Spirit of a Fighter1212 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1212

7 min read November 5, 2026

माँ एक कदम आगे लड़खड़ाईं और मैंने उन्हें पकड़ लिया। उनका शरीर ठंडा था, बहुत ठंडा, और उनके हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें अपनी छाती से लगाया।

"माँ," मैंने फुसफुसाया।

"गुड़िया," उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा।

करण और टिंकू गुड़िया की तरफ़ दौड़े। करण ने उसके हाथ खोले और टिंकू ने उसे उठा लिया। गुड़िया ने टिंकू के गले में मुँह छिपा लिया और रोने लगी — पहली बार खुलकर।

"मैं डर गई थी भैया," वो रुँधे गले से बोली। "बहुत डर गई थी। पर मैंने रोया नहीं। माँ ने कहा था — रोएगी तो ये खुश होगा।"

मेरी आँखें जलने लगीं।

और तभी जगदीश सिंह ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी।

"तो तू नहीं देगा?" वो बोला।

"नहीं," मैंने कहा।

"तो फिर सुन।" उसकी आवाज़ बदल गई — अब उसमें वो सूखी हँसी नहीं थी, बल्कि कुछ और था। जलन। "तू जो अखाड़े की तरफ़ भागा जा रहा है — वहाँ जो मिट्टी है, वो अब मिट्टी नहीं है। भैरव ने उसमें वो डाल दिया है जो तेरे पापा ने बनाया था। और जो भी उस मिट्टी में लेटेगा, वो उठेगा नहीं। तेरे सारे पहलवान — जो अभी सोए पड़े हैं — वो उसी मिट्टी में लेटे हैं। तू पहुँचेगा तो शव उठाने पहुँचेगा।"

मेरा दिल एक पल रुका।

"झूठ," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे से आई और उसकी आवाज़ साफ़ थी। "भैरव जेल में है। उसके आदमी पकड़े गए हैं।"

"भैरव जेल में है," जगदीश ने सिर हिलाया। "पर उसका हुक्म जेल से पहले निकल चुका था। शेराज़ को उसी ने कहा था। और शेराज़ ने वो काम कर दिया। मैं तो बस ये बताने आया था कि तू देर कर रहा है।" उसने लाठी उठाई। "अब कर जो करना है। मैंने अपनी बात कह दी।"

और वो पलटकर अंधेरे में घसीटते कदमों से चलने लगा।

"रुक!" करण दौड़ा, पर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

"जाने दे," मैंने कहा।

"पर वो—"

"वो हमें रोक नहीं सकता, और हमारा वक़्त खा रहा है।" मैंने माँ को सहारा दिया। "हमें अखाड़े पहुँचना है। अभी।"

मीरा ने गुड़िया का चेहरा देखा और अपने बैग से पानी की सुराही निकाली। "पहले दो घूँट," उसने गुड़िया से कहा, फिर माँ की तरफ़ बढ़ी।

"मैं ठीक हूँ, बेटी," माँ ने कहा। पर उनकी आवाज़ काँप रही थी।

"आप ठीक नहीं हैं," मीरा ने सीधे कहा। "आपके होंठ सूखे हैं और आपकी नाड़ी तेज़ है। आपको बैठना होगा।"

"बैठूँगी नहीं," माँ ने कहा। और उनकी आवाज़ में वो चीज़ लौट आई जो मैं बचपन से जानता था। "मेरा बेटा जहाँ जाएगा, मैं वहाँ जाऊँगी।"

सुरंग से बाहर निकलते वक़्त आसमान में हल्की सुर्खी फैल रही थी।

मैंने सुरंग का मुँह पीछे छोड़ा और सीधे अखाड़े की तरफ़ भागा। पैर मिट्टी में धँसते थे और साँस छाती में फँस रही थी, पर मैं रुका नहीं।

रास्ते में करण मेरे साथ आया। उसकी बाँह से खून रिस रहा था, पर वो भाग रहा था।

"सुन," वो हाँफते हुए बोला। "अगर मिट्टी में सच में ज़हर है, तो हमें उसे साफ़ करना होगा। पूरी मिट्टी हटानी पड़ेगी। नई मिट्टी डालनी पड़ेगी। हमारे पास वक़्त नहीं—"

"नहीं," मैंने कहा और रुक गया।

करण भी रुका। "क्या मतलब नहीं?"

"अगर हम साफ़ करेंगे," मैंने कहा, "तो भैरव को — या जो भी उसके पीछे बैठा है — पता चल जाएगा कि हमें खबर है। फिर वो अपना रास्ता बदल देगा। फिर हम कभी नहीं जानेंगे कि उसने और क्या बोया है।"

"तो हम क्या करें? हाथ पर हाथ रखकर देखें?"

मैंने आगे देखा। अखाड़े की मिट्टी की दीवार दूर दिख रही थी।

"हम उसे पकड़ेंगे," मैंने कहा। "हाथ में। जब वो मिला दे।"

"कैसे?"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो गुड़िया को उतार रहा था, और उसके चेहरे पर वो डर था जो हमेशा रहता था — पर उसकी आँखों में कुछ और भी था। कुछ जो चल रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ भाई।"

"तेरी दुकान में कितनी मिठाई है?"

