Spirit of a Fighter – Chapter 1207
धमाका हुआ। मिट्टी का फ़र्श वहाँ से टूटा। एक फुट गहरा गड्ढा। फिर दो फुट। नीचे अंधेरा था, और उस अंधेरे से ठंडी हवा का एक झोंका ऊपर आया। मेरे चेहरे पर लगा, और मुझे लगा जैसे किसी ने मुझे मुर्दों की ज़मीन से ज़िंदा लौटा दिया हो।
"रास्ता है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई। "भाई, रास्ता है!"
करण ने पत्थर उठाया और फिर दे मारा। फिर दे मारा। हर चोट पर मिट्टी उड़ती और गड्ढा गहरा होता। मेरे हाथ फट चुके थे। हथेली की चमड़ी लटक रही थी और उसके नीचे से खून की पतली लकीरें बह रही थीं। करण के हाथों की हालत भी वैसी ही थी। उसकी बाईं हथेली पर एक गहरा चीरा था, और खून उसकी कलाई तक बहकर उसकी कमीज़ पर लग रहा था।
"करण," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी। "तेरा हाथ।"
उसने नीचे देखा, फिर मेरी तरफ़। "मेरे बाप ने जिन हाथों से ज़हर घोला, उन्हीं हाथों का खून बहे तो क्या फ़र्क़ पड़ता है।"
मैंने उसकी कलाई पकड़ी। "रुक।"
"वीर—"
"मैंने कहा रुक।"
वो रुका। उसकी छाती तेज़ उठ-गिर रही थी। पसीना उसके माथे से आँखों में जा रहा था और वो पलक नहीं झपका रहा था।
मैंने उसकी आँखों में देखा और फिर वो बात कही जो मेरे दिल में आई थी, बिना सोचे।
"तू अपने बाप का बोझ नहीं उठा रहा। तू अपना हाथ उठा रहा है। फ़र्क़ समझ?"
उसके होंठ काँपे। कुछ देर वो कुछ नहीं बोला। फिर उसने अपनी नज़र नीचे की और अपना हाथ मेरी पकड़ से छुड़ाकर फिर पत्थर पर रख दिया।
"समझ गया," वो बोला। "अब छोड़।"
हमने फिर मारा। फिर मारा। और फिर एक आवाज़ आई — चटक। पत्थर फ़र्श की आख़िरी परत को तोड़कर नीचे गिरा। और उसके पीछे पानी की आवाज़ आई। बहता पानी। गहरा, ठंडा, बहुत पुराना।
टिंकू दौड़कर आया और उसने गड्ढे में झाँका। "दो-तीन फुट गहरा है, भाई। बहुत ज़्यादा नहीं। और पानी… पानी घुटनों तक है।"
मैंने अंजली की तरफ़ देखा। करण की गोद में उसका सिर झूल रहा था। उसकी आँखें बंद थीं और उसके होंठ नीले पड़ रहे थे।
"टिंकू," मैंने कहा। "अपनी कुर्ता फाड़।"
टिंकू ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने अपनी कुर्ता का नीचे का हिस्सा पकड़ा और ज़ोर से खींचा। कपड़ा फटा। उसने उस कपड़े को मोड़ा, पानी में डुबोया… नहीं, पानी तक पहुँचने से पहले ही मैंने उसे रोका।
"पहले उसके मुँह पर। सूखा। ताकि धुआँ अंदर न जाए। फिर गीला करके माथे पर रखना।"
टिंकू ने कपड़ा अंजली के मुँह पर बाँधा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसने गाँठ ऐसी कसी कि कपड़ा वहीं टिका रहे। फिर उसने दूसरा टुकड़ा नाले के पानी में डुबोया और उसे निचोड़कर अंजली के माथे पर रखा। पानी उसके चेहरे से बहकर गिरने लगा।
अंजली ने एक गहरी साँस ली। उसकी आँखें धीरे से खुलीं।
"बाबा…" वो फुसफुसाई।
"तेरे बाबा नहीं," टिंकू ने धीरे से कहा। "हम हैं। हम तुझे घर ले चल रहे हैं। बस थोड़ा सा ओर।"
"मुझे… मुझे नींद आ रही है।"
"नींद मत आने देना," मैंने कहा। मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। "मेरी तरफ़ देख। मेरी आँखों में देख। बता, तेरी माँ का नाम क्या है?"
उसके होंठ हिले। "शांति।"
"और तेरे घर के बाहर कौन सा पेड़ है?"
"आम का।"
"उस पर आम लगते हैं?"
