Spirit of a Fighter – Chapter 1195
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे, पर उसने अपनी आवाज़ पकड़कर रखी।
"वीर।" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "बलवंत पानी पीता है, तुम नहीं। ये बराबरी नहीं है। ये जंगल का शेर और गाँव का कुत्ता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था — वो डर जो किसी के लिए होता है, अपने लिए नहीं। और मुझे लगा कि इस डर में कुछ ऐसा है जो मेरे भीतर की आग को और तेज़ कर देता है।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "मैं मिट्टी में सोया हूँ, वो बोतल में। देखते हैं कौन जीतता है।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अपना हाथ नहीं छोड़ा।
"अगर तुम हार गए," उसने कहा, "तो मैं भैरव के अखाड़े का दरवाज़ा जला दूँगी। मैं कसम खाती हूँ।"
मैं हँसा। पहली बार उस सुबह कुछ हल्का लगा।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। "भाई!" वो दौड़ता हुआ आया, हाथ में मिट्टी के बर्तन में कुछ लेकर। "मैंने सुबह से मिठाई बनाई है। 'जीत का लड्डू' — पूरे गाँव में बाँटूँगा, जब तू जीतेगा। बीस किलो बनाऊँगा। नहीं, तीस किलो!"
"टिंकू, अभी लड़ाई भी नहीं हुई," मैंने कहा।
"तो क्या हुआ? मैंने मन में तय कर लिया है।" उसने लड्डू मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पहला तेरा।"
मैंने लड्डू खाया। घी की गंध और गुड़ की मिठास — आज कुछ ज़्यादा ही अच्छी लगी।
दोपहर को माँ ने मुझे बुलाया। उन्होंने एक पुरानी पीली चिट्ठी मेरे हाथ में रखी। "तेरे बाबा ने मरने से एक हफ़्ता पहले लिखी थी। मुझे दिया था — कहा था, जिस दिन मेरा बेटा पहली बड़ी लड़ाई लड़े, उस दिन देना। वो दिन आज है।"
मैंने चिट्ठी खोली। बाबा की लिखाई मोटी थी, जैसे कोई जल्दी में लिख रहा हो। कुछ शब्द थे बस। और आख़िर में एक लाइन थी जो मैंने तीन बार पढ़ी — "बेटा, अगर तू हार भी जाए, तो भी तेरी मिट्टी तेरी रहेगी। जो मिट्टी से लड़ता है, वो मिट्टी से हार नहीं सकता।"
मैंने चिट्ठी को अपनी जेब में रखा, दिल के पास। माँ ने मेरा सिर सहलाया, और इस बार उन्होंने अपने आँसू नहीं छुपाए।
रात हुई तो मैं फिर तहखाने में आया।
॥
तहखाने की सीढ़ियों से ऊपर आते वक़्त मेरे पैर भारी थे, पर सुबह की हवा ने चेहरे पर थप्पड़ मारा और नींद कहीं भाग गई। आँगन में माँ चक्की पर बैठी थीं, पर आज चक्की चल नहीं रही थी। उनके हाथ स्थिर थे, आँखें बंद — जैसे कोई दुआ पढ़ रही हों। मैंने पैर की आहट से उन्हें छेड़ा नहीं। सीधे नहर की तरफ़ बढ़ गया, जहाँ पानी की सतह पर सुबह की पहली किरण तैर रही थी।
मैंने मुँह धोया, आँखें मलीं, और पानी में अपना चेहरा देखा। कल रात की नींद कम थी, आँखों के नीचे काला घेरा साफ़ दिख रहा था। मैंने पानी में हथेली मारी और चेहरा बिगाड़ दिया।
अखाड़े का फाटक खुला था। इतनी सुबह भी अंदर भीड़ थी। कुछ पहलवान कसरत कर रहे थे, कुछ दीवार के सहारे बैठे थे, और सबकी नज़रें मुझ पर। कोई कुछ नहीं बोला। बस देखते रहे — जैसे कोई जानवर देख रहे हों जिसे आज मारना है।
मिट्टी में पैर रखते ही मेरे तलवे ने उसे पहचान लिया। आज मिट्टी ठंडी थी। कल रात की ओस उसमें उतर आई थी। मैंने दोनों हाथों से उसे उठाया और माथे पर लगाया।
"अभी से?" पीछे से आवाज़ आई।
मैं पलटा। रणवीर सिंह थे, व्हीलचेयर पर, पीछे मीरा खड़ी थी। रणवीर सिंह के हाथ में एक कपड़ा था — पुराना, मैला, मुड़ा हुआ। उन्होंने मुझे इशारे से पास बुलाया।
"मेरे साथ आ," उन्होंने कहा। "मीरा, तू यहीं रुक।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर रणवीर सिंह की आँखों ने उसे चुप करा दिया। वो मेरे साथ अखाड़े के पीछे की तरफ़ बढ़े, जहाँ पुरानी दीवार थी और उसके नीचे छाया। वहाँ कोई नहीं आता था।
