Spirit of a Fighter – Chapter 1196
टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में मिट्टी का बड़ा बर्तन था, ऊपर साफ़ कपड़ा बँधा था। उसके चेहरे पर हल्दी और घी की गंध थी — सुबह से वो मिठाई बना रहा था।
"भाई!" वो हाँफते हुए बोला। "देख, मैंने दो तरह के बनाए हैं। एक लड्डू, एक गुड़-वाला पेड़ा। जो जीते, उसके मुँह में डालूँगा। और जो हारे, उसके मुँह में भी डालूँगा — पर उसका पेड़ा थोड़ा ज़्यादा मीठा होगा, ताकि उसे हार का स्वाद न आए।"
"टिंकू," मैंने कहा, "तूने सुबह चार बजे से ये सब बनाया?"
"तीन बजे से," उसने सुधारा। "और अभी चौदह किलो बाकी है। पूरे गाँव को खिलाना है। माँ से कह दिया है — आज दुकान बंद है।" उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें चमक रही थीं। "भाई, आज मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा। बिल्कुल पीछे। अगर कोई पीछे से आए, मैं उसके मुँह में लड्डू ठूँस दूँगा।"
मैं हँसा। पेट से हँसी आई। पहली बार उस सुबह।
तभी मीरा आई। उसके हाथ में कुछ था — छोटा, हरा धागा। मैंने पहले भी उसे देखा था, उसके गले में। उसने मेरे पास आकर धागा दोनों हाथों से खोला।
"सिर झुका," उसने कहा।
मैंने झुकाया। उसकी उँगलियाँ मेरी गर्दन की त्वचा से छुईं — ठंडी, नरम। उसने धागा बाँधा। गाँठ कसी। फिर उसने मेरी गर्दन पर हल्का हाथ रखा और धागे को ठीक किया।
"ये तुम्हें जिताएगा नहीं," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "पर मेरे पास लौटा लाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें गीली थीं, पर उसने पलक नहीं झपकी।
"मीरा।"
"क्या?"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले। सिर्फ़ मेरा हाथ बढ़ा और उसकी उँगलियों को पकड़ लिया। उसने मेरी उँगलियाँ दबा दीं — वैसे ही जैसे रणवीर सिंह ने दबाई थीं, पर इनमें मिट्टी नहीं थी, इनमें तुलसी की गंध थी।
"लौटकर आना," उसने फुसफुसाया। "बस इतना।"
"आऊँगा।"
पीछे से पैरों की आवाज़ आई। करण आया — साफ़ कुर्ता, बाल पीछे बँधे हुए, आँखें लाल। वो मेरे सामने आकर रुका। उसके हाथ में एक पतली लाठी थी, जिसके सिरे पर चमड़ा लिपटा था — कुश्ती की लाठी नहीं, बस सहारा।
"वीर सिंह," उसने कहा। "मैं तेरे साथ चलूँगा।"
"करण—"
"सुन ले।" उसने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा। "वो मेरे बाप का शिष्य है। उसने मेरे बाप का पानी पिया है, और मेरे बाप ने उसे वही पानी दिया जो मेरी माँ को और उन सत्रह पहलवानों को दिया था। मैं उसके सामने खड़ा होकर उससे कहूँगा — तू जो भी है, तेरा गुरु जेल में है और तेरा सच मर चुका है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें वही आग थी जो मेरे भीतर थी — पर ये आग अलग थी। ये बदले की आग नहीं थी, ये साफ़ करने की आग थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे साथ अखाड़े में मत आ। बाहर खड़ा रह — अगर मैं हारूँ, तो गाँव को सच बताना।"
करण ने सिर हिलाया। उसने लाठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये मेरी माँ ने दी है। कहा — जिस दिन तू लड़े, उस दिन तेरे हाथ में हो।"
मैंने लाठी ली। हल्की थी, पर हाथ में आते ही लगा जैसे कुछ भारी आ गया।
दोपहर तक अखाड़ा भर गया। पूरा रामपुर आया — बूढ़े, औरतें, बच्चे, दूर के गाँवों से भी लोग। दीवार के सहारे खड़े थे, छतों पर बैठे थे, पेड़ों पर चढ़े थे। सुक्खी बुआ सबसे आगे — चमकीली साड़ी, हाथ में पान का बीड़ा, और मुँह में एक ही बात।
"अरे मैंने तो सुना है," वो चिल्ला रही थी, "कि बलवंत ने कहा है — वो वीर को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
"बुआ!" मैंने दूर से कहा। "अगर सुन ही लिया है, तो भगवान से भी सुन लो — मैं ज़िंदा रहूँगा।"
