Spirit of a Fighter – Chapter 1206
मीरा भी हँसी। करण ने अपना सिर झुकाया, पर उसके कंधे हिल रहे थे।
और तभी — उसी हँसी के बीच — मेरी नाक में एक नई गंध आई।
मैं एक झटके में सीधा खड़ा हो गया। मेरी हँसी मर गई।
"वीर?" मीरा ने कहा।
मैंने पूरब की तरफ़ देखा। वहाँ, जलते गोदाम की रोशनी से परे, अंधेरे में कुछ था। कोई खड़ा था। और उसके कपड़ों से एक गंध आ रही थी — पुरानी, परिचित, और बहुत दूर की नहीं।
"भैरव की गंध," मैंने धीरे कहा।
"क्या?" करण ने कहा, और उसका शरीर एक झटके में तन गया।
"ये गंध उसकी है। पर…" मैंने गहरी साँस ली।
वो गंध गोदाम की जलती लकड़ी और कोयले के धुएँ के बीच से आ रही थी, पर उसमें मिट्टी का तेल नहीं था। उसमें कुछ और था — सूखी लौंग, और पुराना चंदन। मैंने आँखें मूँदकर सूँघा। पास में कोई नहीं था। पर खड़ा था। दूर, पीपल के पेड़ के नीचे, अंधेरे में। सिर्फ़ एक साया। और वो साया हिल नहीं रहा था। वो मुझे देख रहा था।
"कौन?" करण ने पूछा, उसकी आवाज़ दबी हुई थी।
"कोई है," मैंने कहा। "पर वो भैरव नहीं। भैरव की गंध में धुआँ है। इसकी गंध में चंदन है।"
"तो कौन?"
मैंने मुट्ठी बाँधी। "जिसकी गंध मैंने तेरह साल की उम्र में सुनी थी। और फिर कभी नहीं।"
साया पलटा और अंधेरे में घुल गया। मैंने भागने की कोशिश नहीं की। मेरा पूरा ध्यान अभी गोदाम में था।
"अंजली," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ने मुझे खुद चौंका दिया। "पहले वो।"
हम तीनों गोदाम की तरफ़ लपके। आग पीछे की दीवार तक पहुँच रही थी, पर सामने का हिस्सा अभी बचा था। अंदर घुसे तो धुआँ आँखों में चुभा। गंध — कोयला, तेल, और उसके बीच कहीं एक पतली-सी साँस। मैंने फेफड़ों में हवा भरी और सूँघा। दो लोग। एक के हाथ में लोहा — गर्मी में पसीना और ज़ंग। दूसरे के हाथ में मिट्टी का तेल — तेज़, चुभने वाली, गले में अटकने वाली बदबू।
"छत के नीचे, पीछे," मैंने फुसफुसाया। "दोनों वहीं हैं।"
करण ने अपना डंडा उठाया। टिंकू ने भी। टिंकू का हाथ काँप रहा था, पर लोहे की डंडी उसकी पकड़ में कसी हुई थी।
"भाई," टिंकू ने फुसफुसाया, "मैं मिठाई वाला हूँ। मुझे मार-पीट में मत घसीटना।"
"फिर तू यहाँ क्यों है?"
"क्योंकि मिठाई वाले की भी एक इज़्ज़त होती है।"
पीछे एक कोने में अंजली बँधी बैठी थी। रस्सी उसके हाथ-पैर पर, और मुँह पर कपड़ा। उसकी आँखें डर से फैली हुई थीं, और साँस टूटी हुई। मैंने दो कदम बढ़ाए। तभी एक आदमी सामने आया — हाथ में लोहे का डंडा, चेहरे पर कालिख, और आँखों में वो खालीपन जो सिर्फ़ पैसे के लिए काम करने वालों में होता है। दूसरा उसके पीछे था, हाथ में कैन।
करण आगे बढ़ा। "आज मेरे पिता का नाम मेरे मुँह से नहीं निकलेगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में जो कुछ था, वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था — शायद शुरुआत। "जब तक मैं इसके साथ हूँ, ये लोग मेरा नाम भी नहीं जानेंगे।"
टकराव शोर में बदल गया। लोहे की चोट, और फिर एक धक्का। करण और टिंकू ने उन दोनों को सँभाला। मैं अंजली के पास पहुँचा। घुटनों के बल बैठकर उसके मुँह का कपड़ा खोला। वो फूट-फूटकर रोई। उसकी साँस अटक रही थी, होंठ सूखे थे।
"मेरे पापा ने जो किया, उसकी सज़ा मुझे क्यों?" वो रोई। "मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था?"
मेरे हाथ रस्सी पर रुक गए। कुछ देर मैंने उसकी आँखों में देखा। फिर रस्सी खोलते हुए कहा, "तेरे पापा की सज़ा तेरे पापा को मिलेगी। तू बेकसूर है।"
वो मेरे कंधे पर सिर रखकर रोने लगी। मैंने उसे गोद में उठाया। मेरे हाथों में उसका वज़न बहुत हल्का था — जैसे डर ने उसका कुछ हिस्सा खा लिया हो।
पर तभी, गोदाम के बाहर से एक आवाज़ आई। आग की लपटें दूर, पीपल के पेड़ तक फैल रही थीं। और उसी रोशनी में एक आदमी खड़ा था — मुँह फाड़कर हँसता हुआ।
"भैरव सर ने कहा था — बचाने आए तो साबित करके जाओ!" उसने चिल्लाया। "अंदर से निकले, तो बाहर का रास्ता भी जलता मिलेगा!"
