Spirit of a Fighter – Chapter 1205
मैंने पलटकर देखा। करण शेराज़ को पकड़े खड़ा था और उसके चेहरे पर पसीना चमक रहा था। मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी — उसकी आँखों में सवाल था और डर भी, पर उसका डर मुझसे छुपा नहीं रहा। वो मुझे देख रही थी, ऐसे जैसे मेरे चेहरे पर जवाब ढूँढ रही हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। आग आ रही थी, पर अभी हमारे और आग के बीच में कोयले के चार बड़े ढेर थे। और ऊपर, टीन की छत में, वो छेद — चाँद की रोशनी के उजले टुकड़े।
"छत," मैंने कहा।
"क्या?" टिंकू ने कहा।
"छत में छेद हैं। ऊपर जाना है।"
"पर वहाँ तक कैसे?" करण ने कहा। "कोई सीढ़ी नहीं है।"
मैंने कोयले के ढेर की तरफ़ देखा। वो छत तक लगभग पहुँच रहा था। पर छेड़छाड़ का फ़ासला दो आदमी के कद जितना था।
मैंने अंजली को मीरा की तरफ़ बढ़ाया।
"इसे पकड़।"
"तू क्या करने वाला है?"
"कोयले पर चढ़ूँगा। ऊपर से एक रस्सी या तख़्ता गिराऊँगा।"
"वीर—"
"मीरा।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "इसके पास और कोई रास्ता नहीं है।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अंजली को अपनी बाँहों में लिया और मुझे अपने हाथ से धक्का दिया — हल्का, पर साफ़।
"जा," उसने कहा। "पर गिर मत। मैं तुझे यहाँ से ज़िंदा लेकर जाना चाहती हूँ। सुना?"
मैंने हाँ कहा, और दौड़ पड़ा।
कोयले का ढेर ठंडा था, पर फिसलन भरा। मेरे पैर धँसते जा रहे थे और मैं हाथों से ऊपर खींच रहा था। मेरे हाथ काले हो गए, और मेरी साँस फूलने लगी। मैंने ऊपर देखा — छेद अब पास था, आधा आदमी ऊपर, आधा नीचे।
मैंने अपना हाथ ऊपर बढ़ाया, और मेरी उँगलियों को छत का किनारा छू गया। मैंने पूरा ज़ोर लगाया, अपना शरीर ऊपर खींचा — और फिर मेरी कमर का दर्द मेरे पीछे की तरफ़ से चीखा।
मैं लटक गया। मेरे पैर हवा में थे और मेरे हाथ काँप रहे थे। नीचे आग की गरमी मेरी पीठ पर लग रही थी, और पसीना आँखों में जा रहा था।
"वीर!" मीरा की आवाज़।
"हूँ!" मैंने दाँत भींचकर कहा।
मैंने एक बार और खींचा। मेरी बाँह की नसें खिंच गईं। और फिर मैं ऊपर था — छत पर, टीन पर, चाँदनी में।
नीचे से आवाज़ें आ रही थीं, पर मैंने सुना नहीं। मैंने चारों तरफ़ देखा। छत के किनारे पर एक पुराना लोहे का पाइप पड़ा था और उसके पास एक ज़ंग लगी रस्सी। मैंने रस्सी उठाई, एक सिरा पाइप से बाँधा, और दूसरा सिरा नीचे छेद से गिरा दिया।
"रस्सी!" मैंने चिल्लाया। "टिंकू, पहले अंजली को बाँध!"
मैंने नीचे झाँका। टिंकू ने रस्सी पकड़ी और उसे अंजली की कमर पर बाँधा। मीरा उसे पकड़े खड़ी थी।
"खींच!" मैंने कहा।
मैंने रस्सी खींची। मेरी बाँहें जल रही थीं। अंजली धीरे-धीरे ऊपर आ रही थी — छोटी, काले बादल में लिपटी, और जब वो छेद के पास पहुँची तो मैंने उसकी कलाई पकड़ी और उसे ऊपर खींच लिया।
वो मेरी गोद में गिरी और फिर भी रो नहीं रही थी। बस मेरी बनियान पकड़े हुए थी।
"मीरा!" मैंने चिल्लाया। "अब तू!"
