Spirit of a Fighter1208 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1208

7 min read November 5, 2026

"तूने गुड़िया से क्या कहा?"

"मैंने कुछ नहीं कहा। उसने कहा। मैंने तो बस उसे एक कोने में बिठाकर उसकी गिनती करवाई। और वो रो-रोकर सब बता गई। कहाँ रहते हो, माँ क्या करती है, भैया कब आते हैं, भैया को क्या अच्छा लगता है…" वो हँसा। "तेरी बहन को लगता है कि तू उसे बचाने आएगा। मैंने उसे कहा भी — तेरा भैया तो खुद मरने आएगा।"

मैंने अपनी आँखें बंद कीं। गुड़िया का चेहरा आया — स्कूल की कॉपी लिए, चोटी हिलाती हुई, कहती हुई "भैया तुम उन सबको पछाड़ दोगे, मुझे पता है।"

और फिर मैंने आँखें खोलीं। मैंने शेराज़ की तरफ़ देखा और मेरी आवाज़ बिलकुल सपाट निकली।

"तूने मेरी बहन से जो कहा, वो तेरे मुँह से निकला। अब मेरी बात सुन। तेरा भैरव जेल में है। तेरा उस्ताद पकड़ा गया। तेरे पास कुछ नहीं बचा — न पैसा, न आदमी, न सरकार। बस एक छुरी और एक लंगड़ी टाँग।"

उसकी हँसी मिट गई।

"मैं तेरा पीछा नहीं करूँगा," मैंने कहा। "मैं तुझे मारूँगा नहीं।" मैंने एक कदम आगे रखा। "मैं तुझे ज़िंदा छोड़ूँगा। और ज़िंदा छोड़कर उसी पंचायत के सामने खड़ा करूँगा जो तेरे सारे काग़ज़ पढ़ चुकी है। तू वहाँ खड़ा होगा, और तेरे ही शब्द तेरे मुँह से सब सुनेंगे।"

शेराज़ का चेहरा बदला। कुछ पल वो हिला नहीं। और फिर उसने छुरी उठाई और दौड़ पड़ा।

मैंने उसे आने दिया।

वो जैसे ही मेरे करीब पहुँचा, मैंने अपनी बाईं तरफ़ झुककर उसकी कलाई पकड़ी। छुरी वाला हाथ। मैंने उसे मरोड़ा। उसकी उँगलियाँ खुलीं और छुरी गिरी। पर वो गिरा नहीं। वो मेरी कमर में अपना घुटना मारकर मुझे गिराने लगा। उसका वज़न भारी था और मेरी कमर अभी भी नाले में ठंडी थी।

हम दोनों ज़मीन पर गिरे। मेरी पीठ मिट्टी से टकराई। उसने मेरा गला पकड़ा। मैंने उसकी कलाई पर दोनों हाथ रखे। मेरी हथेलियों की खुली चमड़ी पर उसकी उँगलियाँ दब रही थीं और जलन आँखों के पीछे तक चली जा रही थी।

"तेरी माँ भी यहीं है," वो मेरे चेहरे पर चिल्लाया। "पता है कहाँ? उस जगह जहाँ से भवानी की हड्डियाँ गई थीं। जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता।"

मेरी छाती में हवा रुक गई।

"क्या कहा?"

"तू सब जानता है। फिर भी पूछता है। तेरी माँ और बहन — दोनों वहीं हैं। और वो जगह अब बंद हो रही है। सुबह तक कुछ नहीं बचेगा।"

और फिर उसके हाथ ढीले पड़ गए।

क्यों? मुझे समझ नहीं आया। उसने मेरा गला क्यों छोड़ा?

मैंने पलकें उठाईं और देखा — करण उसके पीछे खड़ा था, हाथ में ईंट। उसने शेराज़ के सिर के पीछे वार किया था। शेराज़ लड़खड़ाया, मेरे ऊपर गिरा और फिर एक तरफ़ लुढ़क गया।

करण ने ईंट गिराई और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

मैंने उसका हाथ पकड़ा और उठा।

"मैंने कहा था न," करण ने हाँफते हुए कहा। "मैं अपने बाप के पाप का बोझ… नहीं, अपना हाथ उठाकर दिखाऊँगा। ये मेरा हाथ है।"

मैं उसके कंधे पर हाथ रखकर खड़ा हुआ। मेरी साँस फूल रही थी। मेरी कमर में दर्द था। मेरी हथेलियों से खून बह रहा था। पर मैं खड़ा था।

टिंकू ने शेराज़ की छुरी उठाई और अपनी जेब से रस्सी निकाली — उसी दुकान की रस्सी जो वो हर दिन मिठाई के डिब्बे बाँधने के लिए रखता था।

"ये बीस साल से भैरव की चाकरी कर रहा है," वो बोला। "अब थोड़ी देर मेरी चाकरी करे।"

उसने शेराज़ के हाथ-पैर बाँधे। हरनाम काँपते हुए पास आया। उसने शेराज़ के चेहरे पर पानी डाला। शेराज़ की आँखें खुलीं। वो हमें देखकर हँसा — कमज़ोर, फटी हुई हँसी।

"बाँध लिया?" वो बोला। "बाँध लिया, तो अब जाकर देख अपनी माँ को। सुबह तक जो बचेगा।"

