Spirit of a Fighter1192 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1192

7 min read November 5, 2026

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा वो हँसता हुआ चेहरा नहीं था। अब वो गंभीर था। उसने पेंसिल कान के पीछे रखी।

"बैठ," उसने कहा। "और बोल।"

मैं बैठ गया। और मैंने उसे सब बताया — भैरव का काग़ज़, मिटाया हुआ नाम, और वो सच्चाई जो सुक्खी बुआ ने बताई थी कि कैसे भैरव ने उसे उसके जन्म के दिन छोड़ दिया था।

टिंकू सुनता रहा। एक शब्द नहीं बोला।

जब मैं ख़त्म हुआ, तो उसने आसमान की तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, कुछ गिन रहा था, शायद साल।

"तो इसीलिए," उसने धीरे से कहा। "इसीलिए वो मुझे कभी अखाड़े में नहीं घुसने देता था। मैं सोचता था वो मुझे कमज़ोर समझता है।"

उसने अपने हाथ देखे — हल्दी से पीले, घी से चमकते।

"मेरी माँ," उसने कहा, और फिर रुका। "सुक्खी बुआ। वो जानती थीं।"

"हाँ।"

"और वो आज तक मुझसे कुछ नहीं बोलीं।"

उसकी आवाज़ टूटने लगी थी। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ काँप रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा, "सुन। तेरा बाप कौन है, इससे तेरा नाम नहीं बदलता। तू मेरा भाई है। तू मेरा दोस्त है। तू वो है जो मेरे लिए रोज़ खीर लाता है और माँ से झूठ बोलता है। ये सब तेरे बाप के काग़ज़ से नहीं बदलता।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, और उसके होंठ मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे, पर हो नहीं रहा था।

"मैं तो सोचता था," उसने कहा, "कि मैं बड़ा रसोइया बनूँगा और सब मुझे जानेंगे। अब पता चला मैं पहलवान का बेटा हूँ।" उसने एक झटके में आँसू पोंछे। "भगवान क्या मज़ाक करते हैं।"

"तू मज़ाक नहीं है," मैंने कहा। "तू टिंकू मिष्ठान भंडार है।"

वो हँसा। हँसते हुए उसकी नाक बह निकली और उसने अपनी टोपी से पोंछी।

"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर से थोड़ी जान आई, "तो अब बता, मैं उससे मिलूँ? जेल जाकर?"

"मिलना है तो मिल," मैंने कहा। "पर जब तेरा मन करे। आज नहीं। आज बहुत हो गया।"

उसने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी कॉपी उठाई और उस पर लिखी इमरती की सूची को देखा।

"ये इमरती," उसने कहा, "इसे मैंने अपने नाम की जगह पर बनाया है। अब मैं इसे नए नाम से बनाऊँगा।"

"क्या नाम?"

"पता नहीं," उसने कहा। "पर वो मेरा होगा।"

मैं उठा। उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"वीर," उसने कहा, "आज तू खाना मेरे यहाँ खा। मैं कुछ बनाऊँगा। तेरे लिए।"

"आज नहीं," मैंने कहा। "आज माँ के यहाँ। गंगा देवी ने बुलाया है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में एक नई बात आई।

"मैं भी चलूँ?" उसने पूछा, धीरे से।

मैं एक पल रुका। फिर मैंने उसका कंधा पकड़ा।

"चल," मैंने कहा। "आज सब साथ खाएँगे।"

शाम को गंगा देवी के आँगन में चारों तरफ़ बैठकर हमने खाना खाया। करण और टिंकू आमने-सामने बैठे थे। पहले तो दोनों चुप थे, एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देख रहे थे। फिर टिंकू ने करण की थाली में अपने हाथ से एक बड़ा टुकड़ा डाला और कहा, "लड्डू खा। मैंने बनाया है।"

करण ने लड्डू खाया और उसका चेहरा बदला।

"इसमें नमक क्यों है?" उसने पूछा।

टिंकू ने खुद चखा और थूक दिया। "अरे! शक्कर की डिबिया उठा लिया था नमक से।"

मैं हँस पड़ा। गंगा देवी हँसीं। करण हँसा। और टिंकू ने अपना सिर पकड़ लिया और कहा, "मेरी किस्मत में सिर्फ़ इमरती है।"

रात हो गई थी। मैं घर जाने की सोच ही रहा था कि करण ने मुझे रोका।

"वीर," उसने कहा, "एक बात कहनी है।"

मैं रुका। गंगा देवी अंदर गईं।

करण ने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। उसका मुँह गंभीर था।

"ये इंस्पेक्टर ने मुझे दिया," उसने कहा। "आज सुबह, जब तू अंदर था। ये चिट्ठी अखाड़े के दरवाज़े पर मिली है, मुहर लगी, बिना नाम के। इंस्पेक्टर ने कहा इसे तू पढ़ लेना।"