"करण पहले," उसने कहा।
"मीरा—"
"मैंने कहा करण पहले!" और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जिससे मैं कभी नहीं जीतता।
करण रस्सी से बँधा और ऊपर आया। वो मेरे बगल में छत पर गिरा और हाँफने लगा।
फिर टिंकू। फिर शेराज़ — मैंने उसे भी खींचा, क्योंकि मैं उसे यहाँ जलने नहीं दे सकता था, चाहे वो जो भी हो।
और फिर मीरा।
जब उसका हाथ मेरे हाथ में आया, तो मुझे लगा मेरी साँस लौट आई है। मैंने उसे ऊपर खींचा और वो मेरे सामने खड़ी हो गई, उसके बाल बिखरे हुए और उसके गालों पर कालिख।
उसने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ा।
"तू ठीक है?" उसने कहा।
"तू ठीक है?" मैंने कहा।
वो हँसी — एक छोटी-सी हँसी, जिसमें डर और राहत दोनों थे।
"अब ठीक हूँ," उसने कहा।
नीचे गोदाम जल रहा था। आग की लपटें ऊपर उठ रही थीं और टीन की छत गरम हो रही थी। हम छत के किनारे की तरफ़ भागे और नीचे कूदे — एक-एक करके, कम ऊँचाई से, मिट्टी पर।
सबसे आख़िर में मैंने अंजली को नीचे उतारा और फिर खुद कूदा। मेरे घुटने मिट्टी में धँसे और मैं पलटकर गिरा।
और तभी मुझे हरनाम की आवाज़ सुनाई दी।
"अंजली!"
वो दौड़कर आया। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे और वो गिरते-गिरते उस तक पहुँचा।
अंजली ने उसे देखा। एक पल के लिए वो रुकी, और फिर उसने अपनी बाँहें खोल दीं।
"पापा।"
हरनाम ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और रोने लगा। एक आदमी का रोना — जो किसी ने नहीं सुना था, शायद बीस साल में कभी नहीं। वो उसकी गर्दन में मुँह छुपाकर रोया और उसकी पीठ पर हाथ फेरता रहा।
मैंने अपनी आँखें फेर लीं।
मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने अपनी जेब से एक रुमाल निकाला और मेरे हाथों पर लगी कालिख पोंछने लगी।
"तेरे हाथ जल गए हैं," उसने कहा।
"नहीं जले।"
"जले हैं। मैं डॉक्टर हूँ, मुझे पता है।"
"तू डॉक्टर नहीं है, तू पढ़ रही है।"
"तो भी पता है।" और उसकी आवाज़ भर आई, और वो चुप हो गई।
मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
हम दोनों वहीं बैठे रहे, गोदाम जलता रहा, और आग की रोशनी में हमारे चेहरे नारंगी दिख रहे थे।
तभी करण मेरे पास आया। उसके हाथ में कुछ था — एक काग़ज़, जला हुआ, आधा।
"गोदाम के अंदर मिला," उसने कहा। "कोयले के ढेर के नीचे दबा था। जलने से बच गया।"
मैंने वो काग़ज़ लिया। वो पुराना था, पीला पड़ा हुआ, और उस पर लिखाई ऐसी थी जिसे मैं पहचानता था — वही लिखाई जो भवानी के ख़त में थी। काग़ज़ के ऊपर की तरफ़ एक कोना जल चुका था, पर जो बचा था वो साफ़ पढ़ा जा सकता था।
लिखा था:
"अगर ये काग़ज़ किसी के हाथ लगे, तो समझ लेना मैं नहीं रहा। ये गोदाम मेरा नहीं, मेरे भाई का है। यहाँ वो पानी बनता है। और ये पानी बनाने वाला कोई और नहीं, मेरा ही खून है। मैं उसे रोक नहीं सका, क्योंकि उसने मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खोद दी। पर एक बात मैं कहकर जाता हूँ — इस पानी का तोड़ इसी गोदाम में है। छत के नीचे, तीसरे खंभे की नींव में। जो ढूँढेगा, पाएगा।"
मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने पढ़ा और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तीसरा खंभा," उसने कहा। "वो जल रहा है।"
मैंने पलटकर गोदाम की तरफ़ देखा। आग अब छत तक पहुँच चुकी थी और अंदर सब कुछ नारंगी था।
"तो फिर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक थी जो ख़तरे के वक़्त ही आती है, "आग बुझानी पड़ेगी। पूरे गाँव को बुलाओ।"
टिंकू मेरे पास आया, उसके हाथ में अब भी वो लाठी थी, और उसके चेहरे पर कालिख थी।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"आज मैंने डर के मारे दो बार पेशाब किया।" उसने अपनी धोती की तरफ़ देखा। "और एक बार तो मैं सच में सोच रहा था कि मर जाऊँगा।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"पर तू मरा नहीं," मैंने कहा।
"नहीं मरा," उसने कहा, और फिर वो मुस्कुराया — थकी हुई, गंदी, पर मुस्कान। "और भाई, तेरी बहन ठीक है। माँ भी ठीक है। उन्हें मैंने हवेली की पिछली कोठरी में छुपा दिया है, कालू काका के साथ।"
मेरी साँस रुकी।
"तूने पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि पहले तू आग में कूद रहा था," उसने कहा। "अगर बताता तो तू पलटकर भाग जाता और अंजली यहीं जल जाती।" उसने अपना सिर खुजाया। "भाई, पहली बार मैंने सही वक़्त पर सही बात चुप रखी।"
मैं उसे देखता रहा। और फिर मैं हँसा — ज़ोर से, ऐसे हँसा जैसे बहुत दिनों से हँसा ही न हो। और मेरी हँसी में कुछ और भी था — वो राहत जो शब्दों में नहीं आती।
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