॥
वो हँसी गोदाम के बाहर से आ रही थी, पर उसकी गूँज अंदर दीवारों से टकराकर मेरे कानों में घुस रही थी। मैंने अंजली को अपनी बाँहों में कस लिया। उसका शरीर छोटा था, पर उसकी साँसें बड़ी भारी चल रही थीं।
"भैया, खिड़की!" टिंकू चिल्लाया।
वो दीवार की तरफ़ लपका जहाँ धुएँ के बीच एक झिरी दिख रही थी। उसने दोनों हाथों से लोहे की छड़ें पकड़ीं और ज़ोर लगाया। छड़ें हिलीं तक नहीं। उसने फिर खींचा। फिर। उसकी कुर्ता पीठ से चिपक गई थी, पसीने से। और छड़ें वहीं की वहीं।
"बंद हैं," वो हाँफते हुए बोला। "पूरी तरह बंद। बाहर से किसी ने कुछ ठोक दिया है, देखो — कील के निशान हैं।"
करण ने एक और खिड़की की तरफ़ दौड़ लगाई, फिर दूसरी, फिर तीसरी। हर जगह वही। छड़ें, कीलें, और बाहर से बंदा हुआ लोहा।
"चारों तरफ़ आग है," हरनाम ने कहा। वो गोदाम के एक कोने में दुबका बैठा था, उसके चश्मे का एक शीशा टूटा हुआ था और होंठ काँप रहे थे। "हम यहाँ मरेंगे। मैंने कहा था न, मुझे इस काम में मत घसीटो। मैं तो बस अपनी बच्ची को…"
"चुप करो!" मैंने कहा। मेरी आवाज़ सख़्त निकली, और मुझे खुद अचरज हुआ कि इतनी सख़्ती कहाँ से आई।
मैंने अंजली को करण की बाँहों में दिया। "इसे सँभालो।"
फिर मैंने आँखें बंद कीं।
धुआँ मेरी नाक में घुस रहा था — जलता हुआ कोयला, तेल, गीली लकड़ी। पर मैंने उसे पीछे धकेला। मैंने अपनी पूरी ताकत उस एक चीज़ पर लगाई जो मुझे पता थी कि काम करेगी। मैंने नीचे देखा। फ़र्श। मिट्टी का फ़र्श, जिस पर बीस साल की धूल जमी थी।
और फिर मैंने सूँघा।
मेरी नाक के अंदर एक झुनझुनी दौड़ी, फिर दर्द। सिर के पीछे एक तार खिंचा। मैंने दाँत भींचे। धुएँ के नीचे, धूल के नीचे, फ़र्श की सीलन के नीचे — वहाँ कुछ था। ठंडी, काई वाली, बहती हुई पानी की बदबू। बहुत पुरानी। बहुत गहरी।
"यहाँ नीचे कुछ है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी हुई थी। "पानी। बहता पानी।"
करण ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या मतलब?"
"गोदाम के नीचे से एक नाला गुज़रता है। पुराना है। बहुत पुराना। मुझे उसकी गंध आ रही है — काई, गीली मिट्टी, और वो लोहे का स्वाद जो बहते पानी में होता है।"
"तो फिर फ़र्श तोड़ना होगा," करण ने कहा।
टिंकू ने चारों तरफ़ देखा। "किससे? हमारे पास कुछ नहीं है।"
मेरी नज़र गोदाम के उस कोने पर पड़ी जहाँ लकड़ी के बक्से पड़े थे — पुरानी चीनी की बोरियाँ, टूटी पेटियाँ। और उनके पीछे, दीवार से टिका हुआ, एक भारी पत्थर। चक्की का पाट। आधा टूटा हुआ, पर इतना भारी कि उसे उठाने के लिए दो आदमी लगें।
"वो," मैंने उँगली से दिखाया।
करण मेरी तरफ़ देखकर समझ गया। हम दोनों एक साथ उस पत्थर के पास पहुँचे। पकड़ने की जगह नहीं थी। हमने किनारों से उँगलियाँ अंदर कीं। पत्थर की सतह खुरदरी थी, और उसमें जो ठंडक थी, वो आग की गर्मी में भी बनी हुई थी।
"उठा," मैंने कहा।
हमने ज़ोर लगाया। पत्थर ज़मीन से उखड़ा, पर हमारी पकड़ से फिसल गया और टिंकू के पैर के पास गिरा। उसकी एक उँगली सनसनाई। मेरी हथेली की चमड़ी वहीं रह गई — पत्थर पर एक लाल निशान।
"फिर से," करण ने कहा। उसकी आवाज़ में थकान नहीं थी। कुछ और था। ज़िद।
हमने फिर उठाया। इस बार मैंने अपनी बाँहों के सारे ज़ोर को उस पल में झोंक दिया। पसलियों में दर्द उठा। मेरी कमर की हड्डी चरमराई। पर पत्थर ऊपर आया। और फिर हमने उसे फ़र्श पर दे मारा।
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