Spirit of a Fighter1209 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1209

7 min read November 5, 2026

करण मेरे पीछे आया। "क्या हुआ? क्या सुना तूने?"

"गुड़िया," मैंने कहा। "वो मना कर रही है।"

करण मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी आँखों में वो बात थी जो मैं खुद महसूस कर रहा था — डर। गुड़िया ने रोकर कहा था। ऐसे नहीं कहा जैसे कोई छोटी बहन भाई को डाँट रही हो। जैसे कोई किसी को गले लगाने से पहले ही रोक रहा हो।

टिंकू ने बाँस की तीली जैसी अपनी अंगुली मेरी बाँह पर रखी। "भाई, मैं तुझे एक बात कहूँ?"

"कह।"

"अगर वो मना कर रही है, तो मतलब वहाँ कुछ ऐसा है जो हमें नहीं दिख रहा। कुछ ऐसा जो उसे भी डरा रहा है।"

मैंने टीले के नीचे वाले गड्ढे की तरफ़ देखा। टूटा लकड़ी का दरवाज़ा पड़ा था उसके मुँह पर। उसके नीचे से हवा आ रही थी — ठंडी, गीली, और उसमें वो गंध थी जो मैंने अभी पकड़ी थी।

"वो मना कर रही है," मैंने कहा, "क्योंकि वो जानती है कि मैं आऊँगा।"

मीरा ने मेरी बाँह नहीं छोड़ी थी। "वीर, तेरी नाक से खून बह रहा है। तू दो कदम चलेगा और गिर जाएगा।"

"तो मैं घिसटकर जाऊँगा।"

"तू बात मत सुन रहा है।"

"मैं सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "मैं सब सुन रहा हूँ। पर मेरी माँ वहाँ है। और उसके आँचल में कपूर है और बादाम का तेल है। और ये दोनों मुझे बता रहे हैं कि वो ज़िंदा है।"

मीरा की आँखें चमकीं। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं बोली।

"क्या?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं," वो बोली। "मैं सोच रही थी कि तू इतना ज़िद्दी कैसे हो गया।"

"मैं ज़िद्दी नहीं हूँ।"

"ज़िद्दी है।"

"मैं तेरे लिए भी वैसे ही आऊँगा," मैंने कहा। "अभी भी।"

वो चुप हो गई।

हम गड्ढे की तरफ़ बढ़े। मैं पहले, करण मेरी बायीं तरफ़, टिंकू दायीं तरफ़। हरनाम अंजली को सहारा देकर पीछे चल रहा था। मीरा सबसे पीछे थी — और मुझे पता था वो पीछे इसलिए थी कि अगर हमारे ऊपर कोई पीछे से आए, तो वो पहले देख ले।

टूटे दरवाज़े को हटाने के लिए मैंने हाथ बढ़ाया। लकड़ी गली हुई थी, पकड़ते ही उँगलियों में लग गई। मैंने उसे खींचा।

और जैसे ही दरवाज़ा हटा, एक आवाज़ आई — फुर्र। जैसे कोई पक्षी पास से उड़ा हो।

मैंने पीछे छलाँग लगाई।

"क्या?" करण चिल्लाया।

"कुछ था," मैंने कहा। "अंदर। झपटा।"

मैंने गड्ढे के अंधेरे में देखा। धूल थी। मिट्टी थी। और फिर — दो चमकीली आँखें।

और फिर जो अंदर से निकला, वो मुझे अच्छी तरह से पता था।

शेराज़।

उसके हाथ में छुरी थी। जो उसने बबूल के पेड़ से रस्सी तोड़कर हासिल की थी। उसकी आँखें लाल थीं, उसके होंठ फटे हुए थे, और उसकी धोती पर खून के छींटे थे — अपने ही हाथों के कटने से।

"तूने मुझे पेड़ से बाँधा," वो बोला। "पेड़ से, वीर सिंह। किसी कुत्ते को बाँधते हैं।"

"तू कुत्ता नहीं है," मैंने कहा। "कुत्ता वफ़ादार होता है।"

वो मेरी तरफ़ झपटा।

पर वो मुझ तक नहीं पहुँचा।

करण बीच में आ गया।

और छुरी उसकी बाँह पर चली गई।

मैंने वो आवाज़ सुनी — चट। जैसे कोई कच्चा फल काटा हो। और फिर करण की आवाज़। एक गहरी फूँक जो उसके मुँह से निकली और उसके होंठ बंद हो गए।

खून उसकी बाँह से बहना शुरू हुआ। लाल, गाढ़ा, तेज़। उसकी कुर्ता का आस्तीन एक ही पल में भीग गया।

पर करण पीछे नहीं हटा।

वो खड़ा रहा। उसकी आँखें शेराज़ पर टिकी थीं और उसकी छाती फूल रही थी।

"तूने ग़लत आदमी को मारा," करण बोला। "तुझे वीर को मारना था न? मैं तो भैरव का बेटा हूँ। मुझे क्यों मारा?"

