Spirit of a Fighter – Chapter 1204
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी बेटी की तरफ़ जाने वाले रास्ते की तरफ़, और फिर उसने सिर हिलाया। उसका सिर ऐसे हिला जैसे कोई बोझ रख रहा हो।
मैंने टिंकू, करण और मीरा को इशारे से पास बुलाया।
"पीछे का दरवाज़ा," मैंने धीरे कहा। "टिंकू और करण वहाँ से। मैं सामने से। मीरा—"
"मैं तेरे साथ," उसने काट दिया।
"मीरा—"
"मैं तेरे साथ," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं पहचानता था। "मुझे पता है मैं क्या कर रही हूँ। मेरे बैग में अदरक की शीशी है और कपूर का टुकड़ा। अगर धुआँ होगा तो—"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे रहेगी। एक कदम भी आगे नहीं।"
वो कुछ कहने वाली थी, फिर रुक गई, और उसने अपने होंठ भींच लिए। मुझे पता था वो क्या कहना चाहती थी। कहती भी रही, तो मैं टाल देता। इसीलिए उसने चुप रहना चुना, और यही उसका सबसे बड़ा यारी भरा जवाब था।
हम फैल गए।
मैं सामने के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। वो दरवाज़ा बड़ा था, लोहे का, और उसका रंग अब कुछ और हो चुका था — ज़ंग ने उसे मिट्टी जैसा बना दिया था। वो थोड़ा खुला था, और उस खुली दरार से अंदर से एक धीमी आवाज़ आ रही थी।
गिनती।
"…अठ्ठारह… उन्नीस… बीस…"
एक बूढ़ी आवाज़। धीमी, सपाट, जैसे कोई रोज़ का हिसाब लगा रहा हो।
और उसके नीचे, बहुत हल्की, एक बच्ची का गाना — वही गुड़िया वाला गाना, जो मेरी बहन रोते वक़्त गुनगुनाती है। मेरा दिल एक झटके में जम गया।
मैंने दरवाज़े को धीरे से धक्का दिया। वो चरमराया, पर खुल गया।
अंदर अंधेरा था, पर ऊपर टीन की छत में जो छेद थे, उनसे आधी चाँद की रोशनी आ रही थी — उजली-भूरी लकीरें, ज़मीन पर बिखरी हुई। और उस रोशनी में मुझे कोयले के ढेर दिखे, बोरे, टूटी ट्रॉली, और बहुत पीछे, एक खंभे से बँधी हुई एक छोटी शक्ल।
अंजली।
उसके हाथ पीछे बँधे थे, और उसका मुँह किसी कपड़े से बंद था। वो खंभे के साथ बैठी थी, घुटने सीने से लगाए, और उसकी आँखें खुली थीं — चौड़ी, सूखी, डर के मारे पत्थर हो चुकी आँखें।
मैंने एक कदम आगे रखा, और ज़मीन पर पड़ा एक टुकड़ा चरमराया।
गिनती रुक गई।
"कौन?" वो बूढ़ी आवाज़ बोली।
मैं रुक गया। मेरे पीछे मीरा की साँस रुकी हुई थी।
"आ गया," वो आवाज़ बोली, और उसमें अब कोई सपाटपन नहीं था — अब उसमें हँसी थी, पतली-सी, जैसे बर्तन में दरार। "सोचा था तू सुबह आएगा। पर तू जल्दी आ गया। ये तेरी आदत नहीं है, वीर सिंह। तू हमेशा देर करता है।"
एक शक्ल अंधेरे से निकली। पहले पैर — एक सीधा, एक घसीटता। फिर शरीर, और फिर चेहरा — शेराज़। उसके एक हाथ में लोहे की छड़ थी और दूसरे हाथ में लालटेन, जिसकी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
पर वो अकेला नहीं था। उसके पीछे, कोयले के ढेर के पास, एक और शक्ल खड़ी थी। चौड़ी, भारी, और उसके हाथ में एक टिन का कनस्तर — जिससे अभी-अभी ढक्कन खुला था।
"तो," शेराज़ ने कहा, और उसने अपनी छड़ उठाई, "तू आ गया। अब बता, पहले क्या करूँ? तेरी टाँग तोड़ूँ, या पहले बच्ची का काम तमाम करूँ? तेरे सामने। ताकि तुझे याद रहे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और फिर मैंने वो किया जो मैंने ज़िंदगी में पहली बार किया — मैंने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। मैं सीधा अंजली की तरफ़ बढ़ा।
"रुक जा!" शेराज़ ने छड़ उठाई।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बिलकुल सपाट थी।
पीछे के दरवाज़े की तरफ़ से एक आवाज़ आई — ज़ंग लगे लोहे के टकराने की। और फिर करण की गरजती आवाज़: "हाथ नीचे कर, शेराज़!"