"हाँ। बहुत मीठे। पापा कहते हैं… पापा कहते हैं कि उन्होंने वो पेड़ मेरे जन्म पर लगाया था।"
उसकी आवाज़ टूटी। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा, और फिर करण की तरफ़ देखा।
"अब।"
करण ने पहले अंजली को नाले में उतारा। टिंकू नीचे उतरा। फिर हरनाम। हरनाम उतरते वक़्त फिसला और उसका घुटना पत्थर से टकराया, पर वो चीखा नहीं। उसने बस साँस रोकी और आगे बढ़ गया।
मैं आख़िर में उतरा। पानी मेरे घुटनों तक आया और उसकी ठंडक ने मेरी हड्डियों तक पहुँचकर मुझे झिंझोड़ दिया। ऊपर धुआँ घना हो रहा था। आग की लपटें गोदाम की छत को चाटने लगी थीं। हमारे ऊपर से चीनी की बोरियाँ जलकर गिर रही थीं और उनकी गंध — मीठी, भारी, चिपचिपी — धुएँ में घुलकर एक अजीब सी महक बन रही थी।
नाला गोदाम के नीचे से होकर बहता था। दोनों तरफ़ ईंटों की पुरानी दीवारें थीं, जिन पर काई की मोटी परत जमी थी। कहीं-कहीं दीवार टूटी हुई थी और उसके पीछे मिट्टी दिख रही थी। पानी घुटनों तक था, पर आगे बढ़ने पर वो कम भी होता जा रहा था और ज़्यादा भी। कुछ जगहों पर र्फ़ पानी था और कुछ जगहों पर पानी बहुत गहरा — जहाँ मेरी कमर तक आ रहा था।
"रोशनी," करण ने कहा। "देखो।"
दूर, नाले के आख़िर में, एक हल्की सी रोशनी दिख रही थी। रात की हवा। चाँद की रोशनी। मैंने अपने कदम तेज़ किए। पानी में चलने की आवाज़ बड़ी अजीब लग रही थी — चप-चप, चप-चप — और मेरे फटे हाथ की हथेली में जलन हो रही थी।
हम नाले के मुँह के पास पहुँचे। वो एक झाड़ी से ढका हुआ था, और बाहर खुलने पर एक नीची दीवार थी जिसके पीछे बबूल के पेड़ों की कतार थी।
टिंकू पहले बाहर निकला। फिर करण अंजली के साथ। फिर हरनाम। फिर मैं।
बाहर की हवा ने मेरे फेफड़ों में घुसते ही मुझे चक्कर आ गया। मैंने आँखें बंद कीं और दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया। मेरी छाती जल रही थी। मेरी नाक से पानी बह रहा था। और मेरे हाथ — मैंने उन्हें उठाकर देखा। दोनों हथेलियों की चमड़ी उतर चुकी थी। खून सूखकर काला पड़ रहा था। और उँगलियाँ — उँगलियाँ हिल रही थीं, पर जैसे किसी और की हों।
"साँस ले," मीरा की आवाज़ मेरे कानों में आई। मैंने पलटकर देखा। वो हमारे पीछे-पीछे नाले से निकली थी — मुझे पता ही नहीं चला कि वो कब उतरी। उसके बाल गीले थे और उसकी कुर्ता पर काई लगी थी। उसके हाथ में अदरक-तुलसी की हरी शीशी थी।
"तेरे हाथ," वो बोली। और उसकी आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी अदालत में होती थी। कुछ और थी — नरम, और काँपती हुई।
"पहले अंजली," मैंने कहा।
"अंजली ठीक है। टिंकू उसके पास है। तेरे हाथ दे।"
मैंने हाथ बढ़ाए। वो शीशी खोलकर उसका काढ़ा मेरी हथेलियों पर डालने लगी। जलन हुई, फिर ठंडक। मेरी आँखें भर आईं, और मैंने उन्हें छुपाने के लिए सिर नीचा कर लिया।
और उसी पल — आवाज़ आई।
"मैंने सोचा था तुम जल जाओगे।"
हम सब एक साथ पलटे।
बबूल के पेड़ों की कतार के बीच से वो निकलकर आया। शेराज़। उसके हाथ में छुरी थी, और उसकी लंगड़ी टाँग उसे हर कदम पर एक तरफ़ झुका दे रही थी, पर वो फिर भी सीधा हमारी तरफ़ आ रहा था। उसके चेहरे पर वो हँसी थी जो गोदाम के बाहर से आई थी। उसकी आँखों में आग की लपटों का अक्स था।
"पर कोई बात नहीं," उसने कहा और छुरी को अपनी उँगलियों में घुमाया। "छुरी का भी अपना मज़ा है। जलने में जो तकलीफ़ है, वो देर तक रहती है। छुरी में सिर्फ़ एक झटका। पर वो झटका… वो झटका याद रहता है।"
करण ने अंजली को टिंकू की तरफ़ धकेला और आगे आ गया। उसका डंडा नाले में छूट गया था। उसके हाथ खाली थे। पर उसने अपनी मुट्ठियाँ बाँध लीं।
"तू अकेला है," करण ने कहा।
"अकेला?" शेराज़ हँसा। "बेटा, मैं अकेला नहीं हूँ। मैं बीस साल से अकेला हूँ, और उस अकेलेपन में मैंने एक चीज़ सीखी है। तुम सब मिलकर भी मेरे एक हाथ के बराबर नहीं हो।"
वो आगे बढ़ा। उसकी टाँग उसे झटका दे रही थी, पर वो रुका नहीं। उसने छुरी सीधी मेरी तरफ़ की।
"तेरी बहन ने मुझे तेरे बारे में बहुत कुछ बताया, भवानी के बेटे," वो बोला। "कहती थी — भैया आएँगे तो तुझे ऐसा मारेंगे कि तेरी लंगड़ी टाँग भी सीधी हो जाएगी।"
मेरे अंदर कुछ जम गया। ठंडा, सख़्त, और बहुत शांत।
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