शेराज़ एक पल के लिए रुक गया। उसकी छुरी की नोक पर खून टपक रहा था। उसकी आँखों में कुछ बदला।

"मैंने तुझे नहीं मारा," वो बोला। "तू बीच में आया।"

"हाँ," करण ने कहा। "मैं आया।"

और मैंने वो पल इस्तेमाल किया।

मैं उसकी छुरी वाली कलाई पर झपटा। उसकी हड्डी दबाई। वो कराहा और उसकी उँगलियाँ खुलीं। छुरी गिरी और मिट्टी में धँस गई।

मैंने उसे पकड़कर दीवार से टिका दिया। मेरा हाथ उसकी गर्दन पर था और मेरी साँस उसके चेहरे पर। वो ज़ोर लगाकर छुड़ाने की कोशिश कर रहा था, पर मैंने उसे कसकर पकड़ा।

और फिर मैंने उसके कान के बिल्कुल पास, इतना धीरे कि बाहर से कोई न सुन सके, कहा —

"तू बीस साल भैरव के लिए लड़ा। अब बता, भैरव तेरे लिए क्या था?"

शेराज़ रुक गया।

उसका शरीर मेरे हाथों में जकड़ा हुआ था, पर उसकी साँस अचानक धीमी हो गई। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं — और उनमें कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर नहीं। गुस्सा नहीं। कुछ और।

"क्या फ़र्क़ पड़ता है?" वो बोला। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।

"मुझे पड़ता है," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने तुझे सुना है। तू कभी किसी के लिए नहीं लड़ा। तू हमेशा भैरव के लिए लड़ा। और भैरव तेरे लिए क्या था?"

शेराज़ की आँखें भर आईं।

वो नहीं रोया। शेराज़ जैसा आदमी नहीं रोता। पर उसकी आँखों में पानी आ गया और उसने मुँह फेर लिया।

"उसने मुझे सड़क से उठाया था," वो बोला। "मैं पाँच साल का था। मेरी माँ मर गई थी और मेरा बाप मुझे छोड़कर चला गया था। मैं कूड़े के ढेर पर सो रहा था। उसने मुझे उठाया। मुझे खाना दिया। मुझे नाम दिया।"

"और तूने कभी सोचा," मैंने कहा, "कि वो तुझे क्यों उठा लाया?"

शेराज़ मेरी तरफ़ देखने लगा।

"सोचा था," वो बोला। "बहुत सोचा। पर जब आदमी भूखा होता है, तो सवाल नहीं पूछता। बस हाथ पकड़ लेता है।"

मेरे हाथ ढीले पड़े। मैंने उसे नहीं छोड़ा, पर मेरी पकड़ में वो ज़ोर नहीं रहा।

"मैंने कभी सोचा नहीं," शेराज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "कि मैं किसके लिए लड़ रहा हूँ।"

वो मेरे सामने खड़ा था, पर वो अब वही शेराज़ नहीं था। लंगड़ा शेराज़। मशाल लेकर आने वाला शेराज़। माँ को बैलगाड़ी में उठाने वाला शेराज़।

पर एक और भी शेराज़ था। वो जो पाँच साल का था और कूड़े के ढेर पर सोता था।

मैं उसे और नहीं पकड़ना चाहता था।

मैंने हाथ छोड़ दिया।

शेराज़ दीवार से सरककर नीचे बैठ गया। उसने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया।

पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। "करण! बैठ!"

मैं पलटा।

करण नीचे बैठने ही वाला था। उसकी बाँह से खून बह रहा था और उसका चेहरा पीला पड़ रहा था। वो अपने पैरों पर खड़ा नहीं रह पा रहा था।

टिंकू दौड़कर उसके पास गया। उसने अपनी जेब से एक साफ़ कपड़ा निकाला — सफ़ेद, मुलायम, जिस पर मिठाई की चाशनी के हल्के निशान थे। वो उसे करण की बाँह पर बाँधने लगा।

"तू ठीक है," टिंकू बोला। "तेरी बाँह में जान है। देख, खून बह रहा है मतलब खून चल रहा है। बंद नहीं हुआ।"

करण ने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले। "ये क्या बकवास है?"

"बकवास नहीं है," टिंकू ने कहा और कपड़ा कसकर बाँधा। "ये मेरी दुकान का सबसे साफ़ कपड़ा है। इस पर सिर्फ़ शक्कर लगी है। शक्कर घाव नहीं देखती, वो सिर्फ़ मीठी होती है।"

करण कराहा। पर फिर वो हँसा।

पहली बार।

वो छोटी-सी हँसी, जो दर्द के बीच से निकली, मेरे कानों में गूँज गई।

मीरा दौड़कर आई। उसने अपना बैग खोला और अंदर से एक छोटी शीशी निकाली — हरी, जिसमें तुलसी और अदरक का काढ़ा था। उसने टिंकू के कपड़े के ऊपर से करण की बाँह पर हल्के हाथ से दबाया।

"देखने दे," वो बोली। "छुरी चलती ऊँगली से मिली है। गहरी नहीं है। पर हड्डी तक पहुँची है।"

"कैसे पता?" करण ने पूछा।

"क्योंकि तेरा हाथ काँप रहा है," मीरा ने कहा। "और तेरी उँगलियाँ अभी तक हिल रही हैं। मतलब नस नहीं कटी।"

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