Spirit of a Fighter – Chapter 1210
करण ने अपने हाथ को देखा। उसकी उँगलियाँ हिल रही थीं। धीरे-धीरे।
"मुझे भी नहीं पता था," वो बोला — मीरा से नहीं, किसी और से। जैसे खुद से।
"क्या नहीं पता था?" मीरा ने पूछा।
करण ने अपनी बाँह की तरफ़ देखा, जिस पर टिंकू का सफ़ेद कपड़ा बँधा था और उस पर लाल दाग फैल रहा था।
"कि मैं ऐसा कर सकता हूँ," उसने कहा। "कि मैं किसी के सामने आ सकता हूँ।"
और तभी, पीछे से, एक आवाज़ आई।
"तुमने मेरे लिए खून बहाया?"
हम सब पलटे।
अंजली खड़ी थी।
वो अपने पैरों पर खड़ी थी। हरनाम उसकी बाँह पकड़े हुए था, पर वो खुद खड़ी थी। उसका चेहरा अभी भी पीला था और उसके होंठ सूखे हुए थे, पर उसकी आँखें खुली थीं। और वो करण को देख रही थी।
करण ने उसे देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला। जैसे कोई बच्चा जो चोरी पकड़ा गया हो।
"मैं…" वो हकलाया। "मुझे भी नहीं पता था कि मैं ऐसा कर सकता हूँ।"
अंजली उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ी। फिर रुकी। उसने करण की बाँह पर बँधा कपड़ा देखा, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो शायद उसने भी कभी महसूस नहीं किया था।
"तुम मेरे लिए?" वो फिर बोली। "तुमने मुझे नहीं जानता।"
"मैं जानता हूँ," करण ने कहा। "तुम्हारे बाबा ने जो किया, वो तुम्हारा नहीं है। तुम उसमें नहीं हो।"
अंजली की आँखें भर आईं।
उसने अपना हाथ बढ़ाया और करण की बाँह को छुआ — उस कपड़े के ऊपर से जहाँ खून था। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"दर्द होता है?" उसने पूछा।
"हाँ," करण ने कहा।
"बहुत?"
"बहुत।"
अंजली ने अपनी आँखें बंद कीं। उसके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं आई। फिर उसने आँखें खोलीं और वो कुछ बोली जो मैंने नहीं सुना। पर करण के चेहरे पर जो हुआ, वो मैंने देखा।
उसकी आँखें भी भर आईं। और उसने अपना सिर झुका लिया।
मैंने वहाँ से नज़र हटा ली। ये उनका पल था। मेरा नहीं।
मेरी नज़र टिंकू पर पड़ी। वो अपनी जेब में हाथ डाले खड़ा था और अपने जूते की नोक से मिट्टी खुरच रहा था। उसके होंठों पर मुस्कान थी।
"अच्छा लग रहा है न?" मैंने धीरे से पूछा।
"बहुत," उसने कहा। "जब कोई अपनी मर्ज़ी से किसी के लिए खड़ा होता है, तो अच्छा लगता है।"
"तूने मेरे लिए कितनी बार किया है?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने क्या किया?"
"वो खीर। जो तू रोज़ लाता है और कहता है दुकान पर बिक गई।"
टिंकू का चेहरा बदला। वो कुछ बोलने ही वाला था कि मैंने उसका कंधा थाम लिया।
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पहले से पता है। माँ ने बताया था।"
"कब?"
"बहुत पहले।"
टिंकू ने अपना सिर हिलाया। उसकी आँखें चमक रही थीं, पर वो हँसा।
"तो फिर मैं क्यों झूठ बोलता रहा?"
"क्योंकि तू मेरा भाई है," मैंने कहा। "और भाई झूठ बोलते हैं ताकि दूसरा भाई शर्मिंदा न हो।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने अपनी जेब से एक और टूटा हुआ लड्डू निकाला।
"ये आख़िरी है," वो बोला। "नाले में गिरने से बच गया।"
"आधा-आधा?"
"आधा-आधा।"
हमने वो लड्डू बाँट लिया। मिट्टी और पसीने और खून की गंध के बीच, वो लड्डू मुझे आज तक के सबसे मीठे लड्डू जैसा लगा।
और तभी शेराज़ ने अपना मुँह खोला।
वो अभी भी दीवार से टिका बैठा था। उसने अपने हाथ चेहरे से हटाए थे। उसकी आँखों में सूजन थी और उसका चेहरा गीला था।
"वीर सिंह," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब वैसी नहीं थी। वो अब धमकी नहीं दे रहा था। वो गिर गया था।
"बोल," मैंने कहा।
"मैं तुझसे लड़ा," वो बोला। "बीस साल। मैंने तेरे बाप को मरते देखा और मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने तेरी माँ को बैलगाड़ी में उठाया और मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब…"
उसने अपने घुटनों पर हाथ रखे और मेरी तरफ़ झुका।
"भैरव सर ने जेल में मुझे आख़िरी हुक्म दिया था।"
मेरी छाती ठंडी हो गई।
"क्या हुक्म?"