वो हँसी, और उस हँसी में पूरा अखाड़ा हँसा। मैंने देखा, कई चेहरों पर हल्की मुस्कान आई। डर कुछ कम हुआ।
मैं मिट्टी में उतरा। मिट्टी आज मुलायम थी, गीली — कालू काका ने अभी सींची थी। मैंने पैर जमाए, आँखें बंद कीं, और साँस सुनी। अपनी। धीमी। भारी। फिर मैंने अपने भीतर झाँका — और मुझे अपने डर की आवाज़ सुनाई दी। धीमी, रेंगती, जैसे कोई सीढ़ी चढ़ रहा हो।
मैंने आँखें खोलीं।
दूर, अखाड़े के फाटक पर, धूल उठ रही थी।
फाटक खुला, और एक भारी शरीर अंदर आया। पहले पेट, फिर छाती, फिर चेहरा। बलवंत। अट्ठाईस साल का था, पर चालीस का लगता था — चेहरे पर झुर्रियाँ, आँखों के नीचे काले घेरे, माथे पर पसीना जो इतनी दूर से भी दिख रहा था। उसके कंधे तगड़े थे, बाँहें मोटी, पर चमड़ी पीली पड़ी थी — जैसे किसी पेड़ की छाल जिसे अंदर से कीड़ा खा गया हो।
उसके पीछे दो आदमी थे — भैरव के पुराने गुर्गे, जिन्हें मैंने अदालत के बाहर देखा था। वो दोनों फाटक पर रुक गए। बलवंत अकेला आगे बढ़ा।
वो मेरे सामने आकर रुका। मिट्टी में उसके पैर जमे — मैंने देखा, उसकी एड़ी मिट्टी पर थी, पंजा नहीं। रणवीर सिंह की बात याद आई।
वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में दाँत पीले थे, और मसूड़े लाल।
"वीर सिंह," उसने कहा। उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो। "मैं तेरे पिता भवानी को भी जानता हूँ… और तेरे असली बाप को भी।"
अखाड़े में हवा रुक गई। मेरे पीछे किसी ने साँस ली — लंबी, खींची हुई। मैंने पलटकर नहीं देखा। मैंने उसकी छाती देखी, जैसे रणवीर सिंह ने कहा था। छाती जल्दी उठ रही थी — पहले से।
"तू जानता है," मैंने कहा, "तो बोल। मेरे असली बाप कौन हैं?"
वो ज़ोर से हँसा। हँसी में खाँसी मिली थी।
"पहले कुश्ती," उसने कहा। "फिर नाम।" उसने अपनी धोती ऊपर सरकाई और मिट्टी में झुककर दोनों हाथों से उसे उठाया। "तेरे बाप भवानी ने जो मिट्टी छोड़ी थी, उसी में आज तुझे मिलाऊँगा।"
उसने मिट्टी मेरी तरफ़ फेंकी। मैंने चेहरा फेरा, पर कुछ कण मेरे गाल पर पड़े। मिट्टी की गंध आई — लाल मिट्टी, पर इसमें कुछ और था। कुछ कड़वा। कुछ जो मेरी नाक में जाकर चुभा।
मैंने उसे सूँघा। और मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
ये वही गंध थी। वही जो तीन शीशियों में थी। वही जो बीस साल से रामपुर के पहलवानों के पसीने में घुल रही थी।
बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ चमका — पहचान। वो जानता था कि मैंने कुछ सूँघा है।
"लगा?" उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुन सकूँ। "ये मेरे गुरु का तोहफ़ा है। रोज़ सुबह एक घूँट। और अब —" उसने अपनी मुट्ठी मिट्टी में गाड़ी, "— अब ये तेरे हिस्से में भी आएगा।"
उसने मुट्ठी खोली और मिट्टी मेरी छाती पर फेंकी। इस बार मैंने चेहरा नहीं फेरा। मैंने वो मिट्टी अपनी छाती पर गिरने दी, और मैंने उसे महसूस किया।
तभी पीछे से मीरा की आवाज़ आई — तेज़, साफ़, पूरे अखाड़े में गूँजती हुई।
"बलवंत सिंह! तुम्हारे गुरु जेल में हैं। तुम्हारा पानी खत्म हो रहा है। और वो गंध — वो ज़हर है, दवा नहीं।"
बलवंत की आँखें सिकुड़ीं। उसने आधा सिर घुमाया, फिर रुक गया — जैसे कोई उसे भीतर से खींच रहा हो।
"लड़की," उसने कहा, "तेरे बाप ने भी यही कहा था। और आज तेरे बाप व्हीलचेयर पर हैं।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया।
मैंने अपनी मुट्ठी कसी और उसकी छाती की तरफ़ बढ़ा। पर मेरे भीतर कुछ और चल रहा था — एक आवाज़ जो कह रही थी, "तेरे असली बाप को भी जानता हूँ।"
मैंने उसकी आँखों में नहीं देखा। छाती देखी। वो जल्दी उठ रही थी। बहुत जल्दी।
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