Spirit of a Fighter1211 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1211

7 min read November 5, 2026

"अच्छा।" वो एक पल रुकी। "क्योंकि अगर तू बेहोश हुआ, तो मैं तुझे उठाकर नहीं ले जा सकती। तू भारी है।"

"तूने मुझे कभी उठाया नहीं।"

"इसीलिए तो कह रही हूँ," वो बोली। "पहले से बता रही हूँ।"

मैं हँसा। दर्द के बीच। और मेरी हँसी सुरंग की दीवारों से टकराकर नीचे गई।

हम उतरने लगे।

सीढ़ियाँ गिनना शुरू किया — मैंने नहीं, टिंकू ने। वो हर सीढ़ी पर धीरे से बोलता जा रहा था।

"एक… दो… तीन…"

"क्यों गिन रहा है?" करण ने पीछे से पूछा।

"ताकि नीचे जाकर बता सकूँ कि कितनी सीढ़ियाँ चढ़नी हैं," टिंकू ने कहा। "अगर हमें भागना पड़े तो पता हो।"

"और अगर भागना न पड़े?"

"तो मैं बता दूँगा कि हमने कितनी सीढ़ियाँ चढ़ीं। बस।"

करण हँसा। फिर कराहा। फिर हँसा।

सीढ़ियाँ खत्म हुईं। और फिर वो जगह आई जिसके बारे में शेराज़ ने बताया था।

तीन रास्ते।

मैंने लालटेन उठाई। रोशनी तीनों मुँहों पर पड़ी।

मैंने सूँघा।

बायीं तरफ़ से अखाड़े की मिट्टी की गंध आ रही थी — लाल मिट्टी, पसीना, और उसमें मिली वो कड़वाहट जो मैंने पहली बार तब पहचानी थी जब मैं अखाड़े के बाहर खड़ा था।

दायीं तरफ़ से हवेली की गंध — चंदन, धूप, और गंगा देवी की साड़ी से आने वाली कपूर की महक।

और सीधे सामने से…

मैंने एक गहरी साँस ली। और मेरी छाती जम गई।

कपूर। बादाम का तेल। गीली मिट्टी।

और उसके नीचे — बहुत हल्की, बहुत दूर — मेरी माँ के हाथों की महक। वो महक जो चक्की के आटे और हल्दी के टीके से आती थी।

"माँ," मैंने फुसफुसाया।

और फिर, बहुत दूर से, सुरंग की गहराई से, एक आवाज़ आई।

इस बार गुड़िया की नहीं।

इस बार मेरी माँ की।

"बेटा… मत आ… वो तेरा इंतज़ार कर रहा है…"

मैंने अपनी लालटेन कसकर पकड़ी।

"कौन?" मैंने आवाज़ ऊँची की। "कौन इंतज़ार कर रहा है?"

सुरंग ने मेरी आवाज़ लौटा दी। और फिर, उस सन्नाटे में, एक और आवाज़ आई। इस बार बहुत पास।

इतनी पास कि लगा जैसे कोई मेरे कान में बोल रहा हो।

"मैं," वो बोली। "जगदीश सिंह। भवानी का भाई। और तेरे खून से मेरा हिसाब बाकी है।"

मैंने लालटेन उठाई।

और अंधेरे में, सीधे रास्ते के मुँह पर, मुझे वो दिखा।

जगदीश सिंह खड़ा था।

उसके हाथ में एक औरत थी — मेरी माँ। उसके सिर पर सफ़ेद चोटी खुली हुई थी और उसके माथे पर हल्दी का टीका टूटा हुआ था। उसकी आँखें खुली थीं और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं।

और उसके पीछे, अंधेरे में, एक छोटी-सी परछाई हिल रही थी। गुड़िया। उसके होंठ बंधे हुए थे।

जगदीश सिंह मुस्कुराया।

"आ गया तू," वो बोला। "मैंने कहा था न — कल सुबह मिलेंगे। सूरज निकलने से पहले आ गया। अच्छा किया। तेरे पापा भी ऐसे ही थे। जल्दी आते थे।"

और मैंने अपनी मुट्ठी कस ली।

क्योंकि इस बार मुझे पता था — जगदीश सिंह जो कहेगा, वो सब झूठ होगा।

पर उसके हाथ में मेरी माँ थी।

और माँ की आँखों में वो बात थी जो बीस साल से मैंने कभी नहीं देखी थी।

डर नहीं।

इंतज़ार।

जैसे वो बीस साल से इसी पल का इंतज़ार कर रही हो।

॥

माँ की आँखें मुझे देख रही थीं, और उनमें डर नहीं था — ये बात मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।

जगदीश सिंह ने माँ की कलाई पकड़ी हुई थी, पर पकड़ ऐसी थी जैसे कोई पुरानी रस्सी लटकाए खड़ा हो। माँ की कलाई उसकी उँगलियों से फिसल नहीं रही थी। वो खुद नहीं खींच रही थी।

मेरी छाती में धक्का लगा। क्यों नहीं खींच रही?