वो एक पल रुका। "क्यों?"

"बता।"

"कल की बनी हुई… लड्डू, बर्फ़ी, कुछ पेड़े। दो थालियाँ भर जाएँगी।"

"सब उठा," मैंने कहा। "सब। और अखाड़े में आ। जितने आदमी दिखें — सबको बाँट दे। मुफ़्त में। बोल दे कि तेरे भाई का मुकाबला है, आज मिठाई उसकी तरफ़ से है।"

टिंकू की आँखें फैलीं। "भाई, वो मिठाई मैंने बेचने के लिए बनाई थी। उसमें खर्चा—"

"टिंकू।"

"समझ गया।" उसने गुड़िया को मीरा की तरफ़ बढ़ाया और अपनी टोपी ठीक की। "मैं अभी आया।" और वो भागा — लंबा, दुबला, हड्डियों का ढाँचा, पर उसकी चाल में आज कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा।

मीरा मेरे पास आई। "भीड़?" उसने पूछा। "तू भीड़ चाहता है?"

"हमें गवाह चाहिए," मैंने कहा। "बहुत सारे गवाह। भैरव या उसका आदमी कुछ करे, तो सब देखें। और भीड़ के बीच हम मिट्टी की जाँच भी कर सकते हैं — कोई पूछेगा नहीं कि हम ज़मीन क्यों सूँघ रहे हैं।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो अब मैं पहचानने लगा था — हल्की-सी मुस्कान, जो होंठों पर नहीं, आँखों में आती थी।

"ठीक है," उसने कहा। "पर अगर मैं कहूँ कि तू पागल है, तो बुरा मत मानना।"

"मानूँगा नहीं।"

हम अखाड़े की मिट्टी की दीवार के पास पहुँचे तो आसमान में पहली किरण आ चुकी थी।

अखाड़े का फाटक खुला था। और फाटक के अंदर, मिट्टी के बीच, एक लालटेन जल रही थी।

कालू काका घुटनों के बल बैठे थे और दोनों हाथों से मिट्टी उठाकर सूँघ रहे थे। उनका कुबड़ा शरीर लालटेन की रोशनी में और भी छोटा लग रहा था।

"काका," मैंने कहा।

वो उठे नहीं। बस सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं, और उनके हाथों में मिट्टी भरी थी।

"मिट्टी बदल गई है, बेटा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ वैसी ही धीमी थी, पर आज उसमें कुछ टूटा हुआ था। "मैं सुबह से इसे सूँघ रहा हूँ। इसमें अब माँ की गंध नहीं है। मौत की गंध है।"

मैं उनके पास घुटनों के बल बैठ गया।

"कब से?" मैंने पूछा।

"रात में कोई आया," कालू काका ने कहा। "भोर से पहले। मैंने दरवाज़े पर आहट सुनी, पर उठा नहीं। ये मेरी गलती है। मैं डर गया था।" उनकी आवाज़ टूटी। "मैं हमेशा डरता हूँ, बेटा। बीस साल से। और उस डर ने आज फिर मेरी मिट्टी छीन ली।"

मैंने उनके हाथों से मिट्टी ली।

एक मुट्ठी। लाल मिट्टी, जो मेरी हथेली में गर्म लग रही थी — गर्म, जबकि सुबह की हवा ठंडी थी। मैंने उसे नाक के पास लाया और गहरी साँस ली।

और मेरी छाती जम गई।

तेल। वो तेल जो मैंने सुरंग में सूँघा था। पर इसके नीचे, बहुत गहरे, कुछ और था। कुछ जो मिट्टी के साथ नहीं मिलता था। कुछ जो मिट्टी में जबरन डाला गया था, जैसे कोई दूध में ज़हर घोलता है।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"वीर?" मीरा ने कहा। "क्या है?"

मैंने मुट्ठी कसी। मिट्टी मेरी उँगलियों के बीच से रिसी।

"ये मिट्टी मेरी माँ जैसी है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ बैठी हुई थी।

मीरा झुकी। "क्या?"

"ये मिट्टी…" मैंने अपनी हथेली खोली और उस मिट्टी को देखा। "मेरी माँ ने मुझे इसी मिट्टी में खेलते देखा है। गुड़िया इसी में गिरती है। टिंकू इसी में अपनी मिठाई की कड़ाही रखता है। हर सुबह मैं इस पर पैर रखता हूँ और ये मुझे सहती है। ये मेरी माँ जैसी है — कभी कुछ नहीं कहती, बस सहती रहती है।"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने उन्हें रगड़ा — नहीं, ये पसीना है, बस पसीना।

"और इसे ज़हर दिया गया है," मैंने कहा। "किसी ने इसमें वो डाला है जो देखते ही पहलवान को बूढ़ा कर देता है। ये मिट्टी मेरी माँ है, और किसी ने मेरी माँ को ज़हर दिया है।"

मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी मुट्ठी में मिट्टी थी और मेरे हाथ काँप रहे थे।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho