Spirit of a Fighter – Chapter 1213
"मैं इसे साफ़ करूँगा," मैंने कहा। "पूरी मिट्टी। हर कण। पर भैरव के सामने। उसके होते हुए। उसकी आँखों के सामने। ताकि वो देखे कि उसका ज़हर कितना भी गहरा हो, मिट्टी उसकी नहीं होगी।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ काँपे। "बेटा…"
"काका, तुमने मुझे एक दिन कहा था — मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
"हाँ।"
"तो आज ये मिट्टी सच बोलेगी। मेरे हाथ से।"
मीरा ने झुककर मिट्टी उठाई।
उसने भी सूँघा। पहले हल्का। फिर गहरा। उसका चेहरा बदला — रंग उड़ गया और उसके होठ खुले रह गए।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "इसमें सिर्फ़ तेल नहीं है।"
"मुझे पता है। कुछ और है।"
"नहीं, तू समझा नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने उसमें कभी नहीं देखा था। "ये गंध… ये तो वही दवा है।"
मेरा मुँह सूख गया। "कौन-सी दवा?"
"वो जो मेरे पापा को दी जाती थी।" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई। "रोज़। बीस साल से। मैं उसे अपने हाथ से पिलाती थी। मैं जानती हूँ ये गंध। ये वही है। वही कड़वी, वही जो गले में जाकर अटक जाती है।"
कालू काका की लाठी उनके हाथ से छूट गई और मिट्टी पर गिरी।
और मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूमने लगी, एक ही सवाल, जो पूरे अखाड़े की मिट्टी को अपने साथ लेकर धँस गया।
अगर ये वही दवा है जो रणवीर सिंह को दी जाती थी…
तो रणवीर सिंह को ये दवा कौन पिलाता था?
और उसका हाथ किसके हाथ में था?
॥
मेरे हाथ में मिट्टी थी और मेरे सामने पूरा अखाड़ा खड़ा था, पर मेरा दिमाग़ सिर्फ़ एक नाम पर अटका था।
रणवीर सिंह।
वो आदमी जिसने मुझे पहली बार मिट्टी छूना सिखाया। जिसने कहा था — मिट्टी से बैर मत करो, वो तुम्हारी माँ है। जिसकी आँखों में बीस साल का गुस्सा सुलगता था और जो हर बात पर चुप रह जाता था।
अगर ये दवा उन्हें दी जाती थी, तो देने वाला कोई अपना ही था। कोई ऐसा जो रोज़ उनके कमरे में जाता हो। जो रोज़ उनके हाथ में गिलास थमाता हो।
मैंने मिट्टी वापस पोटली में बाँधी। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे। अजीब बात है — जब सच बहुत बड़ा हो जाए, तो डर कहीं पीछे छूट जाता है।
"मीरा," मैंने कहा। "तेरे पापा से मिलना है। अभी।"
उसका चेहरा सफ़ेद था। "वीर, मैं…"
"मीरा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मैं ये नहीं कह रहा कि तेरे पापा ने कुछ किया। मैं ये कह रहा हूँ कि उन्हें कोई रोज़ ज़हर दे रहा है। और वो कोई उनके बहुत करीब है।"
उसने आँखें बंद कीं। एक लंबी साँस ली। फिर खोलीं।
"चल," वो बोली। "पर वीर — पापा के सामने धीरे बोलना। उनकी साँस टूटती है जल्दी।"
हम चले। कालू काका लाठी टेकते हुए पीछे आए। टिंकू ने अपना शेड बंद किया और साथ चल पड़ा — बिना पूछे। करण कुछ दूर खड़ा था, हमने उसे इशारा किया, वो भी आ गया।
रास्ते में मैं चुप था। मीरा भी चुप थी। टिंकू ने दो बार कुछ कहने की कोशिश की, फिर चुप हो गया। अच्छा ही हुआ। मुझमें बात करने की ताकत नहीं थी।
हवेली का फाटक खुला था। आँगन में धूप पड़ी थी और एक कोना छाया में था जहाँ रणवीर सिंह की व्हीलचेयर रखी थी।
वो वहीं थे। चादर ओढ़े। आँखें बंद। मुँह खुला हुआ, साँस लेने की आवाज़ आ रही थी — छोटी, कटी-कटी साँसें, जो बीच में रुक जाती थीं।
मेरा कलेजा धक् से रह गया।
वो साँसें। वो आवाज़। मैंने सैकड़ों बार सुनी थी। अखाड़े में, उनके कमरे में, चबूतरे पर जब वो लोगों को हिदायत देते थे। पर आज वो आवाज़ मुझे किसी और तरह सुनाई दी।
जैसे कोई घड़ी धीमी हो रही हो।
"पापा?" मीरा ने धीरे से कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं। पहले उन्होंने मीरा को देखा, फिर मुझे, फिर मेरे हाथ में बँधी पोटली को।
और उनका चेहरा बदल गया।
"ये क्या है?" उन्होंने पूछा, पर आवाज़ में सवाल नहीं था। डर था।
मैंने पोटली खोली। मिट्टी उनके सामने मेज़ पर रखी।
"रोज़ सुबह, आपको कोई दवा देता है?"