मैंने उसके सामने घुटने टेके। मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया।

"कौन सी जगह?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो मेरे अंदर सबसे गहरे से आ रही थी। "बोल।"

"तू सूँघता है न?" वो बोला। "सूँघ ले। तेरी माँ की गंध… और भवानी की हड्डियों की गंध… दोनों एक ही रास्ते से जाती हैं।"

उसने अपनी आँखों से ऊपर की तरफ़ इशारा किया। बबूल के पेड़ों के पीछे, टीले की तरफ़।

और मैंने सूँघा।

मेरी नाक से खून बह रहा था। मेरी आँखों के आगे अंधेरा घूम रहा था। पर मैंने सूँघा।

और वो आई। हल्की, बहुत हल्की, पर थी। कपूर। गीली मिट्टी। और उसके नीचे — बादाम का तेल। वही जो माँ के आँचल में था। वही जो कपूर के तोड़ में था। वही जो उस रात मौजूद था जब भवानी मरा था।

मैंने आँखें खोलीं। मेरा सिर भारी था। मेरी नाक से खून टपककर मेरी कमीज़ पर लग रहा था।

"मिली?" करण ने पूछा।

मैंने सिर हिलाया। "टीले के पार। उसी सुरंग की दूसरी तरफ़।"

मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। "वीर, तू अभी और नहीं सूँघ सकता। तेरी नाक—"

"मेरी माँ वहाँ है," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ टूट गई। "मेरी माँ और मेरी बहन। और मैं यहाँ खड़ा हूँ।"

मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। "मैंने कहा नहीं, मैंने ये नहीं कहा कि तू अकेले जाएगा।"

टिंकू ने शेराज़ के हाथ में रस्सी को एक बबूल के पेड़ से बाँध दिया और हमारी तरफ़ पलटा। उसकी कुर्ता अब घुटनों तक ही थी, और उसकी टोपी कहीं गिर गई थी।

"मैं साथ चलूँगा," वो बोला। "पर एक बात पहले।"

"क्या?"

उसने अपनी जेब से एक टूटा हुआ लड्डू निकाला। नाले में भीगा हुआ, चपटा हो चुका, पर लड्डू था।

"अंजली को खिला दूँ? बेहोश फिर रही है। शक्कर है, थोड़ी जान आएगी।"

अंजली ने आँखें खोलीं। उसने लड्डू देखा और उसके होंठ हिले। "ये क्या है?"

"मेरी दुकान का माल है," टिंकू ने गर्व से कहा। "टिंकू मिष्ठान भंडार। भले ही अभी शेड है, पर नाम है।"

उसने लड्डू का एक टुकड़ा अंजली के मुँह में रखा। वो धीरे-धीरे चबाने लगी। और फिर उसके चेहरे पर थोड़ी रौनक लौटी।

"मीठा है," वो फुसफुसाई।

"बिलकुल मीठा है," टिंकू बोला। "मैंने बनाया है। अब चल, तुझे तेरे बाबा के पास ले चलते हैं।"

"लेकिन मेरे बाबा—"

"तेरे बाबा ने जो किया, उसका हिसाब वो देगा। तू बस चल।"

हम टीले की तरफ़ चले। मेरे पैर नंगे थे — चप्पलें नाले में छूट गई थीं। मिट्टी ठंडी थी और उसमें काँटे थे। पर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। मेरी आँखें सिर्फ़ उस दिशा में थीं जहाँ से वो गंध आ रही थी।

कपूर। गीली मिट्टी। बादाम का तेल।

मैंने एक गहरी साँस ली। मेरी छाती जल रही थी, मेरी नाक से खून बह रहा था, मेरी हथेलियों की चमड़ी उतर चुकी थी और मेरी कमर में वो दर्द था जो शायद महीने तक रहने वाला था।

पर मैं चल रहा था। मेरी माँ और बहन वहाँ थीं। और मैं चल रहा था।

टीले के ऊपर पहुँचकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। नीचे गोदाम जल रहा था। लपटें पीपल के पेड़ की ऊँचाई तक पहुँच रही थीं और उनकी रोशनी में पूरा मैदान लाल दिख रहा था। हमारे पीछे, बबूल के पेड़ से बँधा शेराज़ अपनी रस्सी से जूझ रहा था।

और उसी रोशनी में, टीले की दूसरी तरफ़, मुझे दिखा — एक पुरानी, ढहती दीवार, जिसका एक हिस्सा पहले ही गिर चुका था। उसके पीछे एक गड्ढा था, जिसके मुँह पर लकड़ी का टूटा दरवाज़ा पड़ा था।

हवा ने वहाँ से गंध का एक झोंका लाकर मेरे चेहरे पर मारा।

और फिर मैंने वो सुना। बहुत धीमा। बहुत दूर से।

गुड़िया की आवाज़।

"भैया… मत आना…"

॥

गुड़िया की आवाज़ हवा में घुल गई, और मेरे पैर जैसे मिट्टी में धँस गए।

"भैया… मत आना…"

मैंने उसकी आवाज़ को पकड़ना चाहा, पर वो फिसल गई। जैसे किसी ने पानी में पत्थर फेंका हो और फिर पूरा तालाब सन्न हो गया हो।

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