Spirit of a Fighter – Chapter 1203
"हाँ," मैंने कहा। "वही है।"
भीड़ अब उठने लगी थी, और लोगों की आवाज़ें मिलने लगी थीं। रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी घुमाई और अपनी आवाज़ उठाई।
"सुनो सब!" उन्होंने कहा। "आज कोई कुश्ती नहीं। आज कोई फ़ैसला नहीं। आज सिर्फ़ एक काम है — एक बच्ची को निकालना। जो जाना चाहे, मेरे साथ चले।"
मैंने मुड़कर हरनाम की तरफ़ देखा। वो अब भी मिट्टी पर बैठा था, और उसके हाथों में उसकी टूटी फ़ाइल थी।
"तू भी चलेगा," मैंने कहा। "अपनी बेटी तक रास्ता तू दिखाएगा।"
वो उठा। उसके घुटने काँप रहे थे, पर वो उठा। और उसने एक बार भी अपनी आँखें नहीं मलीं।
जगदीश ने अपनी लाठी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये ले," उसने कहा। "ये लाठी उस कुएँ की सीढ़ियों में काम आएगी। मैं बीस साल उसी सीढ़ी पर बैठा हूँ।"
मैंने लाठी ले ली। वो हल्की थी, पर मेरे हाथ में आते ही मुझे लगा जैसे कोई बोझ उतर गया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और वो पीली शीशी टटोली — वो अब भी वहीं थी। मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"तैयार है?" मैंने कहा।
वो मुस्कुराई। बस होंठों से नहीं, आँखों से। और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो हमारे बीच पहले दिन से थी — ज़िद।
"तू पूछता है?" उसने कहा। "मैं तो कब से तैयार हूँ।"
मैंने पलटकर अखाड़े की मिट्टी को देखा। सूरज ढल रहा था और उसकी रोशनी में लाल मिट्टी और भी लाल दिख रही थी। और उसी मिट्टी पर, मेरे पैरों के नीचे, किसी के पैरों के निशान थे — ताज़े, गहरे, और एक तरफ़ झुके हुए।
जैसे कोई बहुत जल्दी में भागा हो।
मैंने उन निशानों को गौर से देखा। और मेरी नाक में एक नई गंध आई — ताज़ा, तेज़, और बहुत दूर से नहीं।
"वो अभी भी यहीं है," मैंने धीरे से कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "कौन?"
मैंने अपना सिर उठाया और अखाड़े की ऊँची मिट्टी की दीवार की तरफ़ देखा।
"जिसने अंजली को उठाया," मैंने कहा। "वो हमें देख रहा है।"
॥
मैंने अपनी आँखें सिकोड़कर उस दीवार की तरफ़ देखा, पर सूरज की आख़िरी रोशनी आँखों में चुभ रही थी। कुछ दिख नहीं रहा था। बस दीवार के ऊपर, आसमान के सफ़ेद हिस्से में, एक परछाई हिली — और फिर ग़ायब।
"अब नहीं," मैंने कहा और पलट गया। "पहले अंजली।"
हरनाम मेरे आगे-आगे चल रहा था। उसके घुटने टूटे हुए थे, चलते-चलते कभी-कभी लड़खड़ा जाता, पर रुकता नहीं था। एक बूढ़े बाप की चाल थी वो — जिसे दौड़ना नहीं आता, पर जिसके पैर खुद-ब-खुद तेज़ हो जाते हैं।
"बता," मैंने कहा, "कितने आदमी थे?"
"दो," उसने हाँफते हुए कहा। "एक लंगड़ा था, वही शेराज़। दूसरा… दूसरा मैंने पहले नहीं देखा। चौड़ा था, हाथ में लोहे की छड़।"
"और वो उसे कहाँ ले गए?"
"शहर के बाहर। पुरानी चीनी मिल के पीछे जो गोदाम है — वहाँ। उस गोदाम में बीस साल से कोई नहीं गया। वहाँ… वहाँ कोयला रखा था कभी।"
टिंकू मेरे बगल में चल रहा था और उसके हाथ में जगदीश की लाठी थी। उसने लाठी दोनों हाथों से पकड़ रखी थी, ऐसे जैसे किसी ने उसे पकड़ने को दिया हो और वो छोड़ना नहीं चाहता।
"भाई," उसने कहा, "मैं एक बात साफ़ कर दूँ। मैं मिठाई वाला आदमी हूँ। मेरा काम शक्कर और घी के बीच है। मुझे मार-पीट में मत घसीटना।"
"तो फिर लाठी क्यों पकड़ी है?" करण ने पीछे से कहा।
टिंकू ने एक पल सोचा।
"क्योंकि मैं अकेला मरने से डरता हूँ," उसने कहा। "साथ में मरने में कुछ अलग बात है।"
करण हँसा। पहली बार उसकी हँसी में कोई ज़हर नहीं था, बस थकान।
हम शहर की सड़क पकड़ने लगे। रास्ते में अंधेरा उतर रहा था और हवा में धूल की गंध बढ़ रही थी। पीछे रणवीर सिंह की कुर्सी की आवाज़ आ रही थी — पहिए मिट्टी पर चरमरा रहे थे। वो भी साथ थे, और कालू काका भी, और पीछे-पीछे गाँव के कुछ आदमी लाठियाँ लेकर। मीरा मेरे दूसरी तरफ़ चल रही थी, उसका बैग कंधे पर, और एक हाथ अपनी जेब पर।
कुछ देर चुप्पी रही। फिर करण मेरे पास आ गया, इतना पास कि उसकी कोहनी मेरी कोहनी से टकराने लगी।
"वीर," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, ऐसी जैसे कहने से पहले बहुत बार सोची हो।
"हूँ।"
"मैं एक बात कहूँ?"