मैंने चिट्ठी खोली। काग़ज़ मोटा था, सीलन जैसी गंध उसमें से आ रही थी, और लिखाई बड़ी साफ़ थी, सीधी, बिना हिचक। मेरी नाक ने कुछ और पकड़ा — इत्र। गुलाब की, हल्की।

उसमें सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी:

"भैरव का शिष्य बलवंत 'भारत केसरी' में वीर सिंह को ललकारता है।"

मैंने काग़ज़ को दोबारा पढ़ा। तीन बार।

"कौन बलवंत?" करण ने पूछा।

"नहीं जानता," मैंने कहा। "पर बड़ा नाम है। भारत केसरी का हर पहलवान बड़ा होता है।"

करण ने मेरी तरफ़ देखा।

"भैरव जेल में है," उसने कहा। "फिर उसका शिष्य कैसे…"

"भैरव जेल में है," मैंने कहा, "पर उसका काम बंद नहीं हुआ। जगदीश सिंह अभी भी बाहर है। और शायद ये बलवंत उसी का हाथ है।"

मैंने चिट्ठी को अपनी जेब में रखा और आसमान की तरफ़ देखा। रात साफ़ थी, तारे चमक रहे थे। और दूर, अखाड़े की तरफ़, एक मशाल की रोशनी दिख रही थी।

"कल सुबह पंचायत है," मैंने कहा। "मुझे बलवंत के बारे में पूछना होगा। किसी से कुछ पता चलेगा।"

करण ने मेरा कंधा पकड़ा।

"वीर," उसने कहा, "मैं तेरे साथ हूँ। इस बार मैं तेरे साथ रहूँगा। तेरे बाप ने जो किया, वो मैं नहीं करूँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो साफ़ था जो कल टूटा था और आज जुड़ गया था।

"ठीक है," मैंने कहा। "कल सुबह अखाड़े में मिल।"

मैं घर की तरफ़ चला। रास्ते में मेरे दिमाग़ में एक ही नाम था। बलवंत। और मुझे लगा — भैरव ने अपना आख़िरी हथियार बाहर भेज दिया है। और वो हथियार मेरे नाम से बदला लेने आया है।

मैं घर पहुँचा तो आँगन में माँ चक्की पर बैठी थीं। उन्होंने मुझे देखा और कुछ नहीं कहा। बस मेरे लिए रोटी की तरफ़ इशारा किया।

मैं बैठ गया। रोटी खाते हुए मैंने कहा, "माँ, भारत केसरी का कोई पहलवान बलवंत है? सुना है तूने?"

माँ का हाथ चक्की पर रुक गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो आज से पहले कभी नहीं देखा था।

"ये नाम तूने कहाँ सुना?" उन्होंने पूछा।

"क्यों?" मेरे पेट में गाँठ बनी। "कौन है वो?"

माँ ने चक्की का हत्था छोड़ दिया और धीरे से कहा, "बलवंत… वो जगदीश सिंह का बेटा है।"

मेरे हाथ से रोटी गिर गई। और मैंने देखा — माँ के हाथ काँप रहे थे, और वो छुपाने के लिए उन्हें साड़ी में लपेट रही थीं।

॥

रोटी आँगन की मिट्टी में गिरी और मैंने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की। माँ के हाथ साड़ी में लिपटे हुए काँप रहे थे, और उनकी आँखें मुझसे बचकर चक्की की तरफ़ भाग रही थीं।

"माँ," मैंने धीरे से कहा। "बलवंत जगदीश सिंह का बेटा कैसे है? जगदीश तो सुक्खी बुआ का…"

मैं रुक गया। मैंने उसी वक़्त पाया कि मेरी ज़ुबान फिसल रही है। सुक्खी बुआ खुद कह चुकी थीं कि वो जगदीश की बीवी हैं। तो जगदीश का एक बेटा और भी था, जिसका कोई ज़िक्र आज तक नहीं आया।

माँ ने चक्की का हत्था पकड़ लिया, जैसे किसी का हाथ पकड़ती हों।

"बलवंत जगदीश का पहला बेटा है," उन्होंने कहा। "पहली बीवी से। वो बीवी जगदीश ने भैरव के कहने पर छोड़ दी थी, जब बलवंत चार साल का था। बच्चा भैरव ने अपने पास रख लिया।"

"भैरव ने?" मेरा गला सूख गया।

"भैरव ने ही उसे पाला, भैरव ने ही उसे अखाड़े की मिट्टी दी, भैरव ने ही उसे बड़ा पहलवान बनाया।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो गुस्सा था जो बहुत कम निकलता था। "और बीस साल से वो उसे वही पानी पिला रहा है। जिस पानी से तेरे बाप को मारा गया, जिस पानी से रणवीर सिंह की कमर टूटी, वही पानी वो बलवंत को पिला रहा है। और बलवंत जानता है। वो जानता है और फिर भी पीता है।"

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