Spirit of a Fighter – Chapter 1194
"तो क्या हुआ?" उसने ठुड्डी उठाई। "बड़ी बहनें भी तो मिट्टी भरती होंगी।"
फिर उसने मेरी आँखों में देखा, और उसकी आवाज़ बदल गई — वो तेज़ लड़की अचानक कहीं चली गई और उसकी जगह एक छोटी बच्ची आ गई।
"भैया," उसने कहा, "इस बार तो तुम जीतोगे ही। मुझे पता है।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। इसलिए मैंने बस अपना हाथ उसके सिर पर रखा और उसके बालों को सहलाया। वो मेरे हाथ के नीचे चुपचाप खड़ी रही, और मैंने महसूस किया कि उसका सिर मेरी हथेली में इतना छोटा है, इतना नाज़ुक है — और ये छोटी लड़की मेरे लिए जंगल में घुसी थी, मेरे लिए चप्पलें छोड़ आई थी, मेरे लिए मिट्टी भरती है।
"जीतूँगा," मैंने धीरे से कहा। "तेरे लिए जीतूँगा।"
"मेरे लिए नहीं," उसने कहा, और मेरी हथेली के नीचे से ऊपर देखा। "बाबा के लिए। वो ऊपर से देख रहे हैं। और वो कह रहे हैं — मेरा बेटा मिट्टी में खेलेगा, बोतल में नहीं।"
माँ चूल्हे के पास खड़ी थीं और वो सब सुन रही थीं। मैंने देखा कि उन्होंने अपनी आँचल का कोना आँखों पर रखा, और फिर तुरंत हटा दिया, जैसे किसी ने देख लिया हो।
रात हुई तो मैं अखाड़े लौटा। इस बार मैंने फाटक से नहीं जाना था। मैं कुएँ की तरफ़ गया, उसी सीढ़ी से उतरा जो मुझे पहली बार कालू काका ने दिखाई थी। सीढ़ियाँ आज भी वैसी ही थीं — ठंडी, सीलन भरी, और हर कदम पर मिट्टी की गंध गहरी होती जाती थी।
तहखाने में पहुँचकर मैंने लालटेन रख दी। मिट्टी आज भी वैसी ही थी — गीली, ठंडी, और उसमें वो सब कुछ था जो बीस साल से जमा हो रहा था। मैंने अपनी धोती का पल्ला कमर में खोंसा और सीधा मिट्टी पर लेट गया। पीठ को ठंडक लगी, और मैंने आँखें बंद कर लीं।
मैंने साँस ली। मिट्टी की गंध अंदर गई। और उसके साथ कुछ और आया — पुराना पसीना, थका हुआ पसीना, सैकड़ों पहलवानों का। बीस साल, पचास साल, सौ साल। ये मिट्टी किसी की जागीर नहीं थी, ये मिट्टी सबकी थी।
मेरे कान में आवाज़ आई। शुरू में मुझे लगा पानी की बूँदें टपक रही हैं, पर फिर मैंने पहचाना।
"बेटा।"
मेरी साँस रुक गई। आँखें बंद ही थीं, और आवाज़ वही थी जो मैंने कभी नहीं सुनी — पर पहचानी।
"कल मैदान में उतरना।"
आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो। पर साफ़ थी।
"पर पहले अपनी माँ का हाथ पकड़ना।"
मैंने आँखें खोल दीं। तहखाने में सिर्फ़ लालटेन की पीली रोशनी थी और मिट्टी। कोई नहीं था।
मैं उठकर बैठ गया। मेरी छाती धक-धक कर रही थी, और मेरी आँखों में पानी था — नहीं, पानी नहीं, कुछ और। मिट्टी की गंध आँखों में घुस गई थी।
मैंने अपने हाथ देखे। उन पर मिट्टी लगी थी। और मुझे लगा कि इस मिट्टी में आज कुछ और भी है — उन हाथों की गरमाहट जो मुझे मैदान में उतारने से पहले मेरी पीठ थपथपाएँगे, और माँ के हाथों की गरमाहट जो चक्की के हत्थे पर बैठी होगी।
मैंने थैली को अपनी जेब से निकाला, गुड़िया की भरी हुई मिट्टी। उसे अपने माथे पर लगाया, और फिर उसी मिट्टी को अपने मुँह के थोड़ी देर बाद चूम लिया।
तहखाने के बाहर, सीढ़ियों के ऊपर, कुएँ के मुँह पर चाँदनी आ रही थी। और मुझे लगा जैसे इस पुरानी मिट्टी ने आज पहली बार किसी से कुछ माँगा है।
मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा तो आसमान में बादल घूम रहे थे। चाँद बीच-बीच में झाँकता, फिर छुप जाता। मेरे हाथ में गुड़िया की थैली थी, और मेरे भीतर एक आवाज़ जो मेरी अपनी नहीं थी।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। माँ बैठक में चौकी पर बैठी थीं, सामने चूल्हे की राख में कुछ लिख रही थीं उँगली से। पैर की आहट सुनकर उन्होंने राख को हाथ से फैला दिया।
"सोई नहीं?" मैंने पूछा।
"नींद आती तो सो जाती।" उन्होंने ऊपर देखा। "तू तहखाने से आ रहा है।"
ये सवाल नहीं था। ये बस गिनती थी — जैसे वो रोज़ गिनती करती हैं कि मैं कितना वापस आता हूँ।
"माँ," मैंने बैठते हुए कहा। मेरी आवाज़ भारी थी, और मुझे पता नहीं था कैसे कहूँ। "तहखाने में… मुझे कुछ सुनाई दिया।"
उनके हाथ रुक गए। राख पर टिकी उँगली वैसी ही रही।
"क्या सुनाई दिया?"