"कह।"
उसने सामने देखा। सड़क पर एक कुत्ता भागता हुआ निकला, और वो उसे देखता रहा जब तक वो पीछे नहीं छूट गया।
"मैं जब तक तेरे साथ हूँ," उसने कहा, "मेरे पिता का नाम नहीं लूँगा। न भैरव। न जगदीश। जो मैंने कल किया, उसके बाद मुझे ये हक़ नहीं कि मैं किसी का बेटा कहलाऊँ।"
मेरे पैर एक पल के लिए रुके, फिर फिर चले।
"तेरे पापा का नाम लेने से तू कौन-सा बड़ा हो जाएगा?" मैंने कहा। "और न लेने से तू कौन-सा छोटा हो जाएगा? तेरे पापा ने जो किया, वो उनका किया है। तूने अपने हाथ से कुछ नहीं किया। बस…"
"बस क्या?"
"बस देर तक आँखें बंद रखीं। वो भी कम गुनाह है, पर वो तेरा गुनाह है। उसका इलाज तू आज कर रहा है। इसीलिए साथ चल रहा है।"
करण ने कुछ नहीं कहा। पर उसके कदम मेरे कदमों के साथ मिल गए।
मीरा ने पीछे से कहा, "गोदाम का पीछे वाला दरवाज़ा?"
"हाँ," हरनाम ने कहा। "पीछे वाला दरवाज़ा ज़ंग लगा है, पर उसके नीचे से कोयला बहकर बाहर आता रहा है। वहाँ से सुराख़ है।"
"अंजली को कब उठाया?" मैंने पूछा।
"दोपहर के बाद। जब मैं अखाड़े पहुँचा था।" हरनाम की आवाज़ फट गई। "मेरी बेटी मेरे साथ थी। मैं उसे साथ लाया था, क्योंकि मुझे लगा अखाड़े से बाहर वो सुरक्षित नहीं है। और मैंने… मैंने उसे वहीं छोड़कर…"
वो रुक गया। उसकी साँस टूट रही थी।
"तूने उसे छोड़ा नहीं था," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ सख़्त थी पर बुरी नहीं। "तू उसे बचाने की कोशिश कर रहा था। फ़र्क़ यह है कि तूने बीस साल तक ग़लत आदमी की तरफ़ हाथ बढ़ाया। आज तू सही तरफ़ है। बस इतना काफ़ी है।"
हरनाम ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था और वो बोला नहीं। पर उसकी चाल थोड़ी सीधी हो गई।
हम शहर के किनारे पहुँचे तो आसमान गहरा नीला हो चुका था। पुरानी चीनी मिल का ढाँचा दूर से ही दिख रहा था — बड़ी, खाली, टूटी खिड़कियों वाली इमारत, जिसके ऊपर एक टूटी चिमनी खड़ी थी, और वो चिमनी ऐसी दिख रही थी जैसे आसमान में कोई उँगली उठाकर खड़ा हो।
उसके पीछे गोदाम था। लंबा, नीचा, टीन की छत। और अंधेरा — इतना अंधेरा कि लगा वो इमारत नहीं, कोई छेद है जो अंधेरे को पी रहा है।
जैसे ही हम पास पहुँचे, मेरी नाक में गंध आई।
मैं रुक गया।
"रुको।"
सब रुके।
मैंने आँखें बंद कीं। हवा पूरब से आ रही थी, हल्की, और उसमें तीन चीज़ें मिली हुई थीं। पहली — कोयले की वो पुरानी, बासी गंध जो दीवारों में बीस साल से बैठी है। दूसरी — मिट्टी का तेल। ताज़ा। किसी ने अभी-अभी कनस्तर खोला है। और तीसरी — पसीने की गंध, दो अलग-अलग लोगों की। एक में तंबाकू और लोहे की गंध थी। दूसरे में…
"दो आदमी हैं," मैंने कहा। "एक के हाथ में लोहा है। दूसरे के हाथ में मिट्टी का तेल। और… तीसरी गंध है — बच्ची की। वो ज़िंदा है।"
"कैसे पता?" करण ने पूछा।
"उसकी साँस की गंध आ रही है," मैंने कहा। "डर की गंध। वो तेज़-तेज़ साँस ले रही है।"
हरनाम ने एक आवाज़ निकाली — कोई शब्द नहीं, किसी जानवर जैसी आवाज़। मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"तू बाहर रुकेगा," मैंने कहा। "तू अंदर गया तो वो तुझे देखकर चिल्लाएगा और सब बिगड़ जाएगा।"
"वो मेरी बेटी है—"
"इसीलिए।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "बाप बनकर अंदर जाएगा तो हाथ काँपेंगे। मुझे ठंडे हाथ चाहिए। तू यहीं, मेरे पीछे।"
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