शेराज़ एक पल के लिए पलटा। और वो एक पल काफ़ी था।
मैं उससे दो कदम आगे था, तीसरे पर पहुँचते-पहुँचते मेरा कंधा उसके पेट में लगा। वो पीछे हटा, उसकी लालटेन ज़मीन पर गिरी और बुझ गई। अंधेरे में मैंने उसकी छड़ की फुफकार सुनी और सिर झुकाया — छड़ मेरे बालों को छूकर निकल गई। मैंने उसकी कलाई पकड़ी, मरोड़ी, और छड़ खड़खड़ाती हुई दूर गिरी।
"कनस्तर!" मीरा की आवाज़ आई। "वो कनस्तर खोल रहा है!"
चौड़ा आदमी कनस्तर का ढक्कन खोल रहा था। टिंकू कहीं से उछला, उसकी लाठी सीधी उस आदमी के हाथ पर पड़ी, और कनस्तर लुढ़कता हुआ दूर जा गिरा। मिट्टी के तेल की तेज़ गंध फैल गई, और मेरा सिर चकराया।
"टिंकू, आग मत!" मैंने चिल्लाया। "कोई दियासलाई नहीं!"
"मैं क्या पागल हूँ?" टिंकू ने हाँफते हुए कहा। "मैं तो खुद आग से डरता हूँ!"
शेराज़ ज़मीन से उठ रहा था। मैंने उसे उठने ही नहीं दिया — मेरा घुटना उसकी छाती पर टिक गया।
"अंजली कहाँ है?" मैंने उसके कान के पास कहा।
वो हँसा। उसके दाँत खून से लाल थे।
"जा," उसने कहा। "जाकर देख। वो खंभे से बँधी है। और उस खंभे के नीचे मैंने मिट्टी का तेल डाल दिया है। तू बचाने आया है ना? बचा। देखते हैं कितना बचाता है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
"मीरा," मैंने कहा, "खंभे के नीचे देख।"
वो दौड़ी। मैंने शेराज़ का कुर्ता पकड़कर उसे उठाया और कोयले के ढेर से टिका दिया, और फिर करण की तरफ़ देखा।
"इन दोनों को संभाल।"
"जा," करण ने कहा, और उसने शेराज़ को पकड़ लिया।
मैं अंजली की तरफ़ भागा। मेरे घुटने ज़मीन पर लगे और मैंने उसके मुँह का कपड़ा खींचा।
उसने एक लंबी साँस ली, फिर रोना शुरू कर दिया — ऐसा रोना जिसमें आवाज़ ही नहीं थी, सिर्फ़ कंधे हिल रहे थे।
"श… श…" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी ही नहीं लगी। "अब ठीक है। अब ठीक है।"
मेरे हाथ उसकी कलाइयों की रस्सी पर थे। गाँठ कसी हुई थी और मेरी उँगलियाँ पसीने से फिसल रही थीं। मैंने दाँत लगाए और खींचा। रस्सी टूटी।
वो मेरे ऊपर गिर पड़ी, और उसने अपनी छोटी बाँहें मेरी गर्दन में डाल दीं। उसका शरीर काँप रहा था। उसकी साँस से गरम हवा मेरे कान पर लग रही थी।
"मेरे पापा ने जो किया," उसने रोते हुए कहा, "उसकी सज़ा मुझे क्यों?"
मेरा गला भर आया। मैंने उसे अपने से थोड़ा अलग किया और उसका चेहरा देखा — छोटी, गंदी, आँसुओं से भीगी शक्ल।
"तेरे पापा की सज़ा तेरे पापा को मिलेगी," मैंने कहा। "तू बेकसूर है। और बेकसूर को कोई सज़ा नहीं दे सकता — न भैरव, न शेराज़, न कोई। जब तक मैं खड़ा हूँ।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही, और फिर उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।
"मीरा," मैंने कहा, "खंभा?"
"तेल है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ तेज़ थी। "पर सिर्फ़ नीचे, आधा फुट तक। अगर आग लगी तो रस्सी जल जाएगी, पर खंभा पत्थर का है, लकड़ी का नहीं। वो नहीं जलेगा।"
"तो फिर?"
"तो फिर आग फैलेगी," उसने कहा। "ज़मीन पर जो तेल है, वो फैलेगा। और कोयला भी जलता है, वीर। ये पूरा गोदाम कोयले से भरा है।"
मैंने अंजली को गोद में उठाया। वो हल्की थी — बहुत हल्की, जैसे कोई चिड़िया। मैंने अपनी बाँहों में उसे कस लिया।
और ठीक उसी पल, बाहर से एक आवाज़ आई।
पहले काँच टूटने की। फिर किसी चीज़ के जलने की फुफकार। और फिर रोशनी — नारंगी, तेज़, गोदाम के सामने वाले दरवाज़े से अंदर घुसती हुई।
"भैरव सर ने कहा था!" किसी ने बाहर से चिल्लाया, और वो आवाज़ हँस रही थी, "बचाने आए तो साबित करके जाओ!"
आग दरवाज़े से अंदर आ रही थी। ज़मीन पर तेल की लकीरें एक-एक करके जल रही थीं — चमकीली नीली-नारंगी धाराएँ, जो कोयले के ढेर की तरफ़ भाग रही थीं।
"पीछे का दरवाज़ा!" मैंने चिल्लाया।
"वो भी जल रहा है!" टिंकू की आवाज़ आई। "बाहर से किसी ने लकड़ी लगा दी है!"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno