Spirit of a Fighter – Chapter 1193
"क्यों?"
"क्योंकि वो जीतता है, बेटा। और जीतने का नशा उस ज़हर से भी बड़ा होता है।"
रात भर मैं सो नहीं पाया। चारपाई पर करवटें बदलता रहा और छत की उन टूटी कड़ियों को देखता रहा जिन्हें बाबा जी ने बनाया था। सुबह होते-होते मैंने तय कर लिया था कि मुझे अखाड़े में सबसे पहले पहुँचना है।
सुबह जब मैं अखाड़े पहुँचा तो देखा — मैं पहला नहीं था।
अखाड़े की मिट्टी में तीस-चालीस आदमी खड़े थे। कोई बैठा था, कोई दीवार से टेक लगाए खड़ा था। सबके चेहरे पर वो सन्नाटा था जो किसी बुरी खबर के बाद आता है। बीच में, मिट्टी पर, कालू काका बैठे थे, और उनके हाथ में वो काग़ज़ था जो करण ने कल रात मुझे दिया था।
कालू काका ने मुझे देखा और बस इतना कहा, "आ गया।"
मैं उनके पास बैठ गया। मीरा भी आ चुकी थी, कंधे पर बैग, हाथ में कॉपी। टिंकू दौड़ता हुआ आया, उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी, पर उसका चेहरा उतरा हुआ था।
"पढ़ लिया सबने?" मैंने पूछा।
"पढ़ लिया," कालू काका ने कहा। "और सबको एक ही बात सता रही है — ये बलवंत कौन है?"
"तू जानता है, काका," मैंने कहा। "तू जानता है। बता।"
कालू काका ने काग़ज़ को मोड़कर अपनी धोती में रखा और अपनी कुबड़ी पीठ सीधी करने की कोशिश की। उनकी हड्डियाँ चटकीं, और वो सबने सुना।
"बलवंत भैरव का सबसे पुराना शिष्य है," उन्होंने कहा। "जब भैरव यहाँ नया-नया आया था, तब भी बलवंत उसके साथ था। तब वो आठ साल का रहा होगा। मैंने उसे इसी मिट्टी में खेलते देखा है। छोटा-सा, दुबला, नाक से खून बहता, पर हार नहीं मानता। भैरव उसे रोज़ मिट्टी में गिराता और वो रोज़ उठता।"
"अब?"
"अब वो शहर के सबसे बड़े अखाड़े में लड़ता है। अट्ठाईस साल का है, और मुझे सुनने में आया है कि उसका शरीर अड़तीस साल का लगता है।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "बीस साल से वो भैरव का पानी पी रहा है, बेटा। बीस साल। जिस पानी से लोग कुछ महीनों में गिर जाते हैं, उसने उसे बीस साल पिया है।"
अखाड़े में एक आवाज़ उठी — किसी ने कहा, "तो वो ज़िंदा कैसे है?"
"क्योंकि भैरव उसे बच्चे से पीला रहा है," कालू काका ने कहा। "जानवर को ज़हर की आदत डालो तो वो ज़हर खाकर भी चलता रहता है। बलवंत का शरीर उस पानी से बना है। उसकी ताकत डरावनी है — और उसकी उम्र भी तेज़ी से खा रही है। वो लड़ता है, जीतता है, और हर जीत के बाद उसका एक साल और गिरता है।"
मैंने मिट्टी को हाथ में उठाया। गीली थी, ठंडी।
"तो वो मुझसे क्यों लड़ना चाहता है?"
"क्योंकि उसे भैरव ने भेजा है," कालू काका ने कहा। "और शायद इसलिए भी कि उसे लगता है तेरे बाप ने उसके बाप को मारा था।"
अखाड़े के फाटक की तरफ़ से पहियों की आवाज़ आई। सब पलटे।
रणवीर सिंह की व्हीलचेयर आ रही थी, और उसे धकेल रहा था कोई नौजवान — शायद उनका कोई पुराना चेला। व्हीलचेयर मिट्टी में धँसती चली आ रही थी, और रणवीर सिंह का बड़ा शरीर उसमें हिल रहा था। उनकी मूँछें आज पहले से ज़्यादा सफ़ेद लग रही थीं।
वो मेरे पास रुके। किसी ने उन्हें सहारा दिया और वो थोड़ा ऊपर उठे।
"बलवंत को मैं जानता हूँ," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो अब भी बची थी। "मैंने उसे दो साल पहले एक मुकाबले में देखा था। सामने वाला पहलवान अच्छा था, तगड़ा, कुछ कम नहीं। बलवंत ने उसे गिराया नहीं। बलवंत ने उसे उठाया और मिट्टी में ऐसे पटका जैसे कोई कपड़ा झाड़ रहा हो। वो आदमी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया।"
अखाड़े में कोई नहीं बोला।
"वो लड़ता नहीं, वो कुचलता है," रणवीर सिंह ने कहा। "और उसकी आँखों में जो होता है, वो गुस्सा नहीं है। वो भूख है। जो आदमी बचपन से ज़हर पी रहा हो, उसकी भूख कभी नहीं मिटती।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो मैं क्या करूँ?" मैंने पूछा। "डर जाऊँ?"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — मानो वो मुझमें अपना कोई पुराना चेहरा देख रहे हों।
"डर जाना ग़लत नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "ग़लत ये है कि तू डर को अपनी मिट्टी में बैठने दे।"
मीरा मेरे पास आई। उसका चेहरा सख़्त था, पर उसके होंठ दबे हुए थे, और मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ कॉपी के कोने को बार-बार मोड़ रही थीं। वो जब भी घबराती थी, यही करती थी।
"वीर," उसने धीरे से कहा, और मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली ठंडी थी।
"क्या?"
"बलवंत पानी पीता है," उसने कहा। "तुम नहीं। ये बराबरी नहीं है। तुम्हें ये समझना होगा।"
उसकी आवाज़ में वो डर था जो मीरा ने आज तक कभी नहीं दिखाया था। मीरा जो हर बात में सबूत माँगती थी, जो हर झगड़े में आगे रहती थी, आज उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने उसकी उँगलियों को हल्का दबाया।
"मीरा," मैंने कहा, "मैं मिट्टी में सोया हूँ। वो बोतल में सोया है। देखते हैं कौन जीतता है।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही, फिर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया, पर अपनी नज़र नहीं छोड़ी।
"तुम बेवकूफ़ हो," उसने कहा। "बिलकुल बेवकूफ़।"
"पता है," मैंने कहा।
"और मुझे ये बेवकूफ़ पसंद है," उसने धीरे से, इतने धीरे से कहा कि शायद उसने खुद भी नहीं सुना।
उसके बाद अखाड़े में सब बिखर गए, पर बातें चलती रहीं। दोपहर तक पूरे रामपुर में एक ही नाम गूँज रहा था — बलवंत। सुक्खी बुआ ने कुछ ही घंटों में पूरे गाँव को ये खबर पहुँचा दी कि अखाड़े में एक ऐसा पहलवान आ रहा है जो "पानी पीता है" — और उन्होंने इसे इस अंदाज़ में कहा जैसे कोई भूत की कहानी सुना रही हों।
शाम को टिंकू मेरे घर आया। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी, पर उसने उसे मेरे सामने नहीं रखा। वो आँगन के कोने में खड़ा रहा, और मैंने देखा कि उसके हाथ डिब्बी पर इस तरह जमे हुए थे जैसे उसे छोड़ने से डर लग रहा हो।
"भाई," उसने कहा, "मैंने सोचा है।"
"क्या सोचा?"
"मैं तेरे लिए 'जीत का लड्डू' बनाऊँगा।" उसकी आवाज़ में वो पुरानी बड़ी-बड़ी बातें लौट आई थीं, पर उसकी आँखें उससे अलग बात कह रही थीं। "ऐसा लड्डू कि पूरे गाँव में बाँटूँगा। और जब तू जीतेगा, तो सबसे पहला लड्डू तेरे मुँह में — अपने हाथ से।"
"टिंकू…"
"और अगर लड्डू में नमक आ गया," उसने कहा, "तो तू चुपचाप खा लेना। बोलना मत। मेरी इज़्ज़त का सवाल है।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार उस दिन हँसा। और टिंकू भी हँसा, पर उसकी हँसी में पानी था।
"तू डरता है?" मैंने पूछा।
"बहुत," उसने सीधा कहा। "पर तेरे साथ डरूँगा। अकेले नहीं डरूँगा।"
तभी गुड़िया दौड़ती हुई आई। स्कूल से लौटी थी, कॉपी अभी भी हाथ में थी, और उसके घुटनों पर मिट्टी लगी थी। वो सीधे मेरे पास आई और मेरे हाथ में कुछ रख दिया — एक छोटी थैली, अखाड़े की लाल मिट्टी से भरी हुई।
"भैया," उसने कहा, "ये नई है। आज सुबह मैंने खुद भरी है। अखाड़े की सबसे अंदर वाली मिट्टी, जहाँ सबसे ज़्यादा पसीना गिरता है।"
मैंने थैली को हाथ में लिया। वो भारी थी, गीली थी और उसमें से वो गंध आ रही थी जो मेरे बचपन से मेरे साथ है।
"गुड़िया," मैंने कहा, "तू रोज़ भूल जाती है कि तू बारह साल की है और मुझे ऐसे बातें करती है जैसे तू मेरी बड़ी बहन हो।"
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