"छोड़ उसे," मैंने कहा।

"क्यों छोड़ूँ?" जगदीश ने सिर झुकाया। उसकी सफ़ेद आँखें लालटेन की रोशनी में चमकीं, और उसकी लाठी सुरंग की मिट्टी पर टिकी थी। "मैं तो इसे छोड़ने ही आया था। तू आ गया, तो अब बात कर लें।"

"बात?" करण मेरे पीछे से आगे आया। उसकी बाँह पर पट्टी थी और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो जेल के बाद आई थी। "तूने मेरे बाप को बीस साल कुएँ में बंद रखा। तेरी बात करने की हिम्मत कैसे हुई?"

जगदीश ने करण की तरफ़ देखा। फिर हँसा। हँसी सूखी थी, जैसे सूखी लकड़ी चटके।

"मैंने बंद रखा?" वो बोला। "बेटा, मैं खुद बंद था। उसी कुएँ में। उसी अँधेरे में। भैरव ने मुझे भी वहीं डाला था। तू अपने बाप से पूछ लेना। वो मेरे साथ उसी सुरंग में सड़ रहा था।"

करण का मुँह खुला रह गया।

मैंने एक कदम आगे रखा। मेरी चप्पल की आवाज़ सुरंग में गूँजी।

"माँ," मैंने कहा। "तू ठीक है?"

माँ ने होंठ हिलाए। बहुत धीरे। "गुड़िया…" उन्होंने कहा।

और मेरी नज़र गुड़िया पर गई।

वो जगदीश के पीछे खड़ी थी, हाथ पीछे बँधे, मुँह पर कपड़ा। उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर वो बिलकुल चुप थी। बिलकुल।

गुड़िया चुप थी।

मेरी बहन, जो हर बात का जवाब तुरंत देती थी, जिसका मुँह कभी बंद नहीं रहता था — वो चुप खड़ी थी।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"उसका कपड़ा खोल," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी।

"पहले मेरी बात सुन," जगदीश ने कहा।

"उसका कपड़ा खोल!" मेरी आवाज़ सुरंग में फट पड़ी। दीवारों से टकराकर लौटी और मेरे ही कानों में घुसी।

जगदीश एक पल रुका। उसकी लाठी हिली। फिर उसने धीरे से हाथ बढ़ाया और गुड़िया के मुँह का कपड़ा नीचे खींच दिया।

गुड़िया ने पहली साँस ऐसे ली जैसे उसे महीनों बाद हवा मिली हो। और फिर वो बोली — रुँधे गले से, पर साफ़:

"भैया, ये बूढ़ा झूठा है। ये माँ को मारने वाला है। इसने कहा था — अगर तू आया, तो ये माँ के सामने तुझे मारेगा।"

जगदीश की आँखें झपकीं।

"चुप कर, छोकरी," वो बोला। पर उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो अभी था।

"नहीं चुप करूँगी!" गुड़िया चिल्लाई। "भैया, ये माँ से कह रहा था कि 'तेरा बेटा आएगा और मरेगा, बस मुझे शीशी दे दे।' माँ कुछ जानती है जो ये चाहता है!"

मेरी छाती में आग जली।

"कौन-सी शीशी?" मैंने जगदीश की तरफ़ कदम बढ़ाया।

जगदीश ने माँ को अपनी तरफ़ खींचा। माँ के पैर लड़खड़ाए और वो उसके सहारे से टिक गईं।

"रुक जा," वो बोला। "एक कदम और बढ़ाया, तो ये बूढ़ी औरत यहीं गिरेगी। और मैं ऐसा नहीं करूँगा जो तुझे पसंद न आए। मैं तो सिर्फ़ एक चीज़ चाहता हूँ।"

"क्या?"

"भवानी की पीली शीशी। जो तेरी जेब में है।"

मेरे हाथ अपनी जेब पर गए। अपने आप।

जगदीश ने देखा और मुस्कुराया। "हाँ, वही। दे दे मुझे। और मैं तेरी माँ को छोड़ दूँगा। गुड़िया को भी। फिर तुम तीनों जाओ, मैं जाऊँ। कोई झगड़ा नहीं।"

टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "वीर," वो फुसफुसाया, "मत दे। ये झूठा है।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

"तो फिर?"

मैंने जगदीश की तरफ़ देखा। उसकी लाठी, उसकी सफ़ेद आँखें, उसकी उँगलियाँ माँ की कलाई पर।

"सुन," मैंने कहा। "तू कह रहा है कि तू बीस साल कुएँ में बंद था। तेरी आँखें सफ़ेद हैं। तेरे पैर घसीटते हैं। तू अकेला है। और तेरे पास मेरी माँ और मेरी बहन हैं। अगर तू उन्हें कुछ करेगा, तो मैं तुझे इसी सुरंग में छोड़कर जाऊँगा — ज़िंदा नहीं, मुर्दा भी नहीं। बस छोड़कर। कौन ढूँढेगा तुझे?"

जगदीश की मुस्कान फीकी पड़ी।

"तू धमकी दे रहा है?" उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी।

"मैं बता रहा हूँ," मैंने कहा। "तेरे पास शीशी नहीं है, इसलिए तू ये नाटक कर रहा है। अगर तेरे पास ताकत होती, तो तू माँ को पकड़कर नहीं खड़ा होता। तू सीधे मुझ पर हमला करता। तू डरा हुआ है, जगदीश। और डरा हुआ आदमी सौदा करता है।"

सुरंग में सन्नाटा छा गया।

फिर जगदीश की लाठी धीरे से हिली और उसने माँ की कलाई छोड़ दी।

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