वो रुके। मैं उनके सामने खड़ा हो गया। उन्होंने व्हीलचेयर के हत्थे को कसकर पकड़ा और अपने शरीर को थोड़ा सीधा किया — जैसे ज़ोर लगाकर उठने की कोशिश कर रहे हों, पर पैरों ने साथ नहीं दिया।
"पास आ," उन्होंने कहा। "झुक।"
मैं झुका। उन्होंने मेरा दायाँ हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ सूखी थी, पर मज़बूत — जैसे पुरानी जड़ हो जो सूखकर भी मिट्टी में गहरी हो। उन्होंने मेरी उँगलियाँ अपनी उँगलियों में फँसाईं और मेरा हाथ नीचे, मिट्टी की तरफ़ खींचा।
"पैर ऐसे जमा," उन्होंने कहा। "दोनों पैरों के बीच एक बालिश्त का फ़ासला। पूरा तलवा मिट्टी पर — एड़ी नहीं, पंजा नहीं, पूरा तलवा।"
मैंने पैर जमाए।
"अब आँखें बंद कर। साँस सुन।"
मैंने आँखें बंद कीं। कुछ सुनाई नहीं दिया — बस दूर किसी पहलवान के हाँफने की आवाज़ और नहर का बहता पानी।
"अपनी साँस सुन," उन्होंने कहा।
मैंने सुनी। धीमी थी, पर छाती में भारी।
"अब मेरी सुन।"
मैंने सुना। उनकी साँस आ रही थी — छोटी, टूटी, बीच में रुकने वाली।
"मैं बूढ़ा हूँ, मेरी साँस ऐसी है। पर जो आदमी पानी पीता है, उसकी साँस ऐसी ही होती है — जल्दी, टूटी, जैसे हर साँस के लिए लड़नी पड़े। पहले दम में वो तेज़ होगा, तू उससे तेज़ नहीं हो सकता। पर दस मिनट बाद उसकी साँस बढ़ने लगेगी — जल्दी-जल्दी, बिना ताल के। वहीं मौका है। उसी वक़्त उसके पेट पर दाँव मारना। मिट्टी से उसकी साँस छीनना।"
मैंने आँखें खोलीं।
"समझा?"
"समझ गया।"
"तो दोहरा।"
मैंने पैर जमाए, झुका, और उनके हाथ पर हाथ रखकर दाँव दोहराया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने उन्हें जल्दी छुपाया, धोती में पोंछा, पर रणवीर सिंह की आँखें तेज़ थीं।
"डर लग रहा है?" उन्होंने पूछा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कोई मज़ाक नहीं था, कोई ताना नहीं। बस सवाल।
"हाँ," मैंने कहा। "लग रहा है।"
वो हँसे। ज़ोर से नहीं — बस गले से एक आवाज़ निकली जो बीस साल की चुप्पी से आई थी।
"अच्छा है," उन्होंने कहा। "जो डरता नहीं, वो लड़ता नहीं — बस मारता है। और मारने वाले को कोई याद नहीं रखता। डर वाले को लोग याद रखते हैं। क्योंकि वो जानता है कि खोने को क्या है।"
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और व्हीलचेयर पीछे की तरफ़ सरकाई।
"एक और बात," उन्होंने कहा। "बलवंत जब उतरे, तो वो पहले तुझे घूर के देखेगा। तीन-चार पल। उस वक़्त तू उसकी आँखों में मत देखना। उसकी छाती देखना।" उन्होंने अपनी छाती की तरफ़ इशारा किया। "जो पानी पीता है, उसकी छाती जल्दी उठती-गिरती है। तू अपनी नज़र वहीं रख।"
"ठीक है।"
"अब जा। माँ तेरा इंतज़ार कर रही है।"
मैं लौटा। आँगन में माँ खड़ी थीं, हाथ में छोटी कटोरी — उसमें हल्दी घुली थी, पानी में। उन्होंने मुझे अपने सामने बिठाया। मेरे माथे पर उँगली डुबोकर टीका लगाया। हल्दी की गंध और उनके हाथों की गंध — चक्की का आटा और सुबह की दुआ।
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने कहा।
"माँ, मैंने सुबह कुछ नहीं खाया।"
"पता है।" उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। "इसीलिए तो कहा। तेरी दुआ ऊपर पहुँच रही है। उस तक।"
उनकी आवाज़ लड़खड़ाई। पर वो रोई नहीं। उन्होंने मेरा सिर अपनी छाती से लगाया, और मुझे उनकी साड़ी में कपूर की गंध आई — वही कपूर जो उनके आँचल में था, वही जो ज़हर के तोड़ में था। बीस साल से ये गंध उनके कपड़ों में बसी थी।
"जा," उन्होंने मुझे धकेला। "अब रोने का वक़्त नहीं है। जीतकर आ, फिर बैठकर रोएँगे — खुशी के आँसू।"
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