Spirit of a Fighter – Chapter 1199
"मैं तेरे बाप का कातिल हूँ," उसने कहा। "मैंने उसे बचाया नहीं, उसे छोड़ दिया। अगर मैं उस रात भैरव से लड़ा होता, तो शायद वो आज ज़िंदा होता। मैं लड़ा नहीं। मैं भाग गया।"
उसकी आवाज़ रुकी, और उसने अपनी आँखों पर हाथ रखकर उन्हें पोंछा — हालाँकि उनमें पानी नहीं था, सिर्फ़ वो परत थी।
"पर मैं तेरे बाप की क़सम खाकर ज़िंदा हूँ, वीर," उसने कहा। "हर रोज़ सुबह मैं उसी क़सम से आँख खोलता हूँ। और आज उस क़सम के सामने जवाब देने आया हूँ।"
मेरी छाती से एक आवाज़ निकली — छोटी, बेकार सी। मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाया। मेरा गला सूख गया था, और मेरी आँखों में आँसू थे जो गिर नहीं रहे थे, बस रुके हुए थे।
मैंने अपने पीछे माँ को खोजा। वो भीड़ के बीच खड़ी थीं, गुड़िया का हाथ पकड़े हुए। उनका चेहरा पत्थर जैसा था। और उनकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था। बस उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ बोल नहीं रहे थे, बस काँप रहे थे।
माँ ने जगदीश की तरफ़ देखा। उनकी नज़र में गुस्सा नहीं था। दुख नहीं था। कुछ ऐसा था जो बीस साल से सूख चुका था — जैसे कोई कुआँ, जिसमें पानी नहीं, बस कीचड़ बचा हो।
"जगदीश," माँ ने कहा। बस नाम। और वो नाम उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई पुरानी चीज़ अलमारी से निकलती है, जिसे सालों से हाथ नहीं लगाया।
जगदीश ने सिर उठाया।
"सरस्वती," उसने कहा। "मैं जानता हूँ तू मुझसे क्या पूछेगी।"
"मैं कुछ नहीं पूछूँगी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने कभी नहीं सुनी थी। "मैंने बीस साल में सब पूछ लिया। जवाब कोई नहीं आया। अब मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगी — तेरे दरवाज़े पर मेरा बेटा भूखा खड़ा रहा, और तूने उसे नहीं पहचाना।"
जगदीश ने अपना सिर झुका लिया। उसकी गर्दन की हड्डी दिख रही थी, और उस पर बाल बहुत कम थे, बिलकुल सफ़ेद।
"मैंने नहीं पहचाना," उसने कहा। "मैंने उसे देखा भी था, मंदिर के पास, बारह साल पहले। वो बैलगाड़ी पर बैठकर जा रहा था, और मैंने सिर्फ़ इतना सोचा था — 'कितना दुबला लड़का है।' और मैं अपना रास्ता चला गया।"
उसने अपना हाथ उठाया, और मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ भी काँप रही थीं।
"अब मैं आया हूँ," वो बोला। "हिसाब चुकाने।"
रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। उनका पहिया मिट्टी में धँसा, और उन्होंने अपनी मुट्ठी बाजु पर मारी।
"हिसाब?" उन्होंने कहा। "तू हिसाब की बात करता है? मेरे दोनों पैर तेरे भाई ने बर्बाद किए, और तू मुझे बताता है कि तू हिसाब चुकाने आया है?"
जगदीश ने उनकी तरफ़ मुँह उठाया और कुछ पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "रणवीर, तेरे पैरों में मैंने ज़हर नहीं डाला था। मैं तब जेल में नहीं था, तब मैं उस कुएँ के नीचे था। तेरे पैर जिसने बेकार किए, वो तेरे सामने खड़ा है। और उसका नाम भैरव है, न कि मैं।"
अखाड़े में एक हलचल उठी। कोई बोला "अच्छा?" और कोई बोला "झूठ है।"
रणवीर सिंह ने अपना मुँह बंद कर लिया, और उनकी आँखों में कुछ बदला। वो पीछे सरक गए, और उनका एक हाथ अपने सून्न पैर पर रखा रह गया।
मीरा आगे आई। उसने मेरे बगल में खड़े होकर अपना बैग उतारा और उसमें से एक छोटी कॉपी निकाली।
"जगदीश सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो स्कूल वाली तेज़ी थी जो मुझे पहली बार सुनते ही पसंद आई थी। "मेरे पास बीस साल पुराने काग़ज़ हैं। इनमें भवानी की डायरी है, जिसमें लिखा है — 'मेरा भाई मेरे घर आया, उसने अखाड़ा माँगा, और मैंने मना किया।' तू ये बता — तूने अखाड़ा माँगा था?"