शेराज़ ने अपनी आवाज़ नीची की। "कहा — 'भारत केसरी' वाले अखाड़े की मिट्टी में ज़हर मिला देना। गड्ढा बनाकर। नीचे की मिट्टी में। ताकि जब वो उसमें लड़े, उसके घाव खुलें, और ज़हर उसके खून में जाए।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"वो चाहते हैं," शेराज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई, "कि वीर उस मिट्टी में लड़े और खुद ज़हर से मरे। कोई मारे नहीं। वो खुद मरे। मैदान में। सबके सामने। और सब कहें — कुदरत का सितम।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"बड़ा मुकाबला कब है?" उसने पूछा।
"पंद्रह दिन बाद," करण ने कहा। वो बाँह पकड़े खड़ा हो गया था। "मैंने चिट्ठी देखी थी। पंद्रह दिन बाद।"
"तो हमारे पास पंद्रह दिन हैं," मैंने कहा।
"पंद्रह दिन क्या?" टिंकू बोला। "अरे भाई, पंद्रह दिन में तो मैं अपनी दुकान भी नहीं बना सकता।"
"तो तू दुकान मत बनाना," मैंने कहा। "तू मिट्टी खोद।"
टिंकू ने अपना मुँह खोला और फिर बंद कर लिया।
"अच्छा," वो बोला। "ये ठीक है। ये मेरे हिसाब से है।"
मैंने शेराज़ की तरफ़ देखा। वो अभी भी वहीं बैठा था, घुटनों के बल।
"तू अभी भी उसके लिए लड़ रहा है?" मैंने पूछा।
शेराज़ ने अपना सिर हिलाया। "नहीं।"
"तो फिर क्यों बताया?"
"क्योंकि," शेराज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "जब तूने मुझसे पूछा कि भैरव मेरे लिए क्या था, तो मुझे जवाब नहीं मिला। और जिसके पास जवाब न हो, वो उसके लिए नहीं लड़ सकता।"
वो उठा। धीरे-धीरे। उसका लंगड़ा पैर मिट्टी में धँस रहा था। वो सीधा खड़ा हुआ और मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुझे बता सकता हूँ कि वो अखाड़े की मिट्टी में ज़हर कैसे मिलाता है। मुझे तरीका पता है। मैंने बीस साल उसके लिए यही काम किया है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ अब वो ठंडक नहीं थी।
"क्यों?" मैंने पूछा। "तू हमारे साथ क्यों आएगा?"
शेराज़ ने अपनी कलाई देखी, जहाँ रस्सी के निशान थे। "क्योंकि मैं बीस साल से किसी और का आदमी रहा हूँ। अब मैं अपना आदमी बनना चाहता हूँ।"
मैंने एक पल सोचा। मेरे पीछे करण खड़ा था, उसकी बाँह पर टिंकू का सफ़ेद कपड़ा था और उसके चेहरे पर पसीना था। मीरा मेरे बगल में थी, उसका हाथ मेरे हाथ में। टिंकू टूटे लड्डू की आख़िरी टुकड़ी चबा रहा था।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू हमारे साथ चलेगा। पर एक बात साफ़ कर दूँ।"
"बोल।"
"अगर तूने एक बार भी हमारा रास्ता भटकाया, तो मैं तुझे उसी पेड़ से बाँधूँगा जिससे तूने खुद को छुड़ाया था। और उस बार रस्सी तेरी अपनी होगी।"
शेराज़ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसके होंठ हिले। वो मुस्कुराया नहीं। पर उसकी आँखों में कुछ बदला।
"समझ गया," वो बोला।
हम गड्ढे की तरफ़ बढ़े। अब शेराज़ भी हमारे साथ था — सबसे पीछे, सबसे धीमा, पर साथ।
गड्ढे का मुँह खुला था। उसके अंदर से ठंडी हवा आ रही थी। मैंने लालटेन उठाई और अंदर झाँका।
सीढ़ियाँ थीं। पत्थर की। नीचे जाती हुईं। और उन पर काई जमी थी।
"ये सुरंग कहाँ जाती है?" मैंने शेराज़ से पूछा।
"नीचे," उसने कहा। "सीधी। और फिर एक जगह आती है जहाँ तीन रास्ते बनते हैं। एक अखाड़े को, एक हवेली को, और एक…" वो रुका।
"और एक?"
"और एक उस जगह को," शेराज़ ने कहा, "जहाँ भैरव बोतलें रखता था। पानी वाला कुआँ।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"तो चल," मैंने कहा।
मैंने पहला कदम नीचे रखा। सीढ़ी ठंडी थी और पत्थर चिकना था। मेरा हाथ दीवार पर था और मेरी आँखें नीचे के अंधेरे पर।
मीरा मेरे पीछे आई। "वीर।"
"हाँ?"
"तेरी नाक।"
मैंने हाथ से अपनी नाक छुआ। खून सूख रहा था। बहना बंद हो गया था।
"ठीक है," मैंने कहा।
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