उन्होंने नज़र हटा ली। "बहुत सवाल हो गए, बेटा।"
"सर," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सीधी थी, नरम नहीं। "मैंने ये मिट्टी सूँघी है। इसमें वही दवा है जो आपको दी जाती है। मैं जानता हूँ ये कैसी दवा है। मैं जानता हूँ ये क्या करती है।"
उनकी उँगलियाँ कुर्सी की बाहों पर कस गईं। सफ़ेद पोर उभर आए।
"आपको ये कौन देता है?" मैंने पूछा। "रोज़। एक गिलास में। कौन?"
वो चुप रहे। इतनी देर चुप रहे कि मुझे लगा वो जवाब नहीं देंगे।
फिर उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "कालू।"
मैं पलटा।
कालू काका दरवाज़े के पास खड़े थे। उनकी लाठी हाथ में थी और उनका चेहरा… उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके सीने पर पत्थर रख दिया हो।
"काका?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट गई।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"मैं देता था, बेटा," उन्होंने कहा। "बीस साल से। रोज़। सुबह की धूप में। भैरव का हुक्म था। वो कहता था — ये दवा है, साहब की ताकत के लिए।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"काका, तुमने…" मेरी आवाज़ निकली ही नहीं।
"मैंने सोचा दवा है।" उनके हाथ काँप रहे थे। "मैं अनपढ़ हूँ, बेटा। मुझे क्या पता था कि दवा और ज़हर में फर्क कैसे किया जाता है? मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि साहब को देने के बाद वो सो जाते थे, आराम से। मुझे लगा दर्द कम हो रहा है।"
वो रुके। उनकी साँस फूल रही थी।
"पर एक दिन," उन्होंने कहा, "मैंने वो गिलास खुद सूँघा। मैं बूढ़ा हूँ, पर मेरी नाक अभी ज़िंदा है। और उसमें वही बू थी जो उस रात तहखाने में थी। वो रात जब भवानी सिंह मरे थे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"फिर तुमने बंद क्यों नहीं किया?" ये मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, और गुस्से के नीचे रोना।
"क्योंकि मैं डर गया, बिटिया।" कालू काका ने अपनी लाठी से ज़मीन ठोकी। "मैंने सोचा — अगर मैंने मना किया, तो भैरव मुझे भी उसी तहखाने में डाल देगा। और मैं अपने बेटे चंदन को बीस साल से ढूँढ रहा हूँ। मैं मर नहीं सकता था। मरना मेरे लिए ऐशो-आराम की बात थी, बेटा। ज़िंदा रहना सज़ा थी।"
वो मेरे पास आए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनका हाथ ठंडा था, सूखा, हड्डी जैसा।
"आज सुबह," उन्होंने कहा, "मैंने वो गिलास फिर भरा। और साहब के मुँह तक ले गया। और फिर… फिर मैंने तेरी आवाज़ सुनी। मिट्टी के बारे में। और मेरा हाथ रुक गया।"
वो फूट-फूटकर रो पड़े।
"गिलास वहीं रख दिया, बेटा। बीस साल में पहली बार। और मुझे पता है भैरव को ये पता चलेगा तो वो मुझे नहीं छोड़ेगा। पर आज मैं मर जाऊँ, तो भी ठीक है। बस एक बार साहब से माफ़ी माँग लूँ।"
वो रणवीर सिंह के सामने घुटनों पर बैठ गए।
रणवीर सिंह ने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, नफ़रत नहीं थी। थकान थी। बीस साल की थकान।
"कालू," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "तू मेरा दोस्त था। मेरे साथ मिट्टी में खेला था। और तूने मुझे ज़हर दिया।"
"साहब—"
"चुप रह।" रणवीर सिंह की आवाज़ में फिर वो गरज लौटी — थोड़ी देर के लिए। "आज तक तूने एक बार भी नहीं बताया। एक बार भी नहीं कहा — साहब, ये दवा नहीं, ज़हर है। तूने मुझे बचाया नहीं।"
कालू काका ने सिर झुका लिया। उनकी दाढ़ी आँसुओं से भीग गई।
मैं बीच में खड़ा था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। गुस्सा आ रहा था कालू काका पर। दया भी आ रही थी। दोनों एक साथ, और दोनों से मेरा सीना भारी हो रहा था।
तभी रणवीर सिंह ने कहा — और उनकी आवाज़ बदल गई।
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