जगदीश ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी सफ़ेद आँखें मीरा पर टिकीं।
"माँगा था," उसने कहा। "और वो मेरा अधिकार था। मैं बड़ा बेटा था।"
"तो तूने ज़हर वाला पानी बनाया," मीरा ने कहा। "तूने पहलवानों को पिलाया। तूने भैरव को सिखाया।"
जगदीश ने अपना सिर हिलाया, बहुत धीरे।
"मैंने बनाया," उसने कहा। "मैं वैद्य के पास गया था, मैंने उससे दवा माँगी थी, और उसने मना किया। तो मैंने खुद बनाया। भवानी ने मेरी शीशी तोड़ी, पर उसने मेरा नुस्खा नहीं तोड़ा। वो मेरे दिमाग़ में था। और भैरव ने बाद में उसे पूरा किया। मैंने उसे सिर्फ़ शुरुआत दी थी — बाकी वो खुद चला। मैं तो दूर बैठा देखता रहा, और हर खबर सुनता रहा — 'अमुक पहलवान बीमार पड़ा, अमुक मर गया' — और मैं अपने मुँह पर हाथ रखकर चुप बैठा रहा।"
मेरी छाती में कुछ खौल उठा। मैं एक कदम बढ़ा और मेरे हाथ ने जाने कैसे उसका गिरेबान पकड़ लिया। मैं उसे मिट्टी से उठा खींच लाया, और उसकी पीठ अकड़ गई, और उसके होंठों से एक दर्द भरी आवाज़ निकली।
"वीर!" मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर, छोड़।"
मैंने उसे नहीं छोड़ा। मेरी साँस फूल रही थी, और मेरी आँखों के सामने लाल धब्बे तैरने लगे थे।
"तूने उन्हें मरने दिया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी डरावनी लगी। "तूने सत्रह पहलवानों को मरने दिया। तूने चुप रहकर अपनी जान बचाई। और अब आकर बोलता है — 'मैं तेरा बाप हूँ'? कैसा बाप? कैसा बाप तू है?"
जगदीश ने मेरी मुट्ठी से अपना गिरेबान नहीं छुड़ाया। उसने बस मेरी आँखों में देखा, और उसकी सफ़ेद आँखों में कुछ था जो मुझे चुप कर गया।
"मैं तेरा बाप नहीं हूँ," उसने कहा। "मैं तेरा बाप कभी था ही नहीं। भवानी तेरा बाप था। मैं तो सिर्फ़ वो आदमी हूँ जिसने उसे मारने दिया।"
उसने एक पल साँस ली, और उसकी आवाज़ और धीमी हो गई।
"पर तेरे पापा ने मरते वक़्त मेरा नाम अपने हाथ से नहीं लिखा, वीर। उन्होंने मेरा नाम तेरे लिए लिखा। उन्होंने कहा था — 'जगदीश से मिलना। वो तुझे वो रास्ता दिखाएगा जो मैं नहीं दिखा सका।'"
मेरी मुट्ठी ढीली पड़ गई। जगदीश धीरे से मिट्टी पर बैठ गया, और इस बार उसने अपनी लाठी नहीं उठाई।
मैं पीछे हटा। मेरा सिर घूम रहा था। मैंने अपने हाथ देखे — मेरे हाथ काँप रहे थे, और उन पर उसकी गर्दन की गर्मी लगी हुई थी।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे थोड़ा पीछे खींच लिया। उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर ठंडी थीं।
"साँस ले," उसने मेरे कान के पास धीरे से कहा। "सिर्फ़ साँस ले।"
मैंने आँखें बंद करके एक साँस भीतर खींची, और एक छोड़ी।
जगदीश ने अपनी झुकी पीठ से कुछ निकाला। उसके कुर्ते के नीचे, कमर पर, एक पुरानी रस्सी बँधी थी, और उस रस्सी में एक छोटी गठरी थी — मैली, पुरानी, जिसका कपड़ा ही सड़ गया था। उसने उसे खोला, और उसमें से एक अंगूठी निकली।
चाँदी की अंगूठी। वही बनावट, वही घिसा किनारा, वही अंदर खुदा हुआ निशान जो मैंने माँ की डिबिया में देखा था।
वो भवानी की अंगूठी थी।
"ये मैंने चुराई थी," जगदीश ने कहा, और उसने अंगूठी अपनी हथेली पर रखी। "उस रात, तहखाने में। भवानी मरी नहीं थी, वो ज़मीन पर पड़ी थी और उसकी उँगली से ये ढीली हो गई थी। मैंने इसे उठा लिया। बीस साल मेरे पास रही। मैं इसे हर रात अपनी हथेली में लेकर सोता था, और सोचता था — 'अगर मैंने ये न उठाई होती, तो शायद मैं उस रात भागता नहीं।'"
उसने अपनी हथेली मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ये अब तेरी है," उसने कहा। "ले।"
मैंने अंगूठी नहीं ली। मैं उसकी हथेली को देखता रहा, और मुझे माँ की वो डिबिया याद आई जिसे हमने बीस साल से नहीं खोला था, और उसमें रखी चूड़ी और अंगूठी, और माँ का वो गला जो हर बार रुँध जाता था जब कोई भवानी का नाम लेता था।
"पहले ये बता," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सूखी थी, "तू मुझे मारेगा या सुनेगा?"
जगदीश ने सिर उठाया। उसके सूखे होंठों पर एक बार फिर वो मुस्कान-जैसा कुछ आया।
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