखा। कमरे में सब चुप थे। सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
"कहाँ मिलेगा?"
"पुरानी चीनी मिल। जहाँ तू कल आग से बचा था। कल सुबह, सूरज निकलने से पहले। अकेला आ।"
"और अगर मैं अकेला नहीं आया?"
वो हँसा। "तो टेप मिट जाएगा। और तेरे बाप की आवाज़ हमेशा के लिए खो जाएगी। तुझे पता है, वीर — ज़िंदगी में कुछ चीज़ें एक बार मिलती हैं। बाप की आवाज़ उनमें से एक है।"
लाइन कट गई।
मैंने मोबाइल जेब में रखा। मेरे हाथ ठंडे थे।
"कौन था?" मीरा ने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर रणवीर सिंह की तरफ़। फिर कालू काका की तरफ़।
और मैंने वो कहा जो मेरे सीने में धधक रहा था।
"कोई है जो अभी भी बाहर घूम रहा है," मैंने कहा। "और जो मेरे बाप की आवाज़ रखता है।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ चमका — पहचान।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी। "वो आवाज़ मत सुनना। वो आदमी झूठ बोलता है। वो तेरे बाप की आवाज़ नहीं, तेरे बाप का डर बेचता है।"
"आप उसे जानते हैं?"
वो चुप रहे। बहुत देर चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा।
"वो मेरा सौतेला भाई है। जगदीश के बाद, वो सबसे बड़ा था। और भवानी की मौत वाली रात, वो भी तहखाने में था।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"नाम?" मैंने पूछा। "उसका नाम क्या है?"
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कीं।
"बलराज," उन्होंने कहा। "बलराज सिंह।"
और मेरे सामने अंधेरे में एक और चेहरा उभर आया — जो अब तक किसी काग़ज़ में नहीं था, किसी गवाही में नहीं था। एक ऐसा नाम जो बीस साल से किसी ने नहीं लिया था।
कालू काका ने धीरे से सिर उठाया।
"बलराज," उन्होंने फुसफुसाया। "वो तो मर गया था। उसे तो भैरव ने खुद मारा था।"
"नहीं, काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद ही अजीब लगी। "वो नहीं मरा। वो बीस साल से हमारे बीच रह रहा है। और आज उसने मुझे फोन किया।"
कमरे में हवा भारी हो गई।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "वीर, तू अकेला नहीं जाएगा।"
"मीरा—"
"मैंने कहा, तू अकेला नहीं जाएगा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैं जानती हूँ तू क्या सोच रहा है। तू सोच रहा है कि ये तेरी लड़ाई है। तेरे बाप की आवाज़ है, तेरा हक़ है। पर सुन — जिस आदमी ने बीस साल तक मेरे पापा को ज़हर दिया, वो मेरी भी लड़ाई है।"
मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा।
"डर लग रहा है?" मैंने पूछा।
"बहुत," उसने कहा। और फिर मुस्कुराई। "पर तेरे साथ।"
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