"एक आवाज़। मर्द की। बोली — कल मैदान में उतरना, पर पहले अपनी माँ का हाथ पकड़ना।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं था, पानी भी नहीं था। कुछ और था। जैसे कोई बहुत पुराना हिसाब आख़िरकार अपनी जगह पर आ गया हो।
"तेरे बाबा की आवाज़ थी?" उन्होंने धीरे से पूछा।
"मुझे लगी। पर मैंने उनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी। फिर भी पहचान ली।"
माँ ने राख से हाथ झाड़ा, और फिर धीरे से बोलीं, "बीस साल पहले, जब तेरे बाबा मरे, तो उसी तहखाने में मैं बैठी थी। उसी मिट्टी पर। और उस वक़्त मुझे भी एक आवाज़ सुनाई दी थी।"
मेरी साँस रुक गई। "क्या कहा था?"
"कहा था — मत रो, तेरा बेटा इस मिट्टी से नहीं, अपनी हड्डी से लड़ेगा। और जिस दिन वो हारेगा, उस दिन मैं उसके साथ खड़ा होऊँगा।"
कमरे में सन्नाटा था। चूल्हे की राख ठंडी थी, फिर भी मुझे लगा कि उसमें से गरमी आ रही है।
"तो फिर बाबा आज भी…"
"मैंने कभी किसी को नहीं बताया," उन्होंने मेरी बात काट दी। "डर था कि लोग तुझे पागल कहेंगे। पर आज तू खुद सुनकर आया है।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, चक्की के हत्थे से बनी। "कल मैदान में मैं रहूँगी। और मेरा हाथ तेरे हाथ में होगा। ये बाबा का हुक्म है, मेरी मर्ज़ी नहीं।"
मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा। मेरी आँखें भर आईं, और मैंने छुपाने की कोशिश नहीं की।
सुबह चार बजे मैं उठा। रात की आवाज़ कानों में बसी थी, और मैंने तय किया — इस बार सबको बताऊँगा। जो हुआ, जो सुना। सच छुपाकर लड़ने से अच्छा है, सच के साथ लड़ना।
अखाड़े पहुँचा तो सूरज निकल रहा था और कालू काका रस्सी पर झूल रहे थे। मेरी सूरत देखकर वो रुक गए।
"तेरी आँखों में नींद नहीं है," उन्होंने कहा।
"कालू काका, मुझे कुछ बताना है।"
मैंने सब कुछ कहा। तहखाने की आवाज़, माँ की बात, बाबा का हुक्म। बोलते-बोलते मेरी आवाज़ काँपी, पर मैं रुका नहीं।
कालू काका ने आँखें बंद कर लीं। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने झूलना रोका और नीचे उतर आए।
"बीस साल पहले," उन्होंने धीरे से कहा, "जिस रात भवानी मरा, उस रात वो तहखाने में अकेला नहीं था। मैं भी वहाँ था। और मैंने भी वो आवाज़ सुनी थी। पर मैंने उसे कभी बाहर नहीं निकलने दिया — डर था कि लोग क्या कहेंगे।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू मुझसे बहादुर है। तूने बोल दिया।"
तभी पीछे से पहियों की आवाज़ आई। रणवीर सिंह की व्हीलचेयर आ रही थी, और उनके साथ मीरा थी। मीरा की आँखों में सूजन थी — लगता है रात भर सोई नहीं।
"कालू," रणवीर सिंह ने कहा, "मैंने सुना है कि बलवंत कल उतर रहा है।"
"हाँ।"
"तो सुनो सब।" रणवीर सिंह ने व्हीलचेयर को घुमाया और सबकी तरफ़ देखा। "बलवंत भैरव का पहला शिष्य है। अट्ठाईस साल का है, पर उसका शरीर चालीस का लगता है। बीस साल से भैरव का पानी पी रहा है। मैंने उसे लड़ते देखा है — वो लड़ता नहीं, कुचलता है। एक बार उसने अपने ही साथी की कमर तोड़ दी थी, बस इसलिए कि वो अभ्यास में तेज़ निकल